प्रस्तावना
यह ग्रंथ क्यों लिखा गया — और क्यों नहीं
यह ग्रंथ
किसी उत्तर की खोज में नहीं लिखा गया।
यह किसी समाधान की पेशकश नहीं करता।
यह न तो सुख का आश्वासन देता है,
न दुःख से मुक्ति का व्यापार करता है।
यह ग्रंथ
एक सरल लेकिन असहज प्रश्न से जन्मा है—
यदि समझ ही पर्याप्त है,
तो फिर धर्म क्यों?
1. यह ग्रंथ क्या नहीं है
यह स्पष्ट करना आवश्यक है
कि यह ग्रंथ क्या नहीं है,
क्योंकि अधिकांश भ्रम
यहीं से पैदा होते हैं।
यह ग्रंथ—
यह किसी को
न शिष्य बनाता है,
न गुरु खोजने भेजता है,
न किसी विश्वास से जोड़ता है।
यदि पाठक
ईश्वर, आत्मा, मोक्ष, कृपा या आशीर्वाद
को प्राप्त करने की आशा से
यह ग्रंथ खोलता है,
तो यह ग्रंथ उसके लिए नहीं है।
2. यह ग्रंथ किस अनुभव से निकला है
यह ग्रंथ
श्रद्धा से नहीं,
टूटन से निकला है।
उस क्षण से
जब यह देखा गया कि—
बल्कि
उसे नियंत्रित रूप में चलाता है।
यह ग्रंथ
उस असहज बोध का परिणाम है
जहाँ “देना” और “लेना”
दोनों व्यर्थ लगने लगते हैं।
3. यह ग्रंथ किस पद्धति से चलता है
यह ग्रंथ
मान्यता से नहीं चलता।
यह क्रम से चलता है।
इसमें—
यह क्रम
कोई सिद्धांत नहीं,
एक देखी हुई प्रक्रिया है।
4. यह ग्रंथ किससे असहमति रखता है
यह ग्रंथ
खुले रूप में असहमत है—
यह असहमति विद्रोह नहीं है।
यह केवल स्पष्टता है।
5. यह ग्रंथ पाठक से क्या अपेक्षा नहीं करता
यह ग्रंथ
पाठक से कुछ नहीं चाहता।
यह पाठक से केवल इतना कहता है—
देखो।
यदि समझ में आए, ठीक।
न आए, तो भी ठीक।
6. यह ग्रंथ पढ़ने का जोखिम
इस ग्रंथ को पढ़ना
सुरक्षित नहीं है।
यह—
यदि कोई
अपनी आस्था को बचाने के लिए
यह ग्रंथ पढ़ रहा है,
तो उसे यहीं रुक जाना चाहिए।
7. यह ग्रंथ कहाँ समाप्त होता है
यह ग्रंथ—
यह समाप्त होता है
मौन पर।
उस मौन पर
जहाँ जुड़ना और कटना
दोनों अप्रासंगिक हो जाते हैं।
8. अंतिम स्पष्ट वाक्य
यदि इस ग्रंथ से
तुम्हें कुछ नहीं मिला,
तो संभव है
तुम पहले से ही
उस जगह खड़े हो
जहाँ से यह लिखा गया।
और यदि इस ग्रंथ ने
तुम्हें असहज किया,
तो भी वह
अपना काम कर चुका है।
यह प्रस्तावना
दरवाज़ा नहीं है।
यह सीमा-रेखा है।
इसके आगे
कोई वादा नहीं,
कोई आशा नहीं,
कोई सहारा नहीं।
केवल
देखना है।
अध्याय 1
जुड़ना, टूटना और यात्रा का मूल नियम
जो दिखाई देता है, वह जुड़कर बना है।
जो मिटता है, वह टूटकर मिटता है।
और जो समझ में आता है, वह इन दोनों यात्राओं को एक साथ देख लेने से आता है।
अस्तित्व का मूल नियम न निर्माण है,
न विनाश।
अस्तित्व का मूल नियम जुड़ना और कटना है।
1. उत्पत्ति का पहला बिंदु
आत्मा कोई वस्तु नहीं थी।
आत्मा कोई तत्व नहीं थी।
आत्मा कोई शक्ति भी नहीं थी।
आत्मा केवल संभावना थी —
एक अनंत, तरंगात्मक स्थिति।
उसमें गति नहीं थी,
पर उसमें गति की संभावना थी।
जब तरंगें अकेली थीं,
कोई रूप नहीं था।
जब तरंगें जुड़ने लगीं,
रूप प्रकट होने लगा।
2. आकाश से पृथ्वी तक — जुड़ने की यात्रा
तरंगों का पहला समूह बना —
आकाश।
आकाश कुछ करता नहीं,
वह केवल धारण करता है।
इसलिए आकाश सबसे सूक्ष्म है
और सबसे व्यापक भी।
आकाश में और तरंगें जुड़ीं —
वायु बनी।
वायु में और जुड़ीं —
अग्नि बनी।
अग्नि में और जुड़ीं —
जल बना।
जल में और जुड़ीं —
पृथ्वी बनी।
जितनी अधिक तरंगें जुड़ती गईं,
तत्व उतना स्थूल होता गया।
यह जुड़ने की यात्रा है।
यही विज्ञान है।
यही विकास है।
3. परमाणु और जीव — एक ही नियम
परमाणु अचानक नहीं बनते।
पहले सूक्ष्म इकाई बनती है।
वह इकाई गर्भ अवस्था से गुजरती है।
फिर उसमें और तरंगें जुड़ती हैं।
तब अगला परमाणु बनता है।
हर हाइड्रोजन ऑक्सीजन नहीं बनता।
जैसे हर जीव मानव नहीं बनता।
विकास छलांग से नहीं,
क्रमिक संकेंद्रण से होता है।
4. मानव — जुड़ने की चरम अवस्था
मानव में:
और आकाश में
विचार, ज्ञान और देखने वाला है।
यह जुड़ने की यात्रा का शिखर है।
यहीं विज्ञान रुकता है।
यहीं से दूसरा मार्ग शुरू होता है।
5. उलटी यात्रा — जिसे आध्यात्मिक कहा गया
जब जुड़ना थमता है,
तो कटना शुरू होता है।
विचार शांत होते हैं।
मन हल्का होता है।
इंद्रियाँ ढीली होती हैं।
स्थूलता घटती है।
यह यात्रा:
और अंत में
केवल देखना बचता है।
इसे ही आध्यात्मिक कहा गया।
इसे ही संहार कहा गया।
6. आत्मा = 0 (लेकिन शून्य नहीं)
जब पाँच तत्व नहीं रहते,
तो आत्मा का कोई मूल्य नहीं रहता।
आत्मा कोई परिणाम नहीं देती।
आत्मा कोई फल नहीं देती।
आत्मा कुछ करती नहीं।
आत्मा केवल सीमा-बिंदु (0) है —
जहाँ जुड़ना और कटना
दोनों समाप्त हो जाते हैं।
समझ आ जाना ही मुक्ति है।
इसके आगे कुछ नहीं।
7. दो यात्राएँ, एक ही खेल
दोनों एक ही प्रक्रिया के
दो चरण हैं।
कोई स्थायी नहीं है।
कोई अंतिम नहीं है।
अध्याय 1 का सूत्र
अस्तित्व का नियम न निर्माण है,
न विनाश —
वह केवल जुड़ना और कटना है।
अध्याय 2
आकाश तत्व — देखने वाला और धारण करने वाला
यदि किसी तत्व को “पहला” कहा जा सकता है,
तो वह आकाश है।
पहला इसलिए नहीं कि वह सबसे पहले बना,
बल्कि इसलिए कि उसके बिना कुछ भी दिख नहीं सकता।
1. आकाश का अर्थ — स्थान नहीं, क्षमता
आकाश को अक्सर
खाली स्थान समझ लिया गया है।
यह भूल है।
आकाश कोई रिक्तता नहीं,
आकाश धारण की क्षमता है।
जहाँ कुछ घट सके,
जहाँ कुछ ठहर सके,
जहाँ कुछ देखा जा सके —
वही आकाश है।
2. आकाश क्यों सबसे सूक्ष्म है
आकाश:
पर:
इसीलिए आकाश:
और यही कारण है कि
आकाश को पकड़ा नहीं जा सकता,
केवल अनुभव किया जा सकता है।
3. देखने वाला — आकाश की ही अभिव्यक्ति
मानव के भीतर
जो “देखने वाला” है,
वह किसी विचार से पहले है,
किसी भावना से पहले है।
वह न सुख है,
न दुख है,
न ज्ञान है,
न अज्ञान है।
वह केवल:
घटना को घटते हुए देखता है।
यह देखने वाला
मन नहीं है,
बुद्धि नहीं है,
