Yashaswini - 30 in Hindi Fiction Stories by Dr Yogendra Kumar Pandey books and stories PDF | यशस्विनी - 30

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यशस्विनी - 30


     तभी कक्ष में स्वामी मुक्तानंद की आवाज गूंजी।जैसे स्वामी मुक्तानंद ने रोहित के मन की बात सुन ली हो और उन्होंने कहा,"अब कुछ ही दिनों में हम उन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयत्न प्रारंभ करेंगे,जो तुम्हारे मन में उमड़- घुमड़ रहे हैं।" 

            रोहित के मन में अनेक जिज्ञासाएं थीं।घायल रोहित वैद्य जी के प्रयास से कुछ ही दिनों में पूरी तरह स्वस्थ हो गए।एक दिन प्रातःकालीन ध्यान- योग अभ्यास के बाद स्वामी मुक्तानंद ने रोहित को अपने निज ध्यान कक्ष में बुलाया।इसके बाद रोहित के प्रशिक्षण का क्रम शुरू हुआ।रोहित विभिन्न ध्यानचक्रों के बारे में योग प्रशिक्षक यशस्विनी के साथ रहते- रहते सैद्धांतिक ज्ञान तो प्राप्त कर ही चुके थे,लेकिन व्यावहारिक अनुभव शेष था।आज स्वामी मुक्तानंद ने रोहित के लिए आगामी अभ्यास की पूरी रूपरेखा तय कर दी।

“तुम मानव की सुषुप्त शक्तियों के बारे में जानने के लिए इतने व्यग्र क्यों हो रोहित?"स्वामी मुक्तानंद ने पूछा।

"इसका कारण यह है स्वामी जी कि मैं स्वयं इन शक्तियों का परिचय प्राप्त कर इन्हें धारण करने का प्रयत्न करना चाहता हूं।"रोहित ने उत्तर दिया।

  "इन शक्तियों को स्वयं धारण करने के बाद क्या करोगे? तुम्हें यह तो ज्ञात ही होगा कि इन शक्तियों को धारण करने के लिए पहले पात्रता चाहिए और उसके बाद जब ये शक्तियां हमारे भीतर जाग्रत हो जाती हैं, तो इन्हें संभाल पाना और भी मुश्किल होता है।ये जीवन में महाविस्फोट के समान हैं और अगर साधक ने इसके संबंध में सावधानियां नहीं बरतीं,तो फिर अनर्थ भी हो सकता है।क्या तुम इसके लिए तैयार हो?"स्वामी मुक्तानंद ने स्पष्ट करते हुए कहा।

"जी स्वामी जी! मेरा निश्चय दृढ़ है। मैं व्यक्तिगत उपलब्धियों या किसी चमत्कार की कामना से यहां उपस्थित नहीं हुआ हूं।मेरा उद्देश्य पवित्र है,और वह है- मानवता की सेवा,मानवता के कष्टों को दूर करने के कार्य में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना।जब मैं अपने राष्ट्र के लोगों के जीवन में दु:ख देखता हूं,तो विचलित हो जाता हूं। भौतिक सुख सुविधाएं तो प्राप्त हो सकती हैं, और इनके लिए विभिन्न सरकारें तथा अनेक समाजसेवी संस्थाएं कार्य कर ही रही हैं,स्वामी जी, लेकिन वह अंत:चेतना बड़े पैमाने पर जाग्रत करने की आवश्यकता है, जो हमें व्यक्ति से समष्टि और स्वार्थ से परमार्थ की ओर मोड़ दे।"विवेक ने अपना उद्देश्य बताते हुए कहा।

स्वामी मुक्तानंद यह सुनकर प्रसन्न हो गए और बड़ी देर तक विचारमग्न रहे। फिर उन्होंने रोहित को समझाते हुए कहा,"एक नवयुवक और वह अपने जीवन में इतना विराट लक्ष्य लेकर चले,यह दुर्लभ ही दिखाई देता है।मुझे प्रसन्नता है कि आज जब ईर्ष्या,द्वेष,हिंसा- प्रति हिंसा,लोभ,स्वार्थ की अंधी दौड़ है,तो ऐसे में तुम्हारे जैसे नवयुवक मनुष्य के भीतर की इन दुष्प्रवृत्तियों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहते हैं और वह भी सामूहिक स्तर पर।"

