Jaagti Parchhai - 3 in Hindi Fiction Stories by Shivani Paswan books and stories PDF | जागती परछाई - 3

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जागती परछाई - 3

अगली सुबह मुझे सपने याद नहीं थे।
बस एक अजीब-सा बोझ था, जैसे रात में कुछ अधूरा रह गया हो।
डायरी मैंने नहीं खोली।
कम से कम, मुझे ऐसा ही लगा।
मैंने खुद से तय किया था कि आज उसे हाथ नहीं लगाऊँगी। कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनसे दूरी ही बेहतर लगती है, भले ही वो जवाब माँगते रहें।

ऑफिस का दिन सामान्य था। मीटिंग्स, ई-मेल, वही रोज़ का शोर। मैं सब कर रही थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे दिमाग़ का एक हिस्सा कहीं और अटका हुआ है।

दोपहर में कॉफी लेने गई तो रिसेप्शन पर एक पुरानी फाइल रखी दिखी। शायद किसी ने गलती से बाहर छोड़ दी थी। कवर थोड़ा मुड़ा हुआ था, किनारे पुराने लग रहे थे।
मैंने नज़र हटा ली।
फिर वापस देख लिया।
नाम साफ़ दिख रहा था।
Sarika.
इस बार दिल तेज़ नहीं धड़का।
इस बार… कुछ खिंच-सा गया।
मैंने फाइल उठाई नहीं। बस उसे वहीं देखते हुए खड़ी रही, जैसे नाम अपने-आप कुछ बोलेगा। ऐसा नहीं हुआ। लेकिन नाम अब अजनबी भी नहीं लगा।
मेरे दिमाग़ में एक सवाल उभरा—
मैं इसे पहले कहाँ देख चुकी हूँ?
काम के बाद घर लौटते समय रास्ता वही था, लेकिन ध्यान कहीं और था। खिड़की के बाहर की इमारतें पीछे छूट रही थीं और दिमाग़ में वही नाम आगे-पीछे घूम रहा था।

घर पहुँचकर मैंने सबसे पहले लाइट जलाई। कमरा वैसा ही था जैसा छोड़कर गई थी। राहत मिली।
मेज़ पर डायरी रखी थी।
बंद।

मैंने राहत की साँस ली और बैग नीचे रखा। तभी मेरी नज़र उसके नीचे रखे एक काग़ज़ पर पड़ी। कल वाला काग़ज़ नहीं था। नया था।
मैंने उसे उठाया।

इस बार लिखावट मेरी नहीं लग रही थी—
या शायद मैं बस ऐसा मानना चाह रही थी।
उस पर लिखा था—

नाम पढ़कर रुक गई थी।
अब याद आएगा।”

मेरे हाथ अपने-आप ढीले पड़ गए।
नाम।
मुझे समझ नहीं आया कि वो किस नाम की बात कर रहा है। या कर रही है। लेकिन जवाब ढूँढने में देर नहीं लगी।

मैंने डायरी खोली।
बीच के पन्नों में, जहाँ मैं कभी-कभी पुराने नोट्स लिखती हूँ, एक नाम बार-बार दिख रहा था। हल्के-हल्के लिखा हुआ। जैसे याद रखते-रखते थक गए हों।
Sarika.
मेरे गले में कुछ अटक-सा गया।
ये पहली बार नहीं था जब मैंने ये नाम लिखा हो।
ये बात मुझे सबसे ज़्यादा परेशान कर रही थी।
मैं कुर्सी पर बैठ गई। कमरे में कोई आवाज़ नहीं थी, फिर भी ऐसा लग रहा था जैसे कोई बहुत पास खड़ा है—
बिना दिखे, बिना छुए।

अब सवाल ये नहीं था कि ये सब हो क्यों रहा है।
सवाल ये था—
अगर ये नाम मेरी ज़िंदगी में पहले से था,
तो
मैंने इसे भूलने की इतनी कोशिश क्यों की?
और क्या भूलना
मेरी अपनी पसंद थी?

 तय किया था कि अब खुद को बहाने नहीं दूँगी।
अगर कुछ गलत है, तो उसे ऐसे ही छोड़ देना भी एक तरह की सहमति होती है।

डायरी मैंने दोबारा बंद कर दी, लेकिन इस बार डर से नहीं—सावधानी से। जैसे कोई चीज़ बहुत नाज़ुक हो, और ज़रा-सी लापरवाही उसे तोड़ दे।

Sarika का नाम दिमाग़ में घूम रहा था, पर मैंने उसे ज़ोर देकर याद करने की कोशिश नहीं की। कुछ यादें ज़बरदस्ती नहीं आतीं। उन्हें ऐसा माहौल चाहिए होता है जहाँ वे खुद को सुरक्षित महसूस करें।

ऑफिस पहुँचते ही मैंने उस फाइल के बारे में पूछा। रिसेप्शन पर बैठी लड़की ने सिर हिलाया।
“कौन-सी फाइल?”
उसके चेहरे पर कोई झिझक नहीं थी।