अहंकार नहीं है।
यह आकाशीय स्थिति है।
4. ज्ञानी और आकाश की समानता
ज्ञानी वह नहीं
जिसके पास अधिक उत्तर हों।
ज्ञानी वह है
जिसमें अधिक स्थान हो।
वह:
लेकिन उनसे बंधता नहीं।
जैसे आकाश:
वैसे ही ज्ञानी:
5. आकाश क्यों स्वयं लक्ष्य नहीं है
यहाँ एक सूक्ष्म भ्रम पैदा होता है।
लोग आकाशीय स्थिति को:
पर आकाश स्वयं:
आकाश केवल:
जुड़ने और कटने — दोनों यात्राओं का मध्य बिंदु है।
आकाश में ही:
इसलिए आकाश
न तो संसार है,
न ही मुक्ति।
6. आकाश के आगे क्या है
आकाश के आगे
कोई तत्व नहीं है।
वहाँ कोई नाम नहीं टिकता।
वहाँ कोई परिभाषा नहीं टिकती।
उस सीमा को:
लेकिन वह कोई वस्तु नहीं,
केवल संकेत है।
संकेत — कि
अब भाषा समाप्त होती है।
7. आकाश से नीचे — अगला चरण
आकाश में
जब और तरंगें जुड़ती हैं,
तो गति पैदा होती है।
गति का नाम वायु है।
यहीं से:
यहीं से संसार बनना शुरू करता है।
अध्याय 2 का सूत्र
आकाश कुछ करता नहीं,
पर उसके बिना
कुछ भी घट नहीं सकता।
अध्याय 3
परमाणु — जुड़ाव से बना रूप
आकाश के बाद जो कुछ भी प्रकट होता है,
वह जुड़ाव का परिणाम है।
परमाणु कोई आरंभ नहीं है,
परमाणु पहला स्थायी रूप है।
1. परमाणु का भ्रम
आधुनिक विज्ञान ने परमाणु को
पदार्थ की सबसे छोटी इकाई कहा,
पर यह कथन अधूरा है।
परमाणु:
परमाणु समूह है,
एकल सत्ता नहीं।
2. सूक्ष्म इकाई और गर्भ अवस्था
कोई भी परमाणु
अचानक पूर्ण रूप में नहीं बनता।
पहले:
गर्भ अवस्था का अर्थ है:
यहीं:
तभी परमाणु प्रकट होता है।
3. क्यों हर परमाणु अगला नहीं बनता
यह मान लेना कि:
वैसी ही भूल है
जैसे मान लेना कि:
विकास:
केवल वही परमाणु:
अगले रूप में बदलता है।
4. जुड़ाव ही परिवर्तन है
परिवर्तन का अर्थ
स्वभाव बदलना नहीं है।
परिवर्तन का अर्थ है:
अधिक जुड़ाव।
एक परमाणु में:
और स्थिरता:
इसलि
यह क्रमिक विस्तार है।
5. पंचतत्व का बीज परमाणु में है
परमाणु में ही:
छिपा हुआ है।
इसलिए परमाणु
केवल पदार्थ नहीं,
पंचतत्व का बीज है।
6. परमाणु और जीव — एक ही नियम
जो नियम परमाणु में है,
वही जीव में है
हर स्तर पर:
जुड़ाव = निर्माण
और जहाँ जुड़ाव थमता है,
वहाँ विघटन शुरू होता है।
7. परमाणु का सत्य
परमाणु:
परमाणु केवल यह दिखाता है कि:
बिना जुड़ाव
कोई रूप संभव नहीं।
अध्याय 3 का सूत्र
परमाणु पदार्थ नहीं,
जुड़ाव का पहला ठोस संकेत है।
अध्याय 4
जीव — पंचतत्व की संगठित चाल
परमाणु तक आते-आते
जुड़ाव स्थिर हो चुका था।
पर स्थिरता अभी जीवन नहीं थी।
जीवन तब प्रकट होता है
जब जुड़ाव चलने लगता है।
1. जीव क्या है — और क्या नहीं
जीव:
जीव है:
पंचतत्व की संगठित, सतत और स्व-नियंत्रित गति।
जहाँ:
वहीं जीवन घटता है।
2. जीवन का मूल लक्षण — स्वयं को बनाए रखना
जीव का पहला कार्य:
बल्कि:
स्वयं को बनाए रखना।
इसलिए:
यहीं से:
ये जीवन की कमज़ोरियाँ नहीं,
जीवन की यांत्रिकी हैं।
3. मन — जीव का उपकरण