"जी स्वामी जी,आज राष्ट्र की चेतना को पश्चिमी भौतिकवाद और वहां की भोगवादी संस्कृति के अंधानुकरण से बचाने की भी आवश्यकता है।जिन सुख सुविधाओं के पीछे मनुष्य भाग रहा है,वह अंततः उसके जीवन में लोभ और मोह का कारण ही बनती हैं और कहीं न कहीं उसके सामाजिक योगदान को सीमित कर देती हैं।"विवेक ने उत्साहपूर्वक कहा।

    "इन आध्यात्मिक और उच्चस्तरीय मानवतावादी विचारों के साथ इस आश्रम में तुम्हारा स्वागत है रोहित! एक दिन तुम्हारे व्यक्तिगत प्रयास एक बड़े आध्यात्मिक सामाजिक आंदोलन का आधार बनेंगे।"स्वामी मुक्तानंद ने कहा। साथ ही उसे व्यक्तिगत ध्यान के लिए कल प्रातः 4:00 बजे से अपने इसी साधना कक्षा में पहुंचने का निर्देश दिया।

रोहित ने स्वामी जी के चरण स्पर्श करते हुए कहा,"जो आज्ञा स्वामी जी! तो योग और ध्यान का सामूहिक सत्र,वह कब होगा?"

    "वह तो होगा ही,लेकिन तुम्हारी प्रतिदिन की इस साधना के बाद।"स्वामी जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा।

   अगले दिन से रोहित की साधना शुरू हुई। हिमालय क्षेत्र की कड़ाके की ठंड में प्रात: 3:00 बजे उठना और स्नान -ध्यान के बाद प्रातः 4:00 बजे स्वामी मुक्तानंद के साधना कक्ष में पहुंचना। इसके बाद एक आसन पर बैठकर ध्यानमग्न हो जाना। ध्यान प्रक्रिया के भी अपने खतरे हैं।योग्य गुरु का मार्गदर्शन और साधना के विशेष चरण में उनकी उपस्थिति आवश्यक है।अगर शिष्य ध्यान में पूरी तरह डूब जाए और महीनों अभ्यास के बाद अनायास समाधि लग जाए तो फिर शिष्य का उस स्थिति से अपने आप बाहर आना मुश्किल हो जाता है, इसलिए ऐसे विशिष्ट चरण में गुरु का मार्गदर्शन और उनकी उपस्थिति भी अत्यंत आवश्यक है।हम प्रायः योग- प्राणायाम और कुछ मिनट के ध्यान की विधियों का अभ्यास करते हैं,और ऐसे उपयोगी योग प्रोटोकॉल भारत सरकार तथा राज्य सरकारों द्वारा भी उपलब्ध हैं।अनेक संस्थाएं भी योग अभ्यास कराती हैं,लेकिन यहां मामला अलग है। रोहित उस अनोखी दुनिया और अतिंद्रियता की स्थिति तक पहुंचाना चाहते हैं,जो हमारी सामान्य आंखों से दृष्टिगोचर नहीं होते हैं।यह जीवन में दिव्य प्रकाश प्राप्त कर लेने की वह अवस्था है,जिसके बाद मनुष्य का निज समाप्त हो जाता है,और वह पूरे समाज तथा विश्व का हो जाता है, इसके बाद अगर होठों से कोई कामना भी निकलती है,तो वह मानवता की पीड़ा हरने और उनके कष्टों को दूर करने के लिए …….।

