Pavitra Bahu - 4 in Hindi Moral Stories by archana books and stories PDF | पवित्र बहु - 4

The Author
Featured Books
Categories
Share

पवित्र बहु - 4

अगली सुबह जैसे ही सूरज ने आँगन पर हल्की किरणें डालीं, चित्रा ने अपनी आँखें खोलीं। रात भर का दर्द आँखों के नीचे बैठा था, पर चेहरे पर अब भी वही शांत, संयमित मुस्कान थी। वह धीरे से उठी, अपने आँचल को ठीक किया और बाहर आँगन में आ गई। सामने तुलसी चौरा था। हल्की हवा में उसकी पत्तियाँ झूम रही थीं।
उधर बगल वाले घर से कदमों की आहट आई।
जेठानी।
उसकी नज़र जैसे ही चित्रा पर पड़ी, होंठों पर एक बनावटी मुस्कान आ गई।
“तो बहूरानी… कैसी रही रात?”
आवाज़ में मीठा ज़हर था।
चित्रा ने कुछ पल के लिए उसकी ओर देखा, फिर शांत स्वर में बोली,
“ठीक रही दीदी… भगवान की दया है।”
“हूँ…”
जेठानी ने होंठ चीपे।
“सब कुछ… अच्छा रहा?”
उसने जान-बूझकर जोर देकर कहा।
चित्रा ने हल्की-सी नम्र मुस्कान दे दी। कुछ बोली नहीं।
चुप्पी ही उसका जवाब थी।
उधर ससुर जी बाहर आए। चित्रा तुरंत उनके चरणों में झुक गई।
“जीते रहो…”
ससुर जी ने सिर पर हाथ रखा।
फिर चित्रा सीधी जाकर मंदिर में दीया जलाने लगी। फिर किचन में जाकर काम संभाल लिया। खाना बनाया। पूजा की। घर सजा-समेटा। और फिर दिव्यम के बच्चे को गोद में उठा लिया।
बच्चा जैसे ही उसकी हथेली का स्पर्श महसूस करता, शांत हो जाता।
उसके चेहरे पर अपनापन झलकता था।
एक अजीब-सी शांति…
शायद वही, जो उसे कभी नहीं मिली थी…
और बच्चा वही पा रहा था।
जेठानी दरवाज़े पर खड़ी सब देख रही थी।
उसकी आँखों में गुस्सा, जलन और खतरनाक चमक थी।
“यह तो सच में घर पर छा गई।”
उसके मन में ख्याल आया।
“दिव्यम के दिल तक पहुँच जाएगी… बाबूजी का भी दिल जीत लेगी… फिर ये घर, ये जायदाद, ये परिवार… सब इस औरत के हाथ चला जाएगा।”
उसके हाथ अनायास कमर पर टिक गए।
उसके अपने दो बेटियाँ थीं।
लड़का नहीं।
और इस घर का इकलौता बेटा…
दिव्यम का बच्चा था।
“अगर ये बच्चा जिंदा रहा… तो सब उसी को मिलेगा।”
उसकी आँखें सख़्त हो गईं।
“नहीं… ऐसा नहीं होने दूँगी।”
तभी एक और ख्याल उसके दिमाग में कौंधा—
गाँव की दादी सास़…
घर की सबसे बुज़ुर्ग… सबसे कड़क।
जिसकी आँख के सामने कोई सांस ले, और वह गिन न ले— ऐसा मुश्किल था।
उसका स्वभाव इतना कड़ा कि घर के आदमी भी उसके आगे हाथ खड़े कर देते।
जेठानी के होंठों पर चालाक मुस्कान आई।
“अगर दादी यहाँ आ गई…”
“तो चित्रा की जिंदगी नर्क बन जाएगी…”
“फिर यह घर नहीं संभाल पाएगी… टूट जाएगी… हार जाएगी…”
उसने मन ही मन फैसला कर लिया।
उधर घर के भीतर का माहौल बदल रहा था।
चित्रा बच्चे को गोद में लिए हल्के-हल्के लोरी सुना रही थी।
उसकी आँखों में ममता थी… सच्ची… निष्कपट।
दिव्यम दरवाज़े के पास खड़ा था।
चुपचाप देख रहा था।
वह जानता था—
यह लड़की टूटी हुई है।
पर इस टूटन में भी वह किसी की जिंदगी सवार रही है।
उसके दिल में पहली बार उसे लेकर एक स्नेह, एक सम्मान सा जन्म लेने लगा था।
“कितनी मजबूत है यह…”
उसने सोचा।
“अपने दर्द के साथ भी… किसी और के लिए मुस्कुराना आसान नहीं।”
तभी जेठानी अंदर आई।
हाथ में चाय।
चेहरे पर माँ जैसी चिंता की एक्टिंग।
“अरे… थक गई होगी… इतने काम कर लिए…”
वह बोली।
चित्रा ने विनम्रता से सिर झुका दिया।
“नहीं दीदी, मैं ठीक हूँ…”
“बहुत सर्विस कर रही हो इस घर की…”
जेठानी ने बात को मीठाई में लपेटा।
“लेकिन ध्यान रखना… हर जगह इतनी इज़्ज़त नहीं मिलती… घर में बड़ी-बूढ़ियाँ जैसी भी आएँ… उनका मिज़ाज झेलना पड़ता है।”
चित्रा समझ नहीं पाई।
पर उसके दिल में हल्की-सी बेचैनी उतर गई।
रात को ही जेठानी ने अपने पति से बात की।
“दादी को शहर बुला लेते हैं।”
उसने कहा।
“उन्हें यहाँ रहना चाहिए… आखिर पोते की जिम्मेदारी है।”
असल बात कुछ और थी—
वह चाहती थी
दादी आए,
सख्ती करे,
और इस घर में चित्रा का साँस लेना भी मुश्किल हो जाए।
अगले ही दो दिनों में
घर में हलचल शुरू हो गई।
“दादी आ रही हैं।”
खबर फैली।
ससुर जी थोड़े शांत हो गए।
दिव्यम गंभीर।
और चित्रा—
बस चुप।
पर जिस बात ने सबसे ज़्यादा डराया—
वह यह था कि दादी सास़ के बारे में सुना गया था—
वह बच्चों से ज्यादा बहुओं से नफरत करती थी।
उसे बहुएँ कभी पसंद नहीं आती थीं।
और शहर की, पढ़ी-लिखी, सीधी, नरम बहू…
उसके लिए हमेशा आसान निशाना होती थी।
जेठानी अंदर ही अंदर खुशी से उबल रही थी।
उसे अब यकीन था—
“अब खेल शुरू होगा।”
जिस दिन दादी सास़ आई,
घर के बाहर गाड़ी रुकी।
दरवाजा खुला।
एक साठ-पैंसठ साल की कड़क चेहरे वाली बूढ़ी महिला उतरी।
कलाइयाँ पतली पर मजबूत।
आँखों में राख जैसी सख्ती।
चेहरा ऐसा कि कोई सीधे देख भी न पाए।
उसने अंदर आते ही निगाहें चारों तरफ घुमाईं।
जैसे किसी महकमे की जाँच करने आई हो।
चित्रा सामने खड़ी थी।
सिर पर आँचल, हाथ जोड़े।
“यही है नई बहू?”
उसने तीखी आवाज़ में पूछा।
जेठानी ने बनावटी मुस्कान के साथ कहा,
“हाँ दादी… यही है…”
दादी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।
ठंडी नज़र।
किसी कसौटी पर परख रही हो जैसे।
“ज्यादा सीधी बन रही है।”
उसने भीतर ही भीतर सोचा।
“देखते हैं असली रंग कब दिखाती है।”
उसी समय दिव्यम का बेटा रो पड़ा।
चित्रा झट से उसे उठाने गई।
दादी की आँखों में तेज़ चिंगारी चमकी।
“रुको!”
उसने कठोर आवाज़ में कहा।
घर में सन्नाटा फैल गया।
चित्रा वहीं रुक गई।
हाथ हवा में स्थिर।
“पहले पूछो…”
दादी बोली,
“किस हक़ से गोद उठाती हो?
अभी कौन हो तुम इस घर में?
बीवी… या बस मेहरबानी से बैठी हुई औरत?”
जेठानी के होंठों पर जीतभरी मुस्कान आई।
यही तो चाहती थी वह।
ससुर जी भी चुप।
दिव्यम भी स्तब्ध।
चित्रा के सीने में जैसे कुछ टूट गया—
पर चेहरा न झुका,
न आवाज़ टूटी।
उसने धीरे से बच्चा फिर भी उठा लिया—
और प्यार से सीने से लगाया।
बच्चा शांत हो गया।
दादी ने ये देखा—
और अंदर एक अजीब-सी चिढ़ उठी।
“ये औरत…
इतनी आसानी से टूटेगी नहीं।”
उधर जेठानी ने अपनी साजिश का दूसरा पन्ना खोल दिया।
अब उसके मन में एक और खतरनाक सोच जन्म ले चुकी थी—
“अगर बच्चा ही नहीं रहेगा…
तो न वारिस रहेगा,
न यह चित्रा किसी काम की।”
उसके चेहरे पर धीमी, खतरनाक मुस्कान फैल गई।
खेल शुरू हो चुका था।
नाटक नहीं—
एक साज़िश।
और यह साज़िश…
सिर्फ़ चित्रा की जिंदगी नहीं—
दिव्यम के बच्चे की साँसों पर भी छाया बनकर उतरने वाली थी।
अब देखना था—
क्या चित्रा फिर टूटेगी…
या इस बार…
अपने ही दर्द से ताकत बनकर सामने खड़ी होगी।