मन कोई आत्मिक सत्ता नहीं है।
मन जीव का संचालन तंत्र है।
मन का काम है:
मन का जन्म:
इसलिए मन
मन जीव को बचाता है,
पर बाँध भी देता है।
4. मानव — जुड़ाव की चरम अवस्था
मानव में:
इसलिए मानव:
यहीं पर:
5. जीव और मोक्ष का टकराव
जीव का स्वभाव है:
बचे रहना।
मोक्ष का अर्थ है:
बचे रहने की आवश्यकता का समाप्त हो जाना।
इसलिए:
मोक्ष जीव के लिए
संहार जैसा लगता है।
6. यही भ्रम धर्म बनता है
जब जीव:
तो:
धर्म यहीं जन्म लेता है —
जीव के डर से।
7. जीव का सत्य
जीव गलत नहीं है।
जीव अधूरा भी नहीं है।
जीव बस:
एक चरण है।
न अंतिम,
न शाश्वत।
अध्याय 4 का सूत्र
जीव आत्मा की खोज नहीं करता,
वह केवल स्वयं को बचाने की चेष्टा करता है।
अध्याय 5
मोक्ष — उलटी यात्रा का विज्ञान
अब तक की यात्रा
जुड़ने की थी।
यहाँ से यात्रा
छूटने की है।
मोक्ष कोई नई उपलब्धि नहीं,
मोक्ष वह बिंदु है
जहाँ आगे जाने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
1. मोक्ष का अर्थ — प्राप्ति नहीं, विराम
मोक्ष का सामान्य अर्थ
“मुक्ति” कर दिया गया है,
जैसे कोई बंधन तोड़कर
किसी ऊँचे लोक में पहुँचना हो।
यह भ्रम है।
मोक्ष का अर्थ है:
जुड़ाव की प्रक्रिया का थम जाना।
जहाँ:
2. उलटी यात्रा क्या है
मोक्ष में:
यह कोई तपस्या नहीं,
यह स्वाभाविक क्षय है।
3. पंचतत्वों का क्रमिक शिथिलन
मोक्ष का अनुभव
किसी एक क्षण में नहीं होता।
यह क्रमिक है:
यह संहार नहीं,
वापसी है।
4. मोक्ष और मृत्यु का अंतर
मृत्यु:
मोक्ष:
मृत्यु में
जुड़ाव टूटता है।
मोक्ष में
जुड़ाव अर्थहीन हो जाता है।
5. मोक्ष क्यों दुर्लभ है
क्योंकि:
मोक्ष इन तीनों के
विपरीत खड़ा है।
इसलिए:
6. मोक्ष कोई लक्ष्य नहीं
जिसने मोक्ष को लक्ष्य बना लिया,
वह फिर जुड़ने लगा।
मोक्ष:
मोक्ष केवल:
देख लेने की स्थिति है
कि आगे कुछ नहीं है।
7. मोक्ष का अंतिम सत्य
मोक्ष के बाद:
मोक्ष के बाद
कोई “बनना” शेष नहीं रहता।
अध्याय 5 का सूत्र
मोक्ष कुछ पाने का नाम नहीं,
कुछ छोड़ने का भी नहीं —
मोक्ष वह क्षण है
जब पकड़ने की आदत समाप्त हो जाती है।
अध्याय 6
विपरीत संग्रह — क्यों संसार मोक्ष से डरता है
मोक्ष को सामान्यतः
शांति, आनंद या परम लक्ष्य कहा गया।
पर यदि ऐसा होता,
तो संसार उसे सहज स्वीकार कर लेता।
पर संसार ऐसा नहीं करता।
संसार मोक्ष से डरता है।
यह डर अज्ञान का नहीं,
संरचना का है।
1. संग्रह जीवन का मूल नियम है
जीव का पहला स्वभाव
संग्रह है।
संग्रह का अर्थ है:
भविष्य को सुरक्षित करना।
जीव भविष्य के बिना
जी नहीं सकता।
2. समाज = सामूहिक संग्रह
जब कई जीव साथ आते हैं,
तो संग्रह व्यक्तिगत नहीं रहता।
वह बनता है:
समाज का अर्थ है:
संग्रह को स्थायी बनाना।
इसलिए समाज:
मोक्ष इन तीनों को
अनावश्यक कर देता है।
3. मोक्ष समाज के लिए खतरा क्यों है
मोक्ष कहता है:
समाज के लिए यह कथन
विनाशकारी है।