    स्वामी मुक्तानंद ने रोहित को दीक्षा प्रदान कर दी थी।अब वे रोहित के गुरु थे। दीक्षा का मंत्र प्रदान करने के बाद रोहित के सिर पर हाथ फेरते हुए स्वामी जी ने कहा था,"तुम्हारे जीवन में केवल मैं ही गुरु नहीं हूं या रहूंगा रोहित!ऐसे सभी लोग,चाहे वे तुम्हारे अपने हों या समाज के कोई दूसरे व्यक्ति हों, यहां तक कि ऐसी घटनाएं जो तुम्हें कोई सीख देती हैं,सभी तुम्हारी गुरु हैं। ज्ञान प्राप्त करो लेकिन संकीर्ण मत बनो। मेरी आज्ञा मानो लेकिन जब तुम्हारे मन में कोई तर्क पैदा होता है तो अंध श्रद्धा के स्थान पर पहले अपने तर्कों का समाधान करो,और फिर उस राह पर बढ़ो अन्यथा केवल गुरु ने कहा है; यह सोचकर उस राह पर मत बढ़ो।"

          “जी नमस्कार नेहा जी! मैं रोहित!आपका इस आश्रम में स्वागत है। आइए,मैं आपको भीतर लिए चलता हूं।” रोहित ने उत्तर दिया। 

रोहित ने उसके लगेज को उठाने की पेशकश की, लेकिन नेहा ने विनम्रता पूर्वक मना कर दिया और वह स्वयं अपना लगेज लेकर साथ चलने लगी।दोनों भीतर की ओर बढ़े।यह आश्रम जोशीमठ से भी ऊपर एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में है, जहां कई घंटों की चढ़ाई के बाद नेहा पहुंच पाई है।ऐसी ही दुर्गम स्थिति का सामना अपने आगमन के समय रोहित को भी करना पड़ा था। हिमालय की बर्फ से ढकी चमकदार पहाड़ियां। दिन के प्रकाश में चिलकती हुई धूप,लेकिन अगर आप पीठ की तरफ अपना हाथ रखेंगे तो बर्फ की तरह सर्द। नेहा रोहित के साथ आगे बढ़ी।इस आश्रम के भीतर प्रवेश करते हुए नेहा को एक आत्मिक शांति का अनुभव हो रहा था।नेहा ने प्रवेश द्वार के पास ही बने हुए भगवान बद्रीनाथ और लक्ष्मी जी की मूर्ति को प्रणाम किया। यह आश्रम एक समतल स्थान पर नहीं था और छोटी-छोटी पहाड़ियों की ऊंची नीची जगह पर अनेक कक्ष और भवन बने हुए थे।संभवत: कुछ गुफाएं भी थीं,जिनका उपयोग साधना के लिए किया जाता था।आश्रम में एक स्थान पर, "हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे, हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्णा हरे हरे", की धुन का संकीर्तन हो रहा था।

     आश्रम में बने हुए बद्रीनाथ जी के एक छोटे मंदिर के पास से बाहर निकलते ही नेहा ने उत्तर दिशा की ओर दृष्टि डाली। हिमालय की रजत जालियों के से आसमान में टंकी हुई विशाल पर्वतमालाएं। उसने रोहित से पूछा,"साधक जी! क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकती हूं?"

"हां अवश्य पर मुझे आप साधक जी के बदले रोहित कहेंगी,तो ज्यादा अच्छा लगेगा।"

"ओके रोहित जी, कितनी सुंदर है यह जगह! ऐसा लगता है कि यह आश्रम धरती और आसमान दोनों के ठीक बीच में है और जैसे यहां आस-पास के हिमशिखर आसमान को छूने की सीढ़ियां हों।"

मुस्कुराते हुए रोहित ने कहा,"मुझे भी ऐसा ही लगता है।"

"तो आपका मन इन शिखरों के माध्यम से ऊंचाइयों में पहुंचकर आसमान की सैर करने का  नहीं करता?” नेहा ने हंसते हुए पूछा

"अवश्य करता है पर मैं एक दूसरे उद्देश्य को लेकर यहां आया हूं। हिमालय के ये श्वेत और इसके किसी - किसी हिस्से में स्लेटी रंग के खूबसूरत पहाड़ मेरे मन में भी कुतूहल और आकर्षण के केंद्र हैं,पर फिलहाल मेरा ध्यान स्वामी जी के आदेश पर दूसरे कार्य में रमा हुआ है।"

      

क्रमशः 

योगेंद्र