Yaado ki Sahelgaah - 28 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (28)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (28)

   

                    : : प्रकरण - 28 ::

        कुछ दिन बाद मैंने अपने हाथों की उंगलिया दिखाई थी. जो नाखुनो से पुरी भरी पड़ी थी. यह देखकर  म्युझिका चकित ऱह गई थी. उसने मुझे सवाल किया था.

        " हां! " मैंने एकाक्षरी जवाब दिया.

        " यह कैसे हो गया? "

        उस ने मुझे सहज सवाल किया.

         मैंने उसे जवाब दिया.

         " यह एक चमत्कार हैं जो एक दादी मा ने किया हैं. "

         " कौन हैं आप की दादी मा? "

           मैं उसे सीधे सीधा बतलाना नहीं चाहता था. मैं उसे थोड़ा सताना चाहता था.. लेकिन बेक़रारी देखकर मैं चूप रह नहीं पाया और उसे सीधा बता दिया.

      " तुम्हारे सिवा भला और कौन हो सकता हैं?! "

      " आप मुझे इतनी मानते हो? "

       " अपनों से भी ज्यादा. "

       यह सुनकर वह बड़ी भावुक हो गई थी.

       वह उत्साह में आकर मेरे गले लिपट गई थी.

       वह मुझे से दूर चली गई थी. उसी दिन मैंने चाचाजी की ओफिस को छोड़ लिया था.

       और मेरी ही लाइन में शेठ ब्रदर्स का काम करने वाले रोशन माली के दफ्तर में काम शुरू किया था. उसके का मुख्य सदस्य मेरा जानकार था. मुझे विश्वास था. हम दोनों के बीच अच्छा तालमेल रहेगा. लेकिन यहाँ भी नाकाम रहा था. कंपनी में सही मानो में मेरे लिये कोई काम बचा नहीं था.

       उस दौरान में ओफिस आते समय मुंबई सेन्ट्रल उतर जाता था. चाचा जी की ऑफिस में काम करने वाली लड़की से मिलता था, उसे केडबरी देता था और फिर ओफिस हो जाता था.

        रोशन माली की ओफिस में भी कुछ अच्छे लोग मिल गये थे.

        ना जाने क्यों मैं कीसी के हाथ के नीचे काम नहीं कर सकता था.

        मेरी कुंडली में भी यह बात साफ लिखी थी.

        " तुम किसी के हाथ के नीचे काम नहीं कर सकोंगे. "

          ज्योतिषी ने भी  इस बात का समर्थन दिया था. 

           प्रेम सन से जो हुआ था. यह देखकर मुझे बहुत अचरज हुआ था. वह क्या करना चाहता था. कुछ समझ नहीं आता था. जिस बुजुर्ग ने मुझे प्रेम सन में जोब दिलाया था. उसी ने मुझे साइकिल एक्सपोर्ट्स धंधे में लगाया था.

       कंपनी के दो भाई भागीदार थे.. साब से बड़ा भाई  कंपनी का भागीदार था जो मर चूका था. उस का बड़ा लड़का कंपनी का भागीदार था.. दूसरे भाई की लड़की भी कंपनी में भागीदार थी. और तीसरे भाई का लड़का भी भागीदार था. उसके अलावा मजले भाई का दामाद भी कंपनी का हिस्सा था. जो कंपनी का मैनेजर था. उसके  साथ मेरी बिल्कुल जमती नहीं थी.

        उस का काम करने का तरीका भी विचित्र था. बात बात में उसके  साथ कुछ ना कुछ समस्या ख़डी होती थी.

       मैंने उन्हें ज्वॉइन किया था.. उसके  बाद एक व्यस्क निवृत व्यकित ने भी कंपनी ज्वॉइन की थी.. कोई बैंक के मैनेजर की वजह से उसे जोब मिला था.

       उस की बीवी का देहांत हो गया था. 

       वह मेरे साथ काम करते थे. दोनों को एक ही पगार मिलता था.

       उस ने मेरे साथ अपने अनुभव शेयर किये थे.. लेकिन वह एक नंबर का स्वार्थी, मतलबी साबित हुआ था.

