Bade Dil Wala - Part - 8 in Hindi Motivational Stories by Ratna Pandey books and stories PDF | बड़े दिल वाला - भाग - 8

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बड़े दिल वाला - भाग - 8

अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या शादी के बाद भी वीर के प्रेम में उलझी रही और अनुराग की गलती खोजने की कोशिश करती रही। अंततः वह बहाना बनाकर अपने मायके जाने की बात कहकर सीधे वीर के घर पहुँची, जहाँ भावुक मिलन के बीच वह अचानक असहज होकर उससे अलग हो गई। अब इसके आगे-

वीर को इतना उतावला होता देखकर अनन्या ने नाराज़ होते हुए कहा, "वीर, यह क्या ...? मैं कैसी हूँ ...? वहाँ मुझे कोई तकलीफ तो नहीं है? यह सब पूछने की तुमने ज़रूरत नहीं समझी और सीधे सेक्स करने के लिए उतावले हो गए।"

"तुम यह क्या कह रही हो अनु? कितना तड़पाया है तुमने मुझे। पहले भी कई बार तुमने ऐसी ही स्थिति में मुझे ख़ुद से दूर कर लिया था। आज भी तुम हमारे अधूरे प्यार को पूरा नहीं होने देना चाहतीं। यह तुम्हारा सुंदर बदन क्या सिर्फ़ देखने के लिए है। मैं तुम में खो जाना चाहता हूँ, डूब जाना चाहता हूँ। तुम अच्छी हो, ठीक हो, वह तो मुझे दिख ही रहा है। आओ हम एक हो जाएँ, दोनों के जिस्म की आग बुझा लें। क्या तुम मुझे पूरा नहीं पाना चाहतीं?" कहते हुए वीर ने फिर से अनन्या को अपनी बाँहों में भरकर अपने हाथों को आज़ादी देना चाही।

अनन्या ने कहा, "वीर, दूर हटो, मैं आज यहाँ इसलिए नहीं आई हूँ। मैं तुम्हारे साथ बात करने आई थी कि मैं कुछ भी करके अनुराग की गलतियाँ ढूँढ रही हूँ। उसके बाद नाराज होकर मैं पापा के घर चली जाऊंगी। फिर धीरे से तुम्हारे साथ शादी की बात भी कर लूंगी।"

"तुमने अनुराग के साथ रात ...?"

"यह क्या बक रहे हो तुम? मैंने अब तक उसे मुझे छूने की इजाज़त नहीं दी है। मैं तुम्हारी हूँ, यह तो मैं भी जानती हूँ परंतु आज यह सब नहीं वीर। बस थोड़ा-सा इंतज़ार और कर लो प्लीज। अभी मुझे जल्दी से घर जाना ह।"

वीर मन मसोस कर रह गया और अनन्या के बाय का जवाब उसे देना ही पड़ा।

अनन्या के जाते समय उसने कहा, "आई लव यू अनु, मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा।"

इसके बाद अनन्या अपने घर आ गई। उसे देखते ही उसके मम्मी-पापा बहुत खुश हो गए। वे उसके पास बैठकर उसकी ससुराल की बातें जानने के लिए बड़े ही उत्सुक हो रहे थे। परंतु अनन्या ने वहाँ के लिए रूखे-सूखे जवाब ही दिए।

तब योगेश ने पूछा, "क्या हुआ बेटा, क्या तू वहाँ खुश नहीं है?"

अनन्या ने बड़े मुरझाए स्वर में कहा, "नहीं पापा, खुश होने जैसा वहाँ कुछ भी नहीं है। 15 दिन भी कितनी मुश्किल से कटे हैं, मैं जानती हूँ।"

चिंतित होते हए योगेश ने पूछा, "अरे पर समस्या क्या है, वह तो बता? क्या सास-ससुर ..."

"नहीं-नहीं, वे दोनों तो बहुत अच्छे हैं।"

"तो फिर अनुराग ...?"

"उस बारे में मैं कुछ नहीं बता सकती, जाने दो ..."

"जाने दो ... भला यह क्या बात हुई?"

"नहीं पापा, कहा ना जाने दो। कुछ बताने लायक है ही नहीं।"

योगेश का माथा ठनका। उसके मन में अनुराग को लेकर कई तरह के नकारात्मक प्रश्न हलचल करने लगे।

उसने संगीता को अलग बुलाकर कहा, "संगीता, मामला गड़बड़ लग रहा है। कहीं अनुराग नपुंसक तो नहीं?"

"यह क्या कह रहे हो आप? ऐसा नहीं हो सकता।"

"क्यों नहीं हो सकता? अनन्या इसीलिए तो साफ-साफ बता नहीं पा रही है। तुम ज़रा अकेले में उससे पूछो।"

"हाँ-हाँ, मैं पूछती हूँ, परंतु अभी-अभी तो वह आई है। उसे एक-दो दिन ज़रा शांति से रहने दो, उसके बाद पूछ लूंगी।"

योगेश ने कहा, "ठीक है संगीता चलो अभी सो जाते हैं।"

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः