new moon night in Hindi Horror Stories by smita books and stories PDF | अमावस्या की रात

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अमावस्या की रात

अमावस्या की रात विधि को हमेशा से ही अजीब लगती थी।
न चाँद, न उसकी रोशनी—बस काली चादर ओढ़े आसमान और सन्नाटे से भरा घना अँधेरा, जो मन के भीतर तक उतर जाता था।
उस रात भी कुछ अलग नहीं था।
रेलवे ट्रैक के पास बने उस छोटे-से घर में विधि अकेली रहती थी।
लोग कहा करते थे—
अमावस्या की रात ठीक 12:07 बजे कोई ट्रेन उस ट्रैक से नहीं गुजरती…
पर आवाज़ ज़रूर आती है।
लेकिन जैसा कहा जाता है, सच अंधविश्वास से बड़ा होता है।
विधि इन बातों पर कभी विश्वास नहीं करती थी। कोई कुछ कहता तो वह हँसकर टाल देती।
जब तक कि उस रात…
वह आवाज़ नहीं आई।
क्लिक… क्लैक… क्लिक… क्लैक…
मानो कोई बिल्कुल पास से रेलवे ट्रैक पर चल रहा हो।
विधि ने खिड़की से बाहर झाँका।
ट्रैक खाली था।
फिर भी आवाज़ लगातार आ रही थी।
एक पल को उसे लगा शायद उसके कान बज रहे हैं,
लेकिन तभी वही आवाज़ अब उसके घर के भीतर से आने लगी।
कमरे के फर्श पर विधि जड़-सी हो गई।
क्लिक… क्लैक…
जैसे फर्श के नीचे कोई चल रहा हो।
“चूहे होंगे,” उसने खुद को समझाया।
पर चूहों की चाल इतनी भारी नहीं होती।
तभी अचानक उसकी नज़र घड़ी पर पड़ी—
12:07 AM
उसी क्षण उसके मोबाइल पर एक संदेश आया।
Unknown Number:
“खिड़की मत खोलना।”
विधि की साँस जैसे अटक गई।
उसने काँपते हाथों से टाइप किया—
“तुम कौन हो?”
लेकिन कोई जवाब नहीं मिला, विधि घबरा गई उसके माथे पर पसीने आने लगे।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई—
ठक… ठक… ठक…
धीमी गिनती में तीन बार।
फिर एक आवाज़ आई—
बिल्कुल उसकी ही आवाज़ में—
“दरवाज़ा खोलो… ठंड लग रही है।”
विधि डर के मारे रोने लगी।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि जब वह कमरे के अंदर है, तो उसकी आवाज़ बाहर से कैसे आ सकती है?
तभी मोबाइल पर आख़िरी संदेश आया—
“अगर उसने अंदर कदम रखा, तो तुम बाहर चली जाओगी।”
संदेश पढ़ते ही विधि का डर बढ़ने लगा तभी दरवाज़े की कुंडी अपने आप हिलने लगी , जैसे कोई उसे खोलने की कोशिश कर रहा हो।
विधि धीरे-धीरे पीछे हटती गई।
और तभी—
फर्श के फटने जैसी ज़ोरदार आवाज़ आई।
विधि डर के मारे चीख उठी,
लेकिन आवाज़ इतनी तेज़ थी कि उसकी चीख कमरे की दीवारों में ही दबकर रह गई…
फर्श से उठती वह गूँजती हुई आवाज़ धीरे-धीरे थम गई।
कमरे में एक अजीब-सी गंध फैल गई—
गीली मिट्टी और जंग लगे लोहे की।
विधि की चीख उसके गले में ही अटक कर रह गई।
उसके पैरों के नीचे ज़मीन हल्की-हल्की धड़क रही थी,
जैसे किसी का दिल वहीं नीचे धड़क रहा हो।
मोबाइल की स्क्रीन अपने आप फिर जल उठी।
Unknown Number:
“अब वह ऊपर आ रहा है।”
विधि ने झटके से मोबाइल फेंक दिया, उसकी नज़र फर्श पर पड़ी ,जहाँ अभी तक सीमेंट था… वहाँ बालों जैसी पतली दरारें उभर आई थीं।
क्लिक… क्लैक…
अब आवाज़ ट्रैक जैसी नहीं लग रही थी।
अब वह… नाख़ूनों की थी, जैसे कोई फर्श को कुरेद रहा हो।
दरवाज़े के बाहर खड़ा “वो” अब चुप था ,बहुत ज़्यादा चुप।
अचानक दरवाज़े के नीचे से खून जैसा गाढ़ा तरल अंदर रिसने लगा।
विधि की आँखें फैल गईं।
उसने पीछे मुड़कर खिड़की की ओर देखा,खिड़की के शीशे पर…
उँगलियों के निशान उभर आए। 
तभी उसके कान के पास किसी ने फुसफुसाया—
“तुमने कहा था…तुम डरती नहीं हो।”
विधि झटके से घूमी कमरा खाली था ,लेकिन आईना…
आईने में वह अकेली नहीं थी ,उसके पीछे कोई खड़ा था—
धँसा हुआ चेहरा,
टूटी गर्दन,
और आँखें…
जिनमें कोई पुतली नहीं थी।
आईने वाला “वो” मुस्कुराया।
और उसी पल…आईने में विधि ने देखा—
खुद को…फर्श के नीचे दबा हुआ।
विधि की साँस रुक गई।
तभी ठीक 12:07 AM पर ट्रैक पर पहली बार ट्रेन गुजरी......
सुबह दूधवाले ने दरवाज़ा खोला।
अंदर फर्श पर विधि की लाश पड़ी थी—
आँखें गायब, और खून से लिखा था—
“अब यहाँ विधि नहीं रहती।”
पोस्टमॉर्टम में एक ही बात दर्ज थी—
मौत का समय: अमावस्या की रात, 12:07 AM।
और तब से उस घर के पास
हर अमावस्या 12:07 पर…
कोई न कोई आवाज़ ज़रूर सुनाई देती है।