✧ अध्याय 1 (भाग–2) : समझ का धर्म — न करना, न बदलना ✧
भगवद् गीता एक ही वाक्य में सब कह देती है—
जो हुआ, जो हो रहा है, जो होगा—सब सत्य है।
गीता यह नहीं कहती—
ऐसा करो।
वैसा मत करो।
यह रोको।
वह बदलो।
गीता केवल इतना कहती है—
समझो।
कुछ करने को नहीं कहती।
कुछ पाने को नहीं कहