भोग से भी बड़ा आनंद:-
रोहित ने उस बांसुरी को श्रद्धा पूर्वक अपने मस्तक से लगाया और आंखें बंद कर भगवान कृष्ण की स्तुति की। अगले एक क्षण रोहित ने अपनी आंखें खोली और उस बांसुरी को अपने दाहिने हाथ में लेकर ध्यान तथा मंत्र उच्चारण शुरू किया……
उसने अपने दाहिने हाथ में बांसुरी लेकर उसे आकाश की ओर ऊपर उठाया,फिर उसने बांसुरी को हथेलियों के मध्य में रखकर हाथ जोड़े।वह अपने दोनों हाथ जोड़े और आंखें बंद कर प्रार्थना के मंत्र बुदबुदाने लगा।उसने अगले ही क्षण भारत से हजारों किलोमीटर दूर युद्धक्षेत्र में बड़ी तेजी से आगे बढ़ रही उस विनाशक मिसाइल की दिशा बदल जाने और मानव रहित निर्जन स्थान या समुद्र में उसके निष्प्रभावी होकर गिर जाने का आह्वान कर डाला।
धीरे-धीरे रोहित की मानसिक तरंगों में अपार शक्ति आती गई………. एक अद्भुत घटना हुई।विनाशक मिसाइल ने अचानक अपना रास्ता बदला और मानव क्षेत्र में पहुंचकर तबाही मचाने के बदले वह सुदूर प्रशांत महासागर के ठीक मध्यभाग की अथाह जल राशि को चीरती हुई हजारों मीटर की गहराई वाले समुद्र के निचले तल से जा टकराई।महासमुद्र के बीच में सुनामी की सी लहरें उठने लगीं............... रोहित मुस्कुरा उठा और यह महाविनाश टल जाने पर उसने राहत की सांस लेते हुए अपने कान्हा जी को धन्यवाद दिया।
रोहित ने अपनी साधना पूरी कर गुरु मुक्तानंद से वापसी की अनुमति सँगी। जब रोहित गुरु मुक्तानंद के कक्ष में पहुंचे तो वे ध्यानमग्न थे। रोहित कुछ देर वहाँ खड़े रहे। शीघ्र ही गुरु मुक्तानंद के चेहरे की भावभंगिमा बदली और वे मुस्कुरा उठे। उन्होंने आँखे बंद किए हुए ही कहा, “आओ रोहित ! आसन ग्रहण करो।"
आँखें बंद किए हुए ही गुरु द्वारा स्वयं को पहचान लेने पर रोहित को आश्चर्य नहीं हुआ । उसे इस बात पर गर्व की अनुभूति हुई। उसने आगे बढ़कर गुरु के चरण स्पर्श किए।
“प्रणाम गुरुदेव ।" रोहित ने कहा।
" आयुष्मान भव: रोहित ।"
मुक्तानंद जी ने अपनी आँखें खोली। उन्होंने कहा,
“ तो तुम पर स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा है रोहित ! कल जिस तरह से तुमने दिव्य शक्ति का आह्वान और उपयोग कर महाविनाश को रोका है, वह विलक्षण है। रोहित ने गुरु के समक्ष अपनी जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा,
“ मैं स्वयं भी इस बात पर चमत्कृत हूँ गुरुदेव कि कल मुझे एकाएक अनिष्ट होने का आभास कैसे हुआ। थोड़ा और ध्यान लगाने पर मुझे विश्व के दो देशों के मध्य भीषण लड़ाई और उसमें
विनाशक प्रक्षेपास्त्र के प्रयोग का ज्ञान हुआ।"
"इसका ज्ञान तो तुम्हें होना ही था वत्स! जिन परिस्थितियों में तुम हिमालय की बर्फीली हवा में सुन्न पड़ते जा रहे शरीर के साथ जीवन और
मृत्यु से संघर्ष कर रहे थे। उसमें तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ है।" मुक्तानंद जी ने कहा।
“यह मैंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है गुरुदेव ।
अगर कान्हा जी जैसा दिखने वाले वे सिद्ध पुरुष वहाँ नहीं पहुँचते, तो निश्चय ही मेरी हिम समाधि बन जाती। पर वे थे कौन गुरुवर ? उनके द्वारा इस बांसुरी को दिए जाने का क्या रहस्य है? उस दिव्य शक्ति के दर्शन मुझे स्वप्न में हुए थे या यथार्थ में?” रोहित ने अपना चरम कौतुहल व्यक्त करते हुए बांसुरी गुरु के हाथों में रखी।
“अगर कान्हा स्वप्न थे तो यह बांसुरी यथार्थ है रोहित ! इसमें दिव्य शक्तियाँ हैं। कान्हा जी की उपस्थिति का आभास होना भी जीवन में एक बड़ी आध्यात्मिक उपलब्धि है। तुम्हें अपनी दिव्य अनुभूतियों के संबंध में स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुंचना है। यह याद रखना कि इस बांसुरी के रूप में तुम्हें एक बड़ा उत्तरदायित्व मिला है।" बांसुरी को प्रणाम करते हुए स्वामी मुक्तानंद ने कहा।
रोहित ने पूछा, " कैसा उत्तरदायित्व गुरुदेव?"
