काया जब वापस लौटी, तो उसके कदम पहले की तरह डरे-सहमे नहीं थे। अपनी माँ को खोने का दुख तो था, लेकिन साथ ही गाँव में अपनी पुश्तैनी ज़मीन और लोगों के बीच रहकर उसे अपनी जड़ों की ताकत का अहसास हो गया था। सबसे बड़ा आत्मविश्वास उसे भूपेंद्र साहब के उस एक मैसेज ने दिया था— "तुम्हारी बहुत कमी महसूस हो रही है।" इन शब्दों ने काया को यह यकीन दिला दिया था कि वह इस घर की ज़रूरत नहीं, बल्कि मजबूरी बन चुकी है।
जैसे ही उसने घर की घंटी बजाई, भूपेंद्र साहब ने खुद दौड़कर दरवाजा खोला। काया को सामने देख उनकी आँखों में ऐसी चमक आई मानो कोई खोई हुई बेशकीमती चीज़ मिल गई हो।
"आ गई तुम काया! शुक्र है भगवान का। तुम नहीं जानतीं ये घर... ये बच्चे और मैं... हम सबने तुम्हें कितना याद किया। सब कुछ बिखर गया था तुम्हारे बिना," भूपेंद्र ने वंशिका की मौजूदगी की परवाह किए बिना अपने दुखड़े सुनाने शुरू कर दिए।
काया के चेहरे पर एक गर्व भरी मुस्कान तैर गई। उसे लगा जैसे वह कोई युद्ध जीतकर लौटी हो। उसने तिरछी नज़रों से हॉल में सोफे पर बैठी वंशिका की ओर देखा। वंशिका के चेहरे पर कोई भाव नहीं था, वह चुपचाप अपनी जिम की फाइल देख रही थी, लेकिन उसकी मुट्ठियाँ कसी हुई थीं।
भूपेंद्र साहब कहते जा रहे थे, "देखो काया, पिछले दस दिनों में मुझे एक बार भी समय पर चाय नहीं मिली। दफ्तर जाने में रोज़ देर हुई। बच्चों का तो पूछो ही मत। तुम बस अब आ गई हो, तो संभाल लो सब।"
काया को मानो पंख लग गए थे। साहब का यह सार्वजनिक गुणगान उसके आत्मविश्वास को सातवें आसमान पर ले गया था। वह चहकते हुए सीधे रसोई की ओर बढ़ी। उसे उम्मीद थी कि रसोई बिखरी होगी, बर्तन जमा होंगे और उसे एक बार फिर अपना साम्राज्य स्थापित करने का मौका मिलेगा। लेकिन जैसे ही उसने रसोई की देहली लांघी, उसके कदम ठिठक गए। रसोई पूरी तरह बदल चुकी थी।
वंशिका ने पिछले दस दिनों में रसोई का कायाकल्प कर दिया था। अनाज के डिब्बे, मसालों की रैक और बर्तनों की जगह बदल दी गई थी। सब कुछ एक नए और आधुनिक सिस्टम से लगा हुआ था। काया ने जिस रसोई को अपनी पसंद और सहूलियत से सजाया था, वहाँ अब उसकी मेहनत का कोई निशान नहीं था।
वह पलटी और हॉल में आकर वंशिका से बोली, "दीदी, ये रसोई में सब सामान इधर-उधर... मैं इसे फिर से ठीक कर देती हूँ जैसे पहले था।"
वंशिका ने फाइल से नज़र हटाए बिना, बहुत ही ठंडे और अधिकारपूर्ण लहजे में कहा, "नहीं काया। अब जो चीज़ जहाँ रखी है, उसे वैसे ही रहने देना। पिछले कुछ दिनों में मुझे बहुत परेशानी हुई क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि तुमने क्या कहाँ छिपा रखा है। अब मैंने सब अपनी सहूलियत से सेट किया है ताकि मुझे या बच्चों को कभी कुछ लेना हो, तो हमें किसी का इंतज़ार न करना पड़े। तुम बस इसी नए अरेंजमेंट के हिसाब से काम करोगी।"
काया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे अपनी मेहनत, अपनी पसंद और अपनी व्यवस्था की ऐसी अनदेखी होने पर गहरी बेइज्जती महसूस हुई। उसे लगा जैसे किसी ने उससे उसका घर छीन लिया हो। उसकी आँखों में नमी तैरने लगी। जिस रसोई में वह रानी बनकर रहती थी, आज उसे वहां एक साधारण नौकरानी की तरह निर्देश दिए जा रहे थे।
वंशिका की नज़रें अब काया पर जमी थीं। वंशिका ने देख लिया था कि काया के तेवर बदल रहे हैं। उसने मन ही मन तय कर लिया था कि अब वह काया को अपने इशारों पर चलाएगी। वह उसे निकालने का मन बना चुकी थी, लेकिन पिछले दो दिनों से वंशिका को हल्का बुखार और कमजोरी महसूस हो रही थी। उसने सोचा, 'अभी मेरी तबीयत ठीक नहीं है, कुछ दिन इसे रहने देती हूँ ताकि घर और बच्चे संभले रहें। जैसे ही मैं पूरी तरह स्वस्थ होऊँगी, इसे इस घर से रुखसत कर दूँगी।'
भूपेंद्र साहब ने काया की भीगी आँखें देखीं तो उन्हें बुरा लगा। "अरे वंशिका, उसे अपनी मर्जी से करने दो न, आखिर काम तो उसी को करना है। बेचारी परेशान हो जाएगी।"
वंशिका ने अब सीधे भूपेंद्र की आँखों में देखा। "काम उसे करना है, पर घर मेरा है भूपेंद्र। और घर मेरी मर्जी से चलेगा, किसी बाहरी की मर्जी से नहीं। काया, जाओ और चाय बनाओ। अदरक वाली, और चीनी कम।"
काया बिना कुछ बोले रसोई में चली गई। उसके दिल में एक टीस उठी। साहब की तारीफ ने उसे जो ऊँचाई दी थी, दीदी के एक ही झटके ने उसे धरातल पर पटक दिया था। उसने कांपते हाथों से चाय का पतीला चढ़ाया। उसे अहसास हो गया था कि अब यह लड़ाई काम की नहीं, बल्कि अधिकार की है।
उधर हॉल में, वंशिका को अपनी जीत का अहसास हो रहा था, लेकिन उसके शरीर की बढ़ती तपिश उसे आगाह कर रही थी कि संघर्ष अभी लंबा है। उसने काया को अपने नियंत्रण में तो कर लिया था, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि घायल स्वाभिमान वाली औरत कितनी खतरनाक हो सकती है।
काया ने चाय छानते हुए आईने में खुद को देखा। उसके मन में एक नई ज़िद पैदा हो रही थी। 'साहब मेरे साथ हैं, और यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है,' उसने खुद को समझाया और चाय की ट्रे लेकर बाहर निकली।
अब इस घर में एक ऐसा शीत युद्ध शुरू होने वाला था, जिसकी गूँज रिश्तों की दीवारों को हिलाकर रख देने वाली थी।
काया ने चाय की ट्रे उठाई और हॉल की तरफ बढ़ी। उसका मन अभी भी रसोई में हुए उस अपमान से सुलग रहा था, लेकिन चेहरे पर उसने एक सधी हुई विनम्रता ओढ़ ली थी। उसने भूपेंद्र के सामने प्याली रखी और फिर एक प्याली वंशिका दीदी की ओर बढ़ाई।
भूपेंद्र ने जैसे ही चाय का पहला घूँट लिया, उनके चेहरे पर परमानंद के भाव तैर गए। "आह! यह हुई न बात। काया, सच कहूँ तो पिछले दस दिनों में मैंने चाय के नाम पर सिर्फ गर्म पानी और दूध पिया है। तुम्हारे हाथ का जादू ही कुछ और है।"
वंशिका ने अपनी प्याली उठाई, एक घूँट भरा और बिना कुछ कहे शांत रही। उसे पता था कि भूपेंद्र यह सब उसे सुनाने के लिए कह रहे हैं। उसने अपनी चाय खत्म की और उठते हुए कहा, "आज संडे है, बच्चे देर तक सो रहे हैं। काया, उन्हें सोने देना। उनके कमरे में जाकर साफ-सफाई के बहाने उन्हें डिस्टर्ब मत करना। जब वो खुद उठेंगे, तभी उनका नाश्ता बनेगा।"
इतना कहकर वंशिका ऊपर अपने कमरे की ओर बढ़ गई। काया वहीं खड़ी रह गई, उसके हाथ में खाली ट्रे कांप रही थी। उसे लगा जैसे वंशिका ने उसके पैरों में बेड़ियाँ डाल दी हों। बच्चों का कमरा, जहाँ वह अपनी मर्ज़ी से कभी भी जा सकती थी, उनके साथ खेल सकती थी, अब वह भी उसके लिए वर्जित क्षेत्र जैसा हो गया था। वंशिका का यह स्पष्ट निर्देश कि 'हस्तक्षेप मत करना', काया को भीतर तक तिलमिला गया।
