कुंम्भन का नाम सुनकर सब घबरा जाता है। और डर से इधर उधर देखने लगता है।
एकांश घबराते हुए कहता है----
>" क...कक....कहा वर्शाली ? मुझे तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है।
तब वर्शाली कहती है---
>" एकांश जी वो देखिये मेले के बिच में वो सुखा पेड़
दिख रहा है।
सभी उसी पेड़ को देखने लगता है पर कुछ दिखाई नहीं देता।
आलोक कहता है---
>" पर वहाँ तो कुछ दिखाई नहीं देता।
वर्शाली कहती हैं---
>" ध्यान से देखीए एकांश जी पेड़ के उस सुखी टहनी पर जो सिधे ऊपर की और गई है। उसी पर देखीए कुम्भन की आंखें दिखाई देगी आपको। जो उस पैड़ पर छुपा है।
तभी सब उसी टहनी पर देखने लगता है। कुछ दैर उन्हे कुछ दिखाई नहीं देता पर अचानक से उसी टहनी पर दो लाल लाल बड़ी - बड़ी आंखें दिखाई देता है। जो इतना भयानक है के सभी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। सभी का गाला डर से सुख जाता है।
एकांश वर्शाली से कहता है----
>" वर्शाली पता नहीं मेरा परिवार कहाँ पर है।
वर्शाली कहती है---
>" आप चिंता ना करे एकांश जी। आपके परिवार को कुछ नहीं होगा।
एकांश सबको फोन लगता है पर कोई फोन नहीं उठाता है। तभी एकांश का फोन रिंग होता है जिसमे गुना का कॉल आता है।
एकांश कहता है---
>" हैलो गुना कहाँ है यार तू ?
गुना कहता है---
>" मेला में हु यार।
एकांश गुस्से से से कहता है---
>" मेला में कहाँ पर ?
गुना कहता है---
>" अपने दुकान पर और कहाँ ।
गूना कहता है---
>" ये तु कैसी सवाल कर रहा है यार मैं तो बस ये
बताने के लिए फोन किया के तुम्हारे मम्मी पापा मेरे दुकान पर है । तु भी आजा ।
इतना बोलकर गिना फोन काट देता है। एकांश गुस्से कहता है ---
>" स्टुपिड कमीना ।
एकांश को गुस्से मे दैखकर आलोक कहता है---
>" क्या बात है एकांश।
एकांश कहता है----
>" उस गूना से मैंने बार बार पुछा तेरा दुकान कहाँ पर वो एक ही जवाब देता है। मेला मे। बेवकुफ लोकेशन नहीं बता सकता।
तब आलोक कहता है---
>" ये अच्छी बात है ना के अंकल आंटी का पता चल गया अब चलो जा कर उन्हे यहां से घर लेकर जाते हैं।
एकांश कहता है--
इतने बड़े मेले मे उन्हे कहा ढुंढू ? गूना का दुकान कहां है अब ये ढुंढना पड़ेगा ।
आलोक कहता है---
ये चतुर है ना उसका पार्टनर, इसे सब पता है ।
एकांश चतुर से पुछता है---
>" तेरा दुकान कहा है चतुर।
चतुर अपना सिर झुकाए कहता है----
>" उसी पेड़ के पास जहां कुंम्भन है।
एकांश गुस्से से कहता है --
>" साले इतने बड़े मेले मे तुझे वही जगह मली थी ।
चतुर के इतना कहते ही एकांश घबरा जाता है। तो आलोक कहता है---
>" एकांश ये समय घबराने की नहीं है हमें किसी भी तरह बिना किसको बताये सबको वहाँ से निकालकर लाना है। ताकि कुम्भन को पता ना लगे के हमें उसके बारे में पता है। अब जल्दी चलो।
एकांश अपनी माथे की पसीना पौछता है य
और पेड़ के पास जाने लगता है। दुकान पर जा कर एकांश देखता है के सब वहाँ पर नाश्ता कर रहे हैं। तभी इंद्रजीत एकांश और आलोक को देखता है और अपने पास बुलाता है और कहता है---
>" अरे आ गए तुम सब आओ बेठो। देखो ना तबसे गुना कितना कुछ बनाकर खिला रहा हैं। और क्या अच्छा बना है। बहोत टेस्टी है ।
तभी मीना भी कहती है----
>" हां बेटा आना बैठ ।
एकांश अंदर से काफी घबराया हुआ था पर फिर भी वो हल्की मुस्कान देकर हां में अपना सर हिलाता है। इंद्रजीत की नजर एकांश के पास खड़ी वर्शाली पर जाता है।
वर्षाली का पुरा शरिर कपड़ों से ढका था और सिर्फ आंखें दिख रही थी। इंद्रजीत एकांश से पुछता है---
>" बेटा ये लड़की तुम्हारे साथ आई है क्या ?
एकांश हां में अपना सर हिलाता है और कहता है--
>" हां पापा।
लड़की का नाम सुनकर वृंदा एकांश के ऊपर गुस्सा होती है। इंद्रजीत वर्शाली से कहता है---
>" अरे बेटा यहां आओ हमारे साथ बैठो वहाँ पर क्यों
खड़ी हो।
तभी एकांश की चाची मीना उठती है और वर्शाली
का हाथ पकड़कर अपने साथ बैठाती है और कहती है--
>" आजा बेटा तू हमारे साथ आजा। इसलिए क्योंकि मैं एकांश को अच्छी तरह से जनता हूं। वो बहुत शर्मिला है वो तुम्हारे अच्छे से मेला नहीं घुमाया होगा।
तभी गुना वर्शाली के लिए एक प्लेट लगा देता है।
मीरा वर्शाली से कहती है---
>" अरे बेटा ये अपने चेहरे से कपड़ा तो हटाओ वर्ना खाओगी कैसे?
वर्षाली धीरे धीरे अपने चाहरे से कपड़ा हटाने लगती है। जैसे ही वर्षाली अपना कपड़ा चेहरे से हटाता है। सभी वर्शाली को देख कर देखता ही रह जाता है।
क्योंकी वर्शाली जैसी खूबसूरत लड़की किसीने आज तक नहीं देखी थी। सभी वर्शाली को एक टक देखने लगते हैं।
तभी मीना वर्शाली से पुछती है---
>" बेटा तेरा नाम क्या है?
वर्शाली कहती है-----
>" मेरा नाम वर्शाली है मां।
वर्शाली के मां कहने से सभी हल्की मुस्कान देता है। इंद्रजीत वर्शाली से पुछता है---
>" बेटा तुम कहाँ रहती हो ? पहले तो तुम्हें यहां कभी नहीं देखा। हमारे गांव की तो नहीं लगती।
वर्शाली कहती है----
>" मेैं यही पास में रहती हूं बाबा। पहले मेैं यह नहीं रहती थी।
तभी संपूर्ण वर्शाली के पास आ कर कहती है---
>" बहुत खूब। ..! वर्शाली तुम कितनी गोरी हो और कितनी सुंदर भी । ऐसा लग रहा है जैसे तुम यहां की हो ही नहीं। बिलकुल परी जैसी लग रही हो।
इतना बोलकर संपूर्णा वर्शाली को छुने लगती है और कहती है---
>" बहुत खूब...! तुम्हारी स्कीन कितनी सॉफ्ट है।
वर्शाली संपूर्णा की भाषा समझ नही पायी तो वर्शाली एकांश की ऐर दैखती है तो एकांश वर्शाली को इशारे से समझा देता है तो वर्शाली संपूर्णा से कहती है----
>" धन्यबाद संपूर्णा।
वर्शाली ने एकांश के फैमिली के सबका नाम लेकर बुलाने से सभी हैरान थे , एकांश भी। तभी सत्यजीत
वर्शाली से कहता है---
>" वर्शाली तुम हम सबके बारे में इतना कैसे जनते हो ?
वर्शाली कहती है---
>" वो चाचा जी एकांश हर समय आप सबके बारे में मैं बोलते रहते हैं इसीलिए ।
तभी गुना कहता है---
वर्शाली तुम वही हो ना , एकांश ने रात को तुम्हारा .....!
गुना के इतना बोले ही एकांश गुना की बात को काट ते हुए कहता है---
>" अब सिर्फ बोलते रहोंगे या हमे भी कुछ खिलाएगा।
गुना समझ जाता है के एकांश ने उसकी बात क्यूं काटी। ताकि सबको उस रात वाली का पता ना चले।
गुना एकांश और आलोक के लिए प्लेट लगा देता है और कहता है---
यार ये लड़की कोई अप्सरा है क्या , इतनी सुंदर लड़की मेंने आज तक नहीं देखा।
To be continue.....535