Double Game - 3 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 3

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 3

दोपहर के डेढ़ बज रहे थे। सड़क पर स्कूल बसों के हॉर्न की आवाज़ें गूँजने लगी थीं। काया ठीक समय पर घर पहुँच चुकी थी। उसने अपनी चप्पलें दरवाजे के बाहर करीने से उतारीं और सीधे हाथ धोने के बाद रसोई की ओर बढ़ी। उसे पता था कि अगले दस मिनटों में घर का सन्नाटा बच्चों के शोर-शराबे में बदलने वाला है।

जैसे ही डोरबेल बजी, काया ने दरवाजा खोला। सात साल का विहान और पाँच साल की नन्ही अवनी मानो तूफान की तरह भीतर दाखिल हुए। उनके कंधों पर लटके भारी बैग उनकी छोटी पीठ को थोड़ा झुका रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर घर पहुँचने की वह चिरपरिचित चमक थी।

"मम्मा! मम्मा! देखो आज मुझे स्टार मिला!" विहान चिल्लाया।

"काया... मुझे बहुत भूख लगी है, मम्मा कहाँ हैं?" अवनी ने अपना बैग सोफे पर पटकते हुए पूछा।

काया ने मुस्कुराते हुए अवनी का बैग उठाया और विहान के सिर पर हाथ फेरा। "मम्मा तो जिम में हैं बेटा, अभी आती होंगी। तब तक चलो, जल्दी से हाथ-मुँह धो लो। आज मैंने आप दोनों की पसंद का पास्ता और ताज़ा संतरों का जूस बनाया है।"

बच्चों के लिए 'मम्मा' शब्द एक संबोधन था, लेकिन उस संबोधन का सारा उत्तरदायित्व काया निभा रही थी। उसने फुर्ती से विहान की शर्ट के बटन खोले और उसकी पसीने से तरबतर यूनिफॉर्म बदली। अवनी के उलझे हुए बालों को सुलझाते हुए उसने उसे बाथरूम की ओर भेजा। जब बच्चे डाइनिंग टेबल पर बैठे, तो काया उनके सामने एक सहेली और एक गुरु दोनों बनकर बैठ गई।
"अच्छा विहान, बताओ आज मैम ने स्कूल में क्या नया सिखाया?" काया ने विहान की थाली में पास्ता परोसते हुए पूछा।

विहान उत्साह से भर उठा, "आज मैम ने सोलर सिस्टम के बारे में बताया काया! पता है, सूरज सबसे बड़ा है और बाकी सब उसके चक्कर लगाते हैं। लेकिन मुझे समझ नहीं आया कि हम गिरते क्यों नहीं?"

काया, जिसने खुद सिर्फ आठवीं तक पढ़ाई की थी, विहान के इन मासूम सवालों का जवाब अपनी समझ और ममता से देती थी। "देखो विहान, जैसे इस घर में सब लोग 'काया-काया' पुकारते हैं और मेरे आस-पास घूमते हैं ताकि घर ठीक से चले, वैसे ही सूरज इस पूरे ब्रह्मांड का काया है। वह सबको अपनी ताकत से थामे रखता है।"

विहान आँखें फाड़कर उसे सुनने लगा। 

अवनी बीच में बोली, "काया, आज मेरी मैम ने मुझे डांटा। मुझे कविता याद नहीं हो रही थी।"

काया ने अवनी को अपने पास खींचा और उसे निवाला खिलाते हुए बड़े प्यार से समझाया, "कोई बात नहीं मेरी जान। पता है, पढ़ाई करना क्यों ज़रूरी है? ताकि जब तुम बड़ी हो जाओ, तो तुम्हें किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। पढ़ाई वो जादुई चाबी है जिससे तुम दुनिया का कोई भी दरवाजा खोल सकती हो। देखो, तुम्हारी काया को आज बहुत कुछ सीखना पड़ता है ताकि वह तुम लोगों की मदद कर सके। अगर तुम पढ़ोगी, तो तुम खुद अपनी मम्मा की तरह अपना जिम चलाओगी या पापा की तरह बड़े ऑफिस में बैठोगी।"

बच्चों के साथ काया की यह बातचीत सिर्फ समय बिताने का जरिया नहीं थी, बल्कि वह उन नन्हे मनों में आत्मविश्वास के बीज बो रही थी। वह उन्हें सिखा रही थी कि ईमानदारी और मेहनत का क्या महत्व है। बच्चे उसे अपनी हर छोटी-बड़ी बात बताते—किसने किसकी पेंसिल ली, किसने लंच शेयर किया और किसने क्लास में शरारत की। काया उनकी हर बात पर कभी हँसती, कभी उन्हें टोकती और कभी उनका मनोबल बढ़ाती।