“ इस वसुधा को आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत बनाना। इस संसार में हिंसा, अन्याय, दुःख और निराशा के स्थान पर स्थाई शांति, न्याय, परम आनंद और प्रबल आशावाद की स्थापना करना। यह सिद्ध करना कि प्रकृति में सबके लिए विपुल संसाधन है। ईर्ष्या, लोभ और स्वार्थवृत्ति के छोड़ देने पर भोगवाद स्वयं समाप्त हो जाएगा। भोग का सुख तो क्षणिक होता है लेकिन अगर यह उपलब्धि प्राप्त हो जाए तो भोग के आनंद से बढ़कर महाआनंद प्राप्त होता है और यह जागरण की अवस्था है। यही मनुष्य की अंतर्निहित शक्तियों का प्रकटीकरण है । इसी से हम व्यक्ति से समाज की ओर बढ़ते हैं।रोहित, निश्चय ही भोग के स्थान पर सुख-शांति, आध्यात्मिकता और सर्व-कल्याण के दौर की वापसी होगी। इस प्रक्रिया में तुम्हारी यह बांसुरी एक न्याय दंड के रुप में कार्य करेगी।"
गुरुदेव ने समझाया ।
" तो यह बाँसुरी साक्षात भगवान श्री कृष्ण की है? रोहित ने पूछा।
" तुम्हारे द्वारा इस बांसुरी की सहायता हो धरती पर महाविनाश को रोकने से तो यही संकेत मिला है रोहित ! जिस तरह प्रशांत महासागर के तल में महाविस्फोट और सुनामी का समाचार मिला है, उससे यह स्पष्ट है कि भूतल पर इसके टकराने से महाविनाश हो सकता था। अगर यह महा संकट टला है तो यह बांसुरी भी असाधारण है।" मुक्तानंद जी ने समझाया।
“विज्ञान की कसौटी पर यह बात अवास्तविक ही लगती है गुरुदेव कि इस दिव्य बांसुरी में इतनी क्षमता है कि यह विनाशक मिसाइल से रक्षा के लिए कोई सुरक्षा चक्र बना दे, या उस मिसाइल की दिशा ही परिवर्तित कर दे।" रोहित ने फिर संदेह प्रकट किया ।
“इसी बात का तो तुम्हें आगे- अनुसंधान करना है रोहित।क्या जिन साधनों से मिसाइल बनते हैं, वे दूसरी दुनिया के पदार्थ है?" - गुरु ने पूछा।
“नहीं स्वामी जी! धरती में पाए जाने वाले तत्व, उनसे बनने वाली मिश्रित धातुएं….इन्हीं से मिसाइलें भी अनुसंधान के बाद बनती हैं।" रोहित ने जवाब दिया।
“ तो मानव शरीर अगर अपने मन और प्राण की साधना कर ले तो ऐसे अस्त्र-शस्त्रों के विरुद्ध एक रक्षा प्रणाली का निर्माण कर ही सकता है। मनुष्य अगर साधना करे तो उसकी मानसिक एकाग्रता और कुंडलिनी जागरण के कारण उसमें अभूतपूर्व क्षमता का विकास अवास्तविक और अवैज्ञानिक नहीं है।” मुक्तानंद जी ने समझाया।
"जी गुरुदेव ! मैं बाँके बिहारी जी की साधना भक्ति और उनकी कृपा से प्रसाद स्वरूप इस बांसुरी के रहस्य को समझने की कोशिश करूँगा। मै इस दुर्लभ बांसुरी की चमत्कारिक शक्ति के प्रयोग की पात्रता धारण करने के लिए योग्य बनने की पूरी कोशिश करूँगा। अब मुझे प्रस्थान की आज्ञा दीजिए।” रोहित ने अनुमति मांगी।
“तथास्तु रोहित! प्रस्थान करो और भविष्य में मेरे संपर्क में रहना। शहर पहुंचकर महेश बाबा को मेरा प्रणाम कहना ।" मुक्तानंद जी ने रोहित को गले लगाते हुए कहा।
" जो आज्ञा गुरुदेव!” रोहित ने अपने गुरु को दंडवत प्रणाम किया।
रोहित अपने कक्ष में लौट गए….. वे इस आश्रम में आकर ऐसा अनुभव कर रहे हैं कि वे किसी आनंद लोक में पहुंच गए हैं और समूची वसुधा में उन्हें इसी आनंद संदेश का प्रसार करना है…..
