दुराचार कब तक?
इस गंभीर चिंता से दुखी आचार्य सत्यव्रत ने कहा,"नारी किसी भी देश या काल की रही हो, वह सदा से पूजनीय है और उसे इस तरह विजय का प्रतीक या भोग्य, बंधक वस्तु की तरह सौदेबाजी में इस्तेमाल कभी नहीं होना चाहिए।"
विवेक के मन में एक और घटना की गूंज अभी तक थी।भारत में ही राखी के दिन एक क्षेत्र में राखी बांधकर रात्रि में अपने भावी पति के साथ घर लौट रही एक युवती और उसकी बहन के साथ सामूहिक अनाचार की खबर। इस घटना का संदर्भ देते हुए विवेक ने आचार्य से पूछा,"आखिर नारी कब तक घुटती,सिसकती रहेगी गुरुदेव?क्या उसे भयमुक्त निर्बाध जीने और विचरण करने का अधिकार नहीं है?इसका कोई समाधान नहीं है?"
आचार्य ने कहा,"क्यों नहीं विवेक!... इन सब के समाधान की ओर बढ़ने के लिए तुम्हें यह शहर छोड़ना होगा। तुम्हें साधना करनी होगी और मेरे गुरु स्वामी मुक्तानंद के पास जाना होगा।"
विवेक ने प्रसन्न होते हुए कहा,"मैं इसके लिए तैयार हूं गुरुदेव! मैं उन सभी प्रश्नों का हल चाहता हूं जो हमारे आसपास घटित हो रही हैं या जिन्हें मैं हमारे देश की सीमाओं से परे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक जगहों पर मानव संघर्ष,हिंसा या चिर वैचारिक शत्रुता के रूप में देखता हूं।"
आचार्य ने निर्देश दिया," तुम्हारी आखिरी सेमेस्टर की परीक्षाएं भी हो गई है और अभी परिणाम आने तथा स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ाई शुरू करने में समय है, तब तक तुम मेरे मित्र स्वामी मुक्तानंद के आश्रम चले जाओ।"
"उनका आश्रम कहां पर है गुरुदेव?"
"उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में, जोशीमठ से भी ऊपर, वहां तक जाने के लिए तुम्हें एक स्थान विशेष पर पहुंचकर आगे की पहाड़ी चढ़ाई भी करनी होगी।"
"मैं तैयार हूं गुरुदेव!जो आज्ञा!मैं तैयारी करता हूं।"विवेक ने प्रसन्नता से उत्तर दिया।
आचार्य सत्यव्रत ने विवेक से कह दिया था कि उसे लगभग 3 महीने से लेकर 6 महीने तक गुरु मुक्तानंद के आश्रम में बिताने होंगे और इसकी अवधि बढ़ भी सकती है।विवेक ने इस निर्देश के अनुसार जरूरी सामान अपने साथ रखे। वह इस यात्रा को लेकर अत्यंत रोमांचित था। यह यात्रा एक नए उद्देश्य को लेकर थी। अभी विवेक कॉलेज की पढ़ाई के दौर में ही है लेकिन जब गुरु ने यह कहा कि जिन प्रश्नों का उत्तर तुम चाहते हो,उनके उत्तर मेरे साथ इस तरह बैठकर ज्ञान चर्चा से ही प्राप्त नहीं हो सकेंगे। मेरे मित्र मुक्तानंद संसार से वैराग्य ले चुके हैं, लेकिन वे सांसारिक जीवन में आने वाली बाधाओं और समस्याओं पर न सिर्फ चर्चा करते हैं बल्कि आश्रम में आने वाले भक्तों की बातें सुनकर व्यावहारिक समाधान भी सुझाते हैं।
छत्तीसगढ़ से ट्रेन रूट में लगभग 24 घंटे का सफर….. दिल्ली पहुंचने के बाद विवेक ने आनंद विहार टर्मिनल से शाम 6 बजे वंदे भारत एक्सप्रेस में देहरादून के लिए प्रस्थान किया। रात लगभग 11:00 बजे देहरादून पहुंचने के बाद उसने एक होटल में रात्रि विश्राम किया और अगले दिन दून एक्सप्रेस से ऋषिकेश की यात्रा पूरी की। यहां से उसने जोशीमठ की यात्रा हिमालय के सुंदर प्राकृतिक दृश्यों के बीच पूरी की। ऋषिकेश से रेलवे की कर्णप्रयाग परियोजना अब जोशीमठ तक नहीं पहुंच रही है, क्योंकि भू धंसाव के कारण जोशीमठ के आसपास की भौगोलिक संरचना को इस प्रोजेक्ट के लिए अनुकूल नहीं पाया गया। वर्तमान में ट्रेन परियोजना पीपलकोटि तक ही विस्तारित होगी।