उसी समय, कुछ किलोमीटर दूर वंशिका के जिम में माहौल बिल्कुल अलग था। वहाँ पसीने की गंध से ज्यादा महंगे परफ्यूम की खुशबू फैली हुई थी। वर्कआउट का समय खत्म हो चुका था और अब कूल-डाउन सेशन के बहाने शहर की नामी-गिरामी बहुओं की गपशप शुरू हो गई थी।

जिम के लाउंज में मखमली सोफों पर बैठी मिसेज मल्होत्रा अपने नए डायमंड ब्रेसलेट को चमकाते हुए कह रही थीं, "ओह गॉड! मेरी बाई ने आज फिर छुट्टी कर ली। मैंने उसे पिछले महीने ही बनारसी साड़ी दी थी, फिर भी नखरे देखो। अब मैंने सोच लिया है, एक खाना बनाने वाली और एक सिर्फ डस्टिंग के लिए, दो अलग-अलग बंदियाँ रख ली हैं। आखिर अपनी भी तो कोई लाइफ है, सारा दिन घर के कामों में थोड़े ही न खपेंगे!"

पास ही बैठी मिसेज खन्ना, जो एक बड़े बिल्डर की पत्नी थीं, अपनी रईसी झाड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती थीं। "बिल्कुल सही कहा आपने। मैंने तो अपनी कुक को सीधे कह दिया है कि अगर थाई और इटैलियन नहीं आता, तो काम छोड़ दो। अगले हफ्ते हम लोग लंदन जा रहे हैं, तब तक उसे सारी नई रेसिपी सीखनी होंगी। वरना गिफ्ट्स की उम्मीद न रखे।"

एक और महिला अपनी सहेली से कह रही थी, "सुना है सिंघानिया जी ने अपनी एनिवर्सरी पर अपनी वाइफ को नई टेस्ला गिफ्ट की है? हम लोग भी सोच रहे हैं कि इस बार दुबई में ही शॉपिंग की जाए, यहाँ इंडिया में अब वो क्लास नहीं रहा।"

वंशिका एक कोने में खड़ी अपनी पानी की बोतल से घूँट भर रही थी और इन सब की बातें सुन रही थी। वह मुस्कुराकर हाय-बाय तो कर रही थी, लेकिन भीतर ही भीतर उसके मन में एक अजीब सी हलचल हो रही थी। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती थी। 

भूपेंद्र की तीस-चालीस हजार की नौकरी और इस जिम से होने वाली सीमित आय से उनका घर सम्मानजनक तरीके से चल तो रहा था, लेकिन वह उन ऐशो-आराम से कोसों दूर थी जिनकी चर्चा ये महिलाएं कर रही थीं।
जब वह इन महिलाओं को लाखों के खर्चों की बात करते सुनती, तो उसका जी ललचाता। उसका मन करता कि उसके पास भी ऐसी ही गाड़ियाँ हों, वह भी बिना सोचे समझे इंटरनेशनल वेकेशन प्लान कर सके और उसकी कलाई पर भी वह डायमंड ब्रेसलेट चमके। वह अपनी तुलना उन महिलाओं से करने लगती।
'मैं इनसे ज्यादा सुंदर हूँ, ज्यादा पढ़ी-लिखी हूँ और ज्यादा मेहनती भी। फिर भी मुझे हर खर्च से पहले सोचना पड़ता है,' उसने मन ही मन सोचा।
यद्यपि वह एक समझदार महिला थी और जानती थी कि भूपेंद्र एक ईमानदार और आदर्शवादी व्यक्ति हैं, फिर भी वह अपर-क्लास लाइफस्टाइल का आकर्षण उसे अपनी ओर खींच रहा था। वह इन महिलाओं की फिजूलखर्ची पर मन ही मन चिढ़ती भी थी, लेकिन साथ ही वैसी ही जिंदगी जीने की तमन्ना भी रखती थी।

तभी उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी। ढाई बज रहे थे। बच्चों के घर पहुँचने का समय हो गया होगा। उसने अपना बैग उठाया और उन महिलाओं के वैभवशाली संसार से निकलकर अपनी साधारण, पर व्यवस्थित दुनिया की ओर चल दी।
रास्ते भर उसके दिमाग में मिसेज मल्होत्रा की बातें गूँजती रहीं। 'दो बाई... विदेश यात्रा... महंगे तोहफे...'
जब वह घर पहुँची, तो उसने देखा कि काया बच्चों को सुलाने की कोशिश कर रही थी और घर एकदम साफ-सुथरा चमक रहा था। काया को देखते ही वंशिका के मन में एक विचार आया—'काया तो सब कुछ संभाल ही लेती है, क्या मुझे भी अपने जिम का विस्तार करके कुछ बड़ा नहीं करना चाहिए? क्या मैं हमेशा इसी मध्यमवर्गीय दायरे में सिमटी रहूँगी?'

वंशिका ने काया की ओर देखा, जो इस समय अवनी के सिर पर हाथ फेर रही थी। घर में शांति थी, पर वंशिका के मन में एक तूफान की आहट सुनाई देने लगी थी।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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