साये का बसेरा: 'अंधेरपुर' की अभिशप्त हवेली
: एक अनचाही यात्रा
कबीर एक खोजी पत्रकार था, जिसे रहस्यों को सुलझाने और अलौकिक घटनाओं के पीछे के सच को बेनकाब करने में महारत हासिल थी। वह भूतों पर विश्वास नहीं करता था; उसके लिए 'डर' सिर्फ एक रासायनिक प्रतिक्रिया थी जो दिमाग में होती थी। इसी विश्वास के साथ वह बिहार और नेपाल की सीमा पर स्थित एक छोटे से गांव 'अंधेरपुर' पहुँचा।
इस गांव का नाम नक्शे पर तो था, लेकिन वहाँ जाने वाले रास्ते सालों से बंद पड़े थे। गांव के बारे में मशहूर था कि 19वीं सदी में यहाँ के जमींदार 'ठाकुर रघुराज सिंह' ने अपनी पूरी हवेली के साथ आत्मदाह कर लिया था। लोगों का कहना था कि ठाकुर की आत्मा आज भी उस हवेली की रखवाली करती है और जो भी वहां जाता है, वह खुद एक साया बनकर रह जाता है।
गाँव के किनारे पहुँचते ही कबीर को एक बूढ़ा चरवाहा मिला। उसने कबीर के गले में लटका कैमरा और हाथ में टॉर्च देखी तो समझ गया। बूढ़े ने कांपती आवाज में कहा, "बेटा, उस हवेली की मिट्टी में खून की प्यास है। दिन की रोशनी वहाँ पहुँचती नहीं और रात की खामोशी वहाँ बात करती है। अभी लौट जाओ, सूरज ढलने वाला है।"
कबीर मुस्कुराया और बोला, "चाचा, मैं सच की तलाश में आया हूँ, सायों की नहीं।"
अध्याय 2: हवेली की दहलीज
शाम के सात बज रहे थे। धुंध ने पूरे इलाके को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। हवेली दूर से ही किसी विशाल दैत्य की तरह खड़ी नजर आ रही थी। उसके टूटे हुए बुर्ज आसमान को चीर रहे थे। कबीर ने जैसे ही हवेली के लोहे के गेट को धक्का दिया, एक ऐसी चीखने जैसी आवाज आई जिसने जंगल के सन्नाटे को चीर दिया।
हवेली के अंदर का नजारा भयानक था। चारों ओर सीलन की बदबू थी और फर्श पर सूखी पत्तियों और मलबे का ढेर लगा था। कबीर ने अपनी 'LED' टॉर्च जलाई। रोशनी की किरण जहाँ पड़ती, वहाँ धूल के कण नाचते हुए दिखाई देते। हॉल के बीचों-बीच एक विशाल झूमर लटका था, जो बिना हवा के भी धीरे-धीरे हिल रहा था।
कबीर ने अपना वॉइस रिकॉर्डर चालू किया और बोला, "मैं ठाकुर की हवेली के मुख्य हॉल में हूँ। यहाँ का तापमान सामान्य से काफी कम महसूस हो रहा है।"
अध्याय 3: सन्नाटे की सुगबुगाहट
कबीर ने हवेली की पहली मंजिल की सीढ़ियां चढ़नी शुरू कीं। लकड़ी की हर सीढ़ी उसके वजन से कराह रही थी। तभी उसे ऊपर से किसी के दौड़ने की आवाज आई— टप... टप... टप... जैसे किसी छोटे बच्चे के नंगे पैर पत्थर पर पड़ रहे हों।
वह रुक गया। उसने ऊपर की ओर टॉर्च घुमाई। वहाँ कोई नहीं था, सिर्फ अंधेरा था जो टॉर्च की रोशनी को निगल रहा था। जैसे ही वह आगे बढ़ा, उसे महसूस हुआ कि उसकी गर्दन पर कोई ठंडी सांस छोड़ रहा है। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ सिर्फ दीवार पर टंगी एक पुरानी, फटी हुई पेंटिंग थी।
पेंटिंग में ठाकुर रघुराज सिंह खड़े थे। उनकी आँखें इतनी सजीव थीं कि कबीर को लगा जैसे वे उसे ही घूर रही हैं। कबीर को अचानक लगा कि पेंटिंग में ठाकुर के हाथ की स्थिति बदल गई है। पहले हाथ कमर पर था, लेकिन अब वह हाथ ऊपर की ओर उठा हुआ था, जैसे किसी ओर इशारा कर रहा हो।
अध्याय 4: आईनों का कमरा
कबीर एक लंबे गलियारे में पहुँचा जहाँ दोनों तरफ बड़े-बड़े बेल्जियम ग्लास के आईने लगे थे। ये आईने धुंधले पड़ चुके थे, लेकिन उनमें कबीर की आकृति साफ दिख रही थी।
कबीर चलते-चलते रुक गया। उसने देखा कि आईने में उसकी परछाईं उसके रुकने के दो सेकंड बाद रुकी। यह असंभव था। उसने अपना दाहिना हाथ उठाया। आईने वाली परछाईं ने अपना बायाँ हाथ नहीं, बल्कि दाहिना ही हाथ उठाया। वह उसकी परछाईं नहीं थी, वह कुछ और था जो कबीर का रूप धरने की कोशिश कर रहा था।
अचानक, गलियारे के सभी आईने एक साथ चटकने लगे। कांच के टूटने की आवाज इतनी भयानक थी कि कबीर के कान सुन्न हो गए। उसने देखा कि हर टूटे हुए कांच के टुकड़े में ठाकुर का चेहरा दिख रहा था। हजारों ठाकुर उसे देखकर एक साथ अट्टहास (जोर से हंसना) कर रहे थे।
अध्याय 5: मुंशी का तहखाना
जान बचाकर कबीर नीचे की ओर भागा, लेकिन सीढ़ियां जैसे खत्म ही नहीं हो रही थीं। भागते-भागते वह एक गुप्त दरवाजे से टकराया जो नीचे तहखाने की ओर जाता था। वहाँ हवा इतनी भारी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था।
वहाँ एक पुरानी मेज पर मुंशी की डायरी पड़ी थी। कबीर ने डायरी खोली, उसमें लिखा था:
"ठाकुर पागल हो चुके हैं। उन्होंने अमर होने के लिए शैतान से सौदा किया है। वह इस हवेली को एक पिंजरा बनाना चाहते हैं जहाँ आत्माएं कभी बाहर न जा सकें। जो भी इस चौखट को पार करेगा, उसकी खाल ठाकुर ओढ़ लेंगे ताकि वह दोबारा दुनिया में लौट सकें।"
डायरी का आखिरी पन्ना ताजे खून से लिखा हुआ लग रहा था। उसमें कबीर का नाम लिखा था— "कबीर, तुम्हारा स्वागत है।"
अध्याय 6: खौफ का साक्षात्कार
तभी तहखाने का दरवाजा धड़ाम से बंद हो गया। टॉर्च की रोशनी फड़फड़ाने लगी। कबीर ने देखा कि दीवारों से काला धुआं निकल रहा है। वह धुआं धीरे-धीरे एक आकृति में बदलने लगा। वह ठाकुर रघुराज सिंह थे। उनका चेहरा आधा जला हुआ था और हड्डियों के बीच से आग की लपटें दिखाई दे रही थीं।
"तुमने सोचा था कि तुम यहाँ से सच लेकर जाओगे?" ठाकुर की आवाज कबीर के दिमाग के अंदर गूँजी।
कबीर ने भागने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जमीन से चिपक गए थे। उसने देखा कि फर्श धीरे-धीरे दलदल की तरह पिघल रहा है और उसमें से दर्जनों सफेद हाथ निकलकर उसके पैरों को जकड़ रहे हैं। वे उन लोगों की आत्माएं थीं जो कबीर से पहले यहाँ आए थे।
अध्याय 7: अंतिम संघर्ष
ठाकुर कबीर के करीब आए। उनकी आँखों में कोई पुतली नहीं थी, सिर्फ जलता हुआ कोयला था। उन्होंने कबीर का कैमरा उठाया और उसे अपने हाथों से कुचल दिया।
"यहाँ यादें नहीं बनतीं, यहाँ सिर्फ अंत होता है," ठाकुर ने कहा और अपनी लंबी, नुकीली उंगलियां कबीर के माथे पर रख दीं।
कबीर को महसूस हुआ कि उसकी यादें, उसका नाम और उसका अस्तित्व उससे छीना जा रहा है। उसे अपने बचपन की यादें धुंधली होती महसूस हुईं। उसे अपना नाम याद करने में तकलीफ होने लगी। वह चीखना चाहता था, लेकिन उसके मुँह से आवाज की जगह काली राख निकलने लगी।
अध्याय 8: सवेरा जो कभी नहीं आया
अगले दिन, गांव वालों ने देखा कि हवेली के गेट पर एक नया कैमरा पड़ा हुआ है। पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने जब हवेली की तलाशी ली, तो उन्हें कोई इंसान नहीं मिला।
लेकिन, जब उन्होंने हवेली की दीवार पर टंगी ठाकुर की उस पुरानी पेंटिंग को देखा, तो सबके होश उड़ गए। पेंटिंग में अब ठाकुर अकेले नहीं थे। उनके बगल में एक नया किरदार खड़ा था, जिसने पत्रकार जैसी जैकेट पहनी थी और उसके गले में एक कैमरा लटका था। पेंटिंग वाले कबीर की आँखों से खून के आंसू बह रहे थे और उसका चेहरा चीखने की मुद्रा में स्थिर हो गया था।
हवेली के अंदर का तापमान आज भी जमा देने वाला रहता है। गाँव के लोग कहते हैं कि आज भी अमावस की रात को हवेली से वॉइस रिकॉर्डर की आवाज आती है— "मैं कबीर हूँ... क्या कोई मुझे सुन रहा है? यहाँ बहुत अंधेरा है..."
निष्कर्ष
अंधेरपुर की वह हवेली आज भी खड़ी है। कबीर की तलाश में कई और लोग आए, लेकिन वे भी सिर्फ उस पेंटिंग का हिस्सा बन कर रह गए। उस हवेली की दीवारों को अब और पेंट की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि वे इंसानी रूहों के रंग से सजी हुई हैं।