इच्छा : प्रेम या प्रेत
खाई के किनारे खड़ा शक्ति काँप रहा था।
नीचे अंधेरा था… अंतहीन।
उसी अंधेरे से एक जानी-पहचानी खुशबू उठी—
इच्छा की।
“ये… ये मुमकिन नहीं…”
शक्ति की आँखों से आँसू बह निकले।
तभी अंधेरे से एक आकृति उभरी।
सफ़ेद कपड़ों में लिपटी हुई…
खुले बाल…
चेहरा झुका हुआ।
“इच्छा…?”
शक्ति की आवाज़ टूट गई।
वो धीरे-धीरे ऊपर आई।
उसके पाँव ज़मीन को छू ही नहीं रहे थे।
“शक्ति…”
उसकी आवाज़ वैसी ही थी—
नरम… काँपती हुई।
शक्ति आगे बढ़ा,
“मुझे माफ़ कर दो… मैं लौट आया हूँ… तुम्हें लेने…”
इच्छा ने सिर उठाया।
उसका आधा चेहरा वैसा ही था जैसा शक्ति याद करता था—
सुंदर… मासूम।
लेकिन आधा चेहरा…
जला हुआ।
हड्डियाँ झलक रही थीं।
एक आँख से खून बह रहा था।
शक्ति पीछे हट गया।
“डरो मत…”
इच्छा मुस्कुराई।
“मैं अभी भी वही हूँ… बस अब पूरी नहीं।”
उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया।
हथेली पर वही जलता निशान था।
“जिस रात तुम मुझे छोड़कर गए…”
उसकी आवाज़ भारी हो गई,
“उसी रात किले ने मुझे बुलाया।”
चारों तरफ़ फुसफुसाहटें गूँज उठीं—
‘वशीकारिणी की बेटी…’
‘अधूरी बलि…’
शक्ति ने रोते हुए कहा—
“मैं तुम्हें वापस ले चलूँगा… इस किले से दूर…”
इच्छा हँस पड़ी।
“बाहर?”
“शक्ति… मैं अब बाहर की नहीं रही।”
उसने शक्ति का हाथ पकड़ा।
हाथ ठंडा नहीं था…
जल रहा था।
शक्ति को झटका लगा—
उसे वही सब दिखने लगा जो इच्छा ने झेला था—
अकेलापन।
इंतज़ार।
खाई में गिरते वक़्त उसकी चीख।
और फिर—
वशीकारिणी की गोद।
इच्छा की आवाज़ उसके दिमाग़ में गूँजी—
“उसने मुझे मारा नहीं…
उसने मुझे बनाया।”
वशीकारिणी पीछे से प्रकट हुई।
उसकी आँखों में जीत थी।
“देख लिया?”
“प्रेम सबसे आसान रास्ता होता है वश में करने का।”
शक्ति घुटनों पर गिर पड़ा।
“इच्छा… बताओ… क्या तुम मुझसे अब भी प्यार करती हो?”
इच्छा झुकी।
उसका माथा शक्ति के माथे से लगा।
“हाँ…”
फिर फुसफुसाई—
“इतना… कि अगर तुम मेरे साथ नहीं आए…
तो मैं खुद तुम्हें खींच लूँगी।”
उसके गले के चारों ओर ठंडी उँगलियाँ कसने लगीं।
किले की दीवारों पर खून से लिखा उभर आया—
“प्रेम ही अंतिम बंधन है”
शक्ति समझ गया—
ये मिलन
मुक्ति नहीं…
आख़िरी परीक्षा है।
प्रेम जो श्राप तोड़ता है
किले की दीवारों पर खून से लिखा वाक्य धड़क रहा था—
“प्रेम ही अंतिम बंधन है”
वशीकारिणी की हँसी पूरे किले में गूँज रही थी।
“देखो शक्ति… तुम्हारा प्यार ही मेरा अस्त्र है।”
इच्छा के हाथ अभी भी शक्ति के गले में जमे थे।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
“इच्छा…”
शक्ति ने धीमे स्वर में कहा,
“अगर तुम अब भी मुझसे प्यार करती हो…
तो मुझे मारने से पहले सुन लो।”
इच्छा की आँखों में काला धुआँ उठने लगा।
लेकिन आँसू भी थे।
“मैं हर रात तुम्हारा इंतज़ार करती रही,”
वो रो पड़ी,
“हर रात यही सोचती रही—
आज आएगा… कल आएगा…”
वशीकारिणी गरजी—
“चुप! वो झूठ है! मैंने तुम्हें जन्म दिया है!”
शक्ति ने कांपते हाथों से इच्छा का चेहरा थामा।
उसका जला हुआ हिस्सा जलन छोड़ रहा था,
फिर भी उसने हाथ नहीं हटाया।
“गलती मेरी थी,”
उसकी आवाज़ भर्रा गई,
“लेकिन प्यार कभी मरा नहीं।
अगर मुझसे सज़ा चाहिए…
तो मुझे दो।
इच्छा को छोड़ दो।”
पूरा किला सन्न हो गया।
आत्माएँ रुक गईं।
हवा थम गई।
इच्छा के माथे पर उभरा काला निशान जलने लगा।
वो चीख उठी।
“नहीं!”
वशीकारिणी पीछे हट गई,
“ये नियम के ख़िलाफ़ है!”
शक्ति ने इच्छा को सीने से लगा लिया।
उसके सीने पर लिखा शब्द चमक उठा—
‘बलि अधूरी है’
और धीरे-धीरे बदल गया—
‘बलि स्वीकार’
इच्छा के चारों ओर उजली रोशनी फैलने लगी।
उसका जला हुआ चेहरा भरने लगा।
आँखों से काला रंग बहकर ज़मीन में समा गया।
वशीकारिणी चीखने लगी—
“प्रेम स्वार्थी होता है!
वो छोड़ देता है!
वो लौटता नहीं!”
शक्ति ने उसकी ओर देखा—
“मैं लौटा हूँ।”
तभी किले की नींव हिल गई।
दीवारों में दरारें पड़ने लगीं।
इच्छा ने शक्ति को देखा—
“अगर श्राप टूटेगा…
तो तुम्हें यहीं रहना होगा।”
शक्ति मुस्कुराया।
“अगर तुम्हारी ज़िंदगी की क़ीमत मेरी कैद है…
तो मंज़ूर है।”
इच्छा ने रोते हुए उसका माथा चूम लिया।
वो पल—
एक विस्फोट की तरह था।
रोशनी फटी।
आत्माएँ आज़ाद होकर आकाश में घुल गईं।
वशीकारिणी की देह दरारों में टूटने लगी।
“मैं अधूरी नहीं थी…”
वो चीखती रही,
“मुझे किसी ने चुना ही नहीं!”
और फिर—
वो राख बनकर बिखर गई।
किला ढह गया।
कुछ समय बाद…
सुबह की धूप।
किले का नामो-निशान नहीं।
गाँव वाले कहते हैं—
उस रात श्राप टूट गया।
लेकिन…
हर पूर्णिमा की रात
उस जगह दो परछाइयाँ दिखती हैं—
एक आदमी…
और एक औरत।
हाथों में हाथ डाले।
कहते हैं—
वो प्रेम था…
जिसने आत्मा को आज़ादी दी
और इंसान को अमर बना दिया।