         एक बार मैंने पेपर में वेकन्सी का इश्तेहार देखा था. उस के लिये मैं थोड़ा लेट हो गया था.. तब मुझे याद आया था. उस कंपनी ने स्टेनो टाइपिस्ट का भी इश्तेहार छपा था. मैंने तुरंत मिस्टर कुट्टी को वहां भेजा था. उस को जोब मिल गया था और उन को 250 रूपये का बढ़ावा मिल गया था. कंपनी को तीन साल का अकाउंट लिखने की जरूरत पड़ी थी. उन्होंने मुझे भी नियुक्त कर लिया था जिस के तेहत मेरे पगार में 225 रूपये की वृद्धि हुई थी.

        हम लोग ने वहाँ छह महिने  साथ काम किया था. बाद में मुझे ' शेठ ब्रदर्स' में जोब मिला था. मैंने उन को भी जोब दिलाया. उन्हें नियुक्ति पत्र भी मिल गया था.. लेकिन उस दौरान उन्हें ' शेठ ब्रदर्स '  से भी बढ़िया जोब मिल गया था.

        और वह मुझे भूल गये थे. मैंने ' कीसी ' के लिये बहुत कुछ उन से कहां था. वह मेरे लिये क्या थी? फिर भी उन्होंने उस के बारे में कुछ नहीं किया था.

         वह भारतीय सरकार से जुड़े हुए थे. काफ़ी पहचान थी. लेकिन उन्होंने  कुछ नहीं किया था.

        ज़ब हम लोग साथ काम करते थे. तब मेरी साली क्षिप्रा मेरी ओफिस में आई थी. उस का व्यवहार देखकर उन्होंने मुझे साफ कहां था.

         " वह तुम्हे चाहती हैं. "

         पहले तो मैंने उस की बात नहीं मानी थी.

          लेकिन एक बार वह मेरे घर आई थी. साथ में बड़ी मा भी मौजूद थी. रात को नौ बजे मैं खाना खाकर बिस्तर में लेटा था. उस वक़्त वह मेरी बाजु में आकर सो गई थी. घर में उन के अलावा मेरे पिताजी और आरती भी मौजूद थे.

        उस का ऐसा व्यवहार देखकर बड़ी मा चिढ़ गये थे. उन्होंने हाथ पकडकर उसे बिस्तर से नीचे उतार दिया था. उस वक़्त क्षिप्रा ने बबडाट किया था.

        " घर में जगह नहीं तो क्या करुं?"

         वह अपनी बहन के घर में थी. वह चाहती को चटाई लगाकर नीचे सो सकती थी.

         उस के बाद बहुत कुछ ऐसी बातें हुई थी जिस ने मुझे सोचने पर विवश कर दिया था.

       उस पर अपनी मा का पूरा प्रभाव था.

       वह सुहानी से भी आगे निकल गई थी. 

        उस के चित्र विचित्र व्यवहार ने मुझे गलत करने को उकसाया था.

        वह क्यों ऐसा व्यवहार करती थी? क्या वह अपनी बड़ी बहन का अंधा अनुकरण करती थी? 

         वह बहुत जल्द बिल्डिंग के मुकादम के लडके के साथ प्यार के चक्कर में पड़ गई थी. उस ने ललिता पवार को कुछ मदद की थी.. परिचय का फायदा उठाकर उन्हें फायदा करवाया था. और वह उस के कायल बन गये थे.

       दूसरी तरह एक दूसरा लड़का भी क्षिप्रा को प्यार करने लगा था. और सुहानी की तरह वह दो लडके के बीच फस गई थी.

       और आख़िरकार बदनाम इलाके की शान बन गई थी. वह बहुत पैसा कमाती थी.. उस ने कोल गर्ल का धंधा शुरू किया था. और धूम पैसे कमाने लगी थी.. एक कोल का मन चाहे पैसा लेती थी.

        वेश्या गृह में ज्यादा पैसा कमाने का कोई चान्स नहीं था. इस लिये वह शाम होते ही रास्ते पर ख़डी ऱह जाती थी. 

                          00000000000   (क्रमशः)