एक प्रहर बाद रोहित अपना सामान लेकर कक्ष से बाहर निकल रहे हैं। उन्होंने नेहा के कक्ष की ओर देखा। नेहा के कक्ष में ताला लगा है। वह आगे अनुसंधान के लिए पहले ही अमेरिका प्रस्थान कर चुकी है। प्रज्ञा को एक सप्ताह पहले ही रूस और यूक्रेन युद्ध की रिपोर्टिंग के लिए टी. वी चैनल के निर्देश पर कीव की फ्लाइट पकड़नी पड़ी थी। आचार्य सत्यव्रत के बुलावे पर विवेक भी छत्तीसगढ़ लौट गया था। आचार्य के अनुसार विवेक को संसार में रहकर अपनी पढाई पूरी करने के बाद जनसेवा का स्पष्ट निर्देश मिल गया था। आश्रम के मुख्य द्वार तक पहुंचते - पहुंचते रोहित का मन भारी हो गया था। लेकिन मुक्तानंद जी के दो शिष्य उसे पहाड़ की ऊँचाई से निचली सड़क तक पहुंचाने के लंबे मार्ग में साथ देने के लिए वहाँ उसका इंतजार कर रहे थे। आखिर रोहित को अनेक दुर्गम पहाड़ी रास्तों से पैदल ही नीचे उतरना था। रोहित ने मुड़कर आश्रम की धरती को प्रणाम किया और आगे चल पड़ा।
(समाप्त)
(डॉ. योगेंद्र कुमार पांडेय)
(इस उपन्यास के दोनों खंडों के सभी अध्यायों का अध्ययन करने के लिए आपके प्रति हार्दिक आभार और कृतज्ञता….✍️🙏….जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा से परमात्मा तत्व की ओर बढ़ना और उस महा आनंद को पाने की खोज ही है। कथा का नायक रोहित इसी प्रयास में है।सृष्टि के उद्भव और मानव सभ्यता के विकास के संबंध में महर्षि वेदव्यास रचित श्रीमद्भागवत समेत रामायण,महाभारत आदि अनेक धर्मग्रंथों तथा अन्य रचनाओं में घटनाएं और रूपक ध्वनित होने वाली प्रेरक कथाएं उल्लिखित हैं।ये कथाएं आधुनिक जीवन के प्रश्नों को सुलझाने वाले अनेक प्रेरक जीवन सूत्र उपलब्ध कराती हैं।अनेक धर्म ग्रंथों, नृशास्त्रीय, ज्ञान- विज्ञान और इतिहास ग्रंथों में कई घटनाओं के अलग-अलग विवरण भी मिलते हैं। अतः यह दावा नहीं है कि यहां प्रस्तुत किए गए विवरण ही स्थापित और मान्य हैं। इस शृंखला में सभी उपलब्ध प्रसंग शामिल नहीं किए गए ।इस शृंखला में विभिन्न कड़ियों को पाठकों के सामने भक्तिभाव से स्वयं समझकर बोलचाल के शब्दों और वाक्यों के रूप में रखने और कहीं-कहीं रचनात्मक कल्पना से रूपांतरित कर अभिनव प्रस्तुति का मौलिक लेखकीय प्रयत्न किया गया। मुझे विश्वास है कि रोहित और नेहा की कहानी आपको अवश्य पसंद आई होगी…..
✍️🙏जय श्री कृष्ण🙏)