विवेक सोचने लगा एक ओर विकास की तेज रफ्तार दूसरी ओर समाज में अपराधों और विशेष रूप से महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार को लेकर वही हजारों वर्ष पुराना दकियानूसी व्यवहार……
विवेक ने जोशीमठ तक पहुंचने के लिए सड़क के रास्ते को चुना। टैक्सी से यात्रा करने के दौरान यहां के हर भाग से हिमालय का अद्वितीय सौंदर्य दिखाई देता है। नगपति हिमालय, हजारों वर्षों से भारत की सीमाओं का रक्षक और पहाड़ी घुमावदार रास्तों से इसके श्वेत धवल शिखर इसकी विशालता और दिव्यता की अनूठी अनुभूति कराते हैं।
विवेक ने जोशीमठ पहुंचकर वहां के समीप के पहाड़ी क्षेत्र में आचार्य सत्यव्रत के बताए एक आश्रम में रात्रि विश्राम किया। इस क्षेत्र में पहुंचते ही उसे हिमालय की ठंडक का अहसास हो रहा था।सर्द हवाएं जैसे बंद कमरे में भी उसके भीतर की हड्डियों तक को कंपा रही थी।
भोजन के बाद रात्रि विश्राम से पूर्व विवेक ने आश्रम के प्रमुख आचार्य संपूर्णानंद से आगे की यात्रा के बारे में पूछा। मुस्कुराते हुए आचार्य ने कहा,"आचार्य सत्यव्रत ने जिस मठ के लिए आपको भेजा है,वह यहां से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है।
विवेक ने उत्सुकता से पूछा,"क्या भारत की स्कीइंग राजधानी औली के पहाड़ी क्षेत्र में?"
"आचार्य ने कहा," हां!उसी के आसपास लेकिन बर्फीली पहाड़ियों में एक अज्ञात जगह पर वह आश्रम बना हुआ है, जहां तुम्हें पहुंचना है। अभी तुम रात्रि विश्राम करो। कल यहां के एक मंदिर में भगवान बद्रीनाथ के दर्शन करने के बाद आगे की चढ़ाई प्रारंभ करना।"
विवेक अपने कक्ष में आ गया उसका मन अनेक तरह की जिज्ञासाओं से भरा था। रात्रि में वह बहुत देर तक आचार्य द्वारा एक विशेष दायित्व के तहत यहां भेजे जाने को लेकर चिंतन मनन करता रहा।अगले दिन भगवान बद्रीनाथ के दर्शन करने के बाद उसने आचार्य जी द्वारा नियुक्त किए गए उनके एक शिष्य ज्ञानानंद के साथ पहाड़ी चढ़ाई प्रारंभ की।चढ़ाई लंबी और थका देने वाली थी। ज्ञानानंद जी के साथ उसकी मित्रता हो गई और वे बीच-बीच में सुंदर प्राकृतिक दृश्य वाले पहाड़ी स्थानों के मध्य विश्राम भी करते रहे। ज्ञानानंद बीच-बीच में मिलने वाले इक्का-दुक्का वृक्षों और वनस्पति पौधों की विशेषताओं से विवेक को अवगत भी कराते रहे। एक सरोवर के पास उन्हें दिव्य और दुर्लभ ब्रह्म कमल के भी दर्शन हुए। यह फूल कई महीनों में एक बार ही खिलते हैं।वे दोनों लगभग आठ घंटे में स्वामी मुक्तानंद के मठ तक पहुंच गए।ज्ञानानंद में अद्भुत क्षमता थी। विवेक को द्वार पर पहुंचाकर और वहां उनका परिचय कराकर वे तत्काल वापस लौट गए।
स्वामी मुक्तानंद का आश्रम मध्य हिमालय श्रृंखला के पर्वतों की एक संकरी घाटी में बना हुआ है।स्वयं उनका निवास एक पहाड़ी गुफा के साथ संबद्ध कर बनाए गए भवन में है।संपूर्ण आश्रम किसी एक समतल जगह पर नहीं है। आसपास अनेक छोटी पहाड़ियां और ऊंची नीची जमीन है। पास में धौली गंगा नदी बहती है। यह वन क्षेत्र भी है।पहाड़ की ऊंचाइयों से बहकर नीचे आती हुई यह नदी चांदी की एक चमकीली रेख की अनुभूति कराती है।
क्रमशः
योगेंद्र