वंशिका के ऊपर जाते ही हॉल में सन्नाटा छा गया। भूपेंद्र ने इधर-उधर देखा और फिर अपनी आवाज़ धीमी करते हुए बोले, "काया, बुरा मत मानो। वंशिका का मिजाज़ आजकल थोड़ा ऐसा ही है।"
काया ने फीकी मुस्कान दी और सोफे के पास पड़ी मेज साफ करने लगी। "कोई बात नहीं साहब, दीदी मालकिन हैं, उनका हुक्म सिर माथे पर। पर दुख होता है जब अपनी बनाई जगह पर इंसान को अजनबी बना दिया जाए।"
भूपेंद्र उसकी बात सुनकर भावुक हो गए। उन्होंने अपनी कुर्सी थोड़ी करीब खिसकाई और बोले, "सच कहूँ काया, तो तुम्हारे बिना यह घर घर नहीं, बल्कि कोई मुसाफिरखाना लग रहा था। सब कुछ सुना था। दीवारों से भी जैसे उदासी टपक रही थी। न खाने में स्वाद था, न बातों में। यहाँ तक कि मुझे ऑफिस जाने की भी इच्छा नहीं होती थी।"
काया ने उनकी आँखों में देखा। वहां एक अजीब सी निर्भरता थी। उसने थोड़ा हौसला पाकर मजाकिया लहजे में तंज कसा, "अच्छा साहब? तो क्या अब फाइलें अलमारी से खुद बाहर नहीं आती थीं? या फिर घड़ी ने आपके हाथ पर चढ़ने से मना कर दिया था?"
भूपेंद्र खिलखिलाकर हँस पड़े। "अरे, तुम मज़ाक समझ रही हो? एक दिन तो मैं बिना रुमाल के ऑफिस चला गया और फिर पूरे दिन हाथ धोते वक्त तुम्हारी याद आती रही। वंशिका ने सब कुछ संभाला तो सही, पर वह बात नहीं थी। वह बस फर्ज निभा रही थी, और तुम... तुम तो जैसे इस घर की रग-रग जानती हो।"
काया ने अपनी तौलिए को कंधे पर झटका और तिरछी नज़रों से उन्हें देखते हुए बोली, "अब रहने भी दीजिये साहब। दीदी सुन लेंगी तो कहेंगी कि मैं आपको चने के झाड़ पर चढ़ा रही हूँ। वैसे भी, अब तो रसोई मेरी रही नहीं, वहां तो दीदी का नया कानून चल रहा है। अब शायद आपको मेरे हाथ का स्वाद भी कम ही मिलेगा।"
भूपेंद्र ने हाथ हवा में लहराते हुए कहा, "अरे, रसोई के डिब्बे बदलने से हाथ का हुनर थोड़े ही बदल जाता है। तुम देखना, दो दिन में वंशिका खुद थक जाएगी और फिर सब तुम्हारे हाथ में होगा। और रही बात रुमाल और फाइलों की, तो अब मैं आज़ाद हूँ। कम से कम अब मुझे अपनी चीज़ें खुद नहीं ढूँढनी पड़ेंगी।"
काया ने एक लंबी सांस ली और मुस्कुराते हुए बोली, "देखते हैं साहब, आपकी आज़ादी कितने दिन चलती है। कहीं ऐसा न हो कि दीदी मुझे रसोई से भी बेदखल कर दें।"
भूपेंद्र ने बराबरी से जवाब दिया, "कोशिश तो वो कर सकती है, लेकिन इस घर के पेट और मन पर तो तुम्हारा ही राज है। और जिस राज्य की प्रजा खुश हो, वहां की गद्दी कोई नहीं छीन सकता।"
दोनों के बीच यह हल्की-फुल्की तकरार चल ही रही थी कि ऊपर से वंशिका के चलने की आवाज़ आई। काया तुरंत सतर्क हो गई और ट्रे लेकर रसोई की तरफ भाग गई। लेकिन उसके मन में अब एक अजीब सी तसल्ली थी। उसे समझ आ गया था कि भले ही वंशिका ने रसोई का हुलिया बदल दिया हो, लेकिन उसने भूपेंद्र के मन का जो कोना जीत लिया है, वहां तक वंशिका की पहुँच फिलहाल नामुमकिन है।
काया के मन में अब एक नई योजना आकार ले रही थी—साहब का यह समर्थन ही उसकी असली चाबी थी।
वंशिका की शुरुआती लापरवाही.. महत्वकांक्षाएं अब उसे भारी पड़ने वाली थी। भूपेंद्र का पति को नीचा दिखाने की कोशिश, अहंकार में काया को बढ़ावा देना काया को अलग ही दिशा में लेकर जा रहा था।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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