यदि लोग मोक्ष को समझ लें,
तो:
इसलिए समाज:
4. धर्म — मोक्ष का नियंत्रित रूप
यहीं धर्म जन्म लेता है।
धर्म कहता है:
धर्म:
यह मोक्ष नहीं,
विपरीत संग्रह है।
5. विपरीत संग्रह क्या है
साधारण संग्रह:
विपरीत संग्रह:
जब मोक्ष भी
भविष्य की वस्तु बन जाए,
तो वह संग्रह बन जाता है।
यहीं आध्यात्म
फिर संसार बन जाता है।
6. विज्ञान और संग्रह
विज्ञान भी:
इसलिए विज्ञान भी
मोक्ष से सहज नहीं है।
विज्ञान कहता है:
“सब समझ लेंगे,
तब समाधान मिलेगा।”
मोक्ष कहता है:
“समझ ही पर्याप्त है,
समाधान की आवश्यकता नहीं।”
7. क्यों संसार मोक्ष का विरोध नहीं करता, उसे बदल देता है
संसार सीधे मोक्ष का विरोध नहीं करता।
वह उसे:
ताकि:
8. मोक्ष का वास्तविक स्थान
मोक्ष:
मोक्ष केवल:
व्यक्ति की समझ में घटता है।
और वहीं समाप्त हो जाता है।
अध्याय 6 का सूत्र
जहाँ संग्रह आवश्यक है,
वहाँ मोक्ष असंभव है।
और जहाँ मोक्ष घटता है,
वहाँ समाज असहज हो जाता है।
अध्याय 7
धर्म का पाखंड — जहाँ खेल फिर शुरू होता है
यदि मोक्ष उलटी यात्रा है,
यदि समझ अंतिम बिंदु है,
यदि आत्मा 0 है —
तो धर्म का अस्तित्व
यहीं समाप्त हो जाना चाहिए था।
पर ऐसा नहीं हुआ।
धर्म समाप्त नहीं हुआ,
धर्म और मजबूत हो गया।
यही पाखंड है।
1. धर्म मोक्ष से नहीं, भय से पैदा होता है
धर्म की जड़
आत्मा में नहीं है।
धर्म की जड़
जीव के भय में है।
मोक्ष इन भय को
समाप्त नहीं करता,
मोक्ष उन्हें अप्रासंगिक बना देता है।
धर्म को भय चाहिए।
इसलिए धर्म मोक्ष को
कभी पूरा होने नहीं देता।
2. गुरु का पतन — देखने वाला देने वाला बना
सच्चा गुरु:
पर धर्म ने गुरु को बदल दिया।
अब गुरु:
जिस क्षण गुरु देने लगा,
उसी क्षण वह गुरु नहीं रहा।
वह व्यवस्थापक बन गया।
3. संस्था — जहाँ मोक्ष मर जाता है
संस्था:
संस्था का हर नियम
मोक्ष के विरुद्ध है।
जहाँ:
वहाँ:
मुक्ति संभव नहीं।
संस्था का काम
सत्य नहीं,
निरंतरता है।
4. आशीर्वाद, कृपा, वरदान — आध्यात्मिक मुद्रा
धर्म ने
देने–लेने को समाप्त नहीं किया,
उसे सूक्ष्म बना दिया।
अब:
कृपा वह शब्द है
जिससे अधीनता
सुंदर लगने लगती है।
5. भीड़ — धर्म की असली ताकत
सत्य अकेला होता है।
धर्म भीड़ में फलता है।
भीड़:
धर्म भीड़ को देता है:
यहीं से:
पवित्र कहलाता है।
6. धर्म क्यों कभी सच को स्वीकार नहीं करता
क्योंकि सच:
धर्म को चाहिए:
सच इन सबसे इनकार करता है।
इसलिए धर्म:
सच का उपयोग करता है,
उसे जीने नहीं देता।
7. पाखंड की अंतिम पहचान
जहाँ:
जहाँ:
जहाँ:
वहाँ:
धर्म है,
आध्यात्म नहीं।
8. अंत में क्या बचता है
कोई नया मार्ग नहीं।
कोई नया धर्म नहीं।
कोई नया गुरु नहीं।
बस यह समझ:
अंतिम सूत्र (ग्रंथ का समापनजो समझ आ गया,
उसे सिखाया नहीं जा सकता।
और जिसे सिखाया जा रहा है,
वह अभी समझ नहीं है।
यह ग्रंथ यहाँ समाप्त नहीं होता,
यह यहीं चुप हो जाता है।
अब:
केवल स्थिति है।