जख्खड़ को ढूँढने निकली फ़ौज व्यवस्थित थी। सबसे आगे पुलिस बल—करीब पचास जवान, सुरक्षा वेस्ट पहने, हाथों में भारी टॉर्च। उनके पीछे धीरे-धीरे रेंगती पुलिस की जीपें। उनसे कुछ दूरी पर पुलिस की एक और टुकड़ी—लगभग सौ की संख्या में। उसके पीछे पशुपति बाबू और ठाकुर के करीब दो सौ हथियारबंद आदमी।
सबसे पीछे, एक भारी गाड़ी में—ठाकुर धुरंधर सिंह, पशुपति बाबू, करण और हीरा।
उन्हें ज़रा भी इल्म नहीं था कि जख्खड़ पहले से फील्डिंग लगाकर बैठा है।
फ़ौज जंगल को कवर करती हुई पत्थर की खदान के पास पहुँची ही थी कि एक पुलिस वाले का पैर ज़मीन में धँसे प्रेशर बम पर पड़ा। ज़मीन काँप गई। वह सिपाही हवा में फटा—उसके चिथड़े चारों तरफ़ बिखर गए। पुलिस की अगली पंक्ति झटके से उछल गई। धूल और आग के गुबार ने टॉर्च की रोशनी निगल ली।
“फ़ॉरवर्ड यूनिट डाउन!”
रेडियो पर घबराई आवाज़ गूँजी।
यही जख्खड़ का मौका था।
उसके लोग झाड़ियों से निकले। चारों तरफ़ से गोलियाँ बरसीं। दो जीपों के शीशे टूटे। एक बख़्तरबंद गाड़ी के टायर फट गए। पुलिस और ठाकुर के आदमियों को कुछ कदम पीछे हटना पड़ा।
“लेफ्ट फ्लैंक क्लियर करो!”
“कवर लो!”
जख्खड़ राइफल से गोलियाँ दागता, बंदूक को फिर सेट करता धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। चेहरे पर अजीब-सी शांति—जैसे यह जंगल उसी का हो। उसके इशारे पर ऊपर की चट्टान से दो बड़े पत्थर लुढ़के। नीचे खड़े तीन आदमी वहीं दब गए।
“भैया, हम जीत रहे हैं!”
किसी ने चिल्लाकर कहा।
एक पल के लिए सच में ऐसा ही लगा।
फिर आसमान फटा।
पीछे से भारी विस्फोट हुआ—फिर एक और। ये पुलिस द्वारा फेंके जा रहे हैंड ग्रेनेड थे। यह जख्खड़ की योजना में नहीं था। पुलिस ने जंगल के भीतर से रास्ता काट लिया था। जख्खड़ पर अब पीछे से भी हमला शुरू हो चुका था। घेरा कस गया—चारों तरफ़ से।
उसी बीच पुलिस पार्टी के बीचोंबीच से मशीनगन गरजी।
आग उगलने लगी।
जख्खड़ के पाँच आदमी एक साथ ढह गए। जवाबी फायर और तेज़ हो गया। ठाकुर की फ़ौज पोजीशन ले चुकी थी। पेड़ों और चट्टानों के पीछे से जख्खड़ गैंग पर गोलियों और ग्रेनेड्स की बरसात होने लगी।
“पीछे हटो!”
जख्खड़ चिल्लाया।
पर आवाज़ गोलियों में दब गई।
एक गोली उसके कंधे को छूती हुई निकल गई। वह लड़खड़ाया, पर गिरा नहीं। खून बह रहा था। उसने दाँत भींच लिए।
“भैया, आप निकलिए!” माधो चीखा। “मैं इन्हें रोकता हूँ।”
“माधो—” जख्खड़ वाक्य पूरा भी नहीं कर पाया था कि पास ही एक और ग्रेनेड फटा।
“जाइए भैया!” माधो गरजा। “आपसे ही हमारा गैंग है!”
अब यह लड़ाई नहीं थी।
यह बचाव था।
जख्खड़ के लोग एक-एक कर गिरते जा रहे थे। ऊपर से ड्रोन की हल्की भनभनाहट सुनाई देने लगी। जंगल अब मददगार नहीं रहा—वह दुश्मन बन चुका था।
माधो के इशारे पर गैंग से दस लोगों का दस्ता टूटा। कवर फायर करते हुए उन्होंने जख्खड़ को घेर लिया और तेज़ी से पीछे की ओर बढ़ने लगे।
जख्खड़ ने आख़िरी बार पलटकर देखा।
उसकी गैंग का बड़ा हिस्सा ज़मीन पर पड़ा था। जो बचे थे, वे लाशों और जलते हुए झाड़ों के बीच से कूदते हुए जान बचाकर भाग रहे थे।
उसने झाड़ियों में छलाँग लगाई।
एक मील दूर, गाड़ी में बैठे ठाकुर और पशुपति बाबू के चेहरे खिले हुए थे। ड्रोन की फ़ुटेज एक इलेक्ट्रॉनिक टेबलेट पर साफ़ चल रही थी—जख्खड़ की गैंग उखड़ती हुई दिख रही थी।
गोलीबारी कुछ देर और चली।
फिर धीरे-धीरे थम गई।
जंगल फिर चुप हो गया—पर अब उसमें जीत नहीं थी। सिर्फ़ लाशें और धुआँ।
कुछ देर बाद जख्खड़ के दस-बारह आदमी एक कतार में बैठाए गए थे—घुटनों के बल। कमीज़ें उतरवाई हुईं, हाथ सिर पर। उन्हीं में माधो भी था—ज़ख़्मी।
ठाकुर धुरंधर सिंह चलते हुए आए। हाथ में विदेशी हैंडगन। उन्होंने उसे खींचकर कॉक किया और माधो के माथे पर टिका दिया।
“क्यों बे माधो,” उन्होंने ठंडे स्वर में कहा, “खेल ख़त्म?”
माधो ने एक ओर थूका। खून की पिचकारी निकली।
“हरामज़ादे,” ठाकुर गरजे।
“रुकिए, पापा।” करण स्मार्टफोन लिए आगे बढ़ा। कैमरा ऑन किया।
फ़्रेम में सिर्फ़ ठाकुर धुरंधर सिंह का हाथ, बंदूक, और माधो का ज़ख़्मी चेहरा था—दाँतों से रिसता खून।
“नाम बोल।” करण की आवाज़ कड़क थी।
“माधव प्रसाद… क्रांतिकारी।”
“गैंग का नाम?”
“जख्खड़ का काफ़िला।”
करण ने ठाकुर को इशारा किया।
बंदूक गरजी।
माधव का माथा फटा। सिर पीछे झटका।
अब करण ने फोन घुमाकर बाक़ी बंदियों की तरफ़ किया। पीछे से गोलियाँ चलीं। छलनी होते हुए एक-एक कर वे सब लाशों में बदल गए।
कैमरा ऑफ़ हुआ।
करण उठ खड़ा हुआ।
एक पुलिसवाला सहमा हुआ आगे बढ़ा। “ये वीडियो… बाद में डिलीट कर दीजिएगा करण बाबू।”
“चुप बे गधे,” करण गरजा। “डिलीट नहीं—ये वीडियो वायरल होगा। अब सोशल मीडिया का खेल हम भी खेलेंगे। देखते हैं कौन जॉइन करता है इनकी गैंग।”
“शाब्बाश, बेटे,” पशुपति बाबू के मुँह से निकला। फिर पुलिसवाले की ओर मुड़े। “अबे, जख्खड़ की लाश ढूँढ। जल्दी।”
–
देर रात हवेली में एक हल्कापन था।
बड़े कमरे में मेज़ सजी थी। महँगी शराब, तंदूरी टिक्का, और थकान के बीच छुपी संतुष्टि। ठाकुर धुरंधर सिंह कुर्सी पर टिके थे। पास ही पशुपति बाबू। करण और हीरा भी वहीं बैठे थे। सबके कपड़ों पर धूल और हल्की चोटों के निशान थे—जैसे जंग से लौटे हों।
पशुपति बाबू ने गिलास उठाया।
“बहुत दिनों बाद शिकार करके मज़ा आया,” उन्होंने हँसते हुए कहा। “इंसान का शिकार।” फिर भौंहें सिकुड़ीं। “हरामख़ोर जख्खड़ की लाश नहीं मिली। बच निकला लगता है।”
“पर ताऊजी,” करण बोला, “उसकी पूरी गैंग साफ़ हो गई है।”
हीरा ने सिर हिलाया। “अब लौटने की ग़लती नहीं करेगा।”
ठाकुर धुरंधर सिंह ने सिगार सुलगाया। धुएँ के बीच उनकी आवाज़ ठंडी थी। “और अगर लौटेगा भी—तो बचेगा नहीं।”
चारों ने गिलास टकराए।
तभी करण का फोन चमका, उसके खबरी गुड्डू का नंबर।
उसने हँसते हुए उठाया और चहका, “बोल बे गुड्डू लाल। कैसी है हमारी सपना डार्लिंग?” अगले ही पल उसकी हँसी गायब हो गई। “साले तूने मुझे पहले फोन क्यों नहीं किया?” उठ खड़ा हुआ।
पशुपति बाबू बोले, “बेटे करण, सब ठीक तो है?”
करण, “जी ताऊजी, छोटा मामला है निपटा के आता हूँ।”
पशुपति बाबू, “बेटे चार-छह लड़कों को साथ लेकर जा, और वो... ड्राइव मत करना रात को।”
करण, “जी ताऊजी।” पैर-हाथ करके निकल जाता है।
दरवाज़े के ठीक बाहर रश्मि खड़ी थी, करण के आते ही एक ओर हो जाती है, वो उसे देखता नहीं, जल्दी में निकल जाता है।
रश्मि एक पल अंदर झाँकती है, हल्का-सा—ठाकुर, पशुपति और हीरा हँसते हुए, खाते-पीते हुए, जीत का स्वाद लेते हुए।
फिर बिना आवाज़ किए मुड़ जाती है।
तेज़ क़दमों से, सौम्या के कमरे की ओर।
–
शहर के दूसरी ओर एक छोटा-सा शादी का घर देर रात शांत था।
संगीत थम चुका था। मेहमान जा चुके थे। गलियारों में पीली रोशनी और मुरझाते फूलों की गंध तैर रही थी। सुहागरात का कमरा अंदर से बंद था।
अंदर दूल्हा ज़मीन पर बैठा था।
हाथ पीछे कसकर बँधे हुए। होंठ सूखे। हिलते-हिलते थक चुका था, पर बंधन ज़रा भी ढीले नहीं पड़े थे। पीछे दो भारी-भरकम आदमी खड़े थे—चुप, निर्विकार।
दुल्हन एक कोने में खड़ी थी। साँसें उखड़ी हुईं। आँखें बार-बार दरवाज़े की ओर जा रही थीं, जैसे वहाँ से कोई मदद आएगी।
करण बिस्तर के किनारे बैठा था। हाथ में विदेशी हैंडगन—यूँ ही, लापरवाही से।
“क्यों, सपना,” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “हम थोड़े बिज़ी क्या हुए, तुमने इतनी जल्दी ज़िंदगी आगे बढ़ा ली? शादी कर ली?”
“करण… तुम्हारी भी तो शादी फिक्स हो गई है,” सपना की आवाज़ काँपी।
“श्श्—”
करण उठा। कमरे में उसके क़दमों की आवाज़ गूँजी। वह उसके चारों ओर घूमता रहा—बहुत पास, पर छूता नहीं।
“याद है,” करण बोला, “वादा किया था के तुम हमेशा मेरी रहोगी?”
नीचे बैठा दूल्हा ज़ोर से हिला, आवाज़ निकालनी चाही—पर कुछ नहीं हुआ।
करण हँसा।
“सॉरी, ब्रो,” उसने दूल्हे से कहा, “तुझे बाहर यूएस में ही रहना चाहिए था। बेकार मेरी डार्लिंग से शादी कर बैठा, अब इसके साथ सुहागरात मैं मनाऊँगा।”
सपना के आँसू फूटे, “करण... प्लीज।”
“चुप।” करण गरजा और पूरा कमरा थम गया। “एक भी चूं की तो इसे और इसके बुड्ढे माँ-बाप सबको ठोक डालूँगा, अभी के अभी।”
–
अगली सुबह। कमरा बदला-सा था।
बिस्तर की चादर अस्त-व्यस्त। फूल कुचले हुए। दुल्हन कोने में बैठी थी—साड़ी बदली हुई, बाल खुले, काजल फैला हुआ। वह रो नहीं रही थी।
वह कुछ महसूस ही नहीं कर पा रही थी।
दूल्हा अब भी ज़मीन पर बैठा था। आँखें खाली।
दरवाज़ा खुला।
करण बाहर निकल रहा था। उसने अपनी कफ़-लिंक ठीक की, आईने में खुद को देखा—संतुष्ट।
जाते-जाते कमरे की ओर बिना देखे कहा, “आता रहूँगा सपना डार्लिंग।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
कमरे में सिर्फ़ एक आवाज़ बची—घड़ी की टिक-टिक और एक नव दंपत्ति के टूटे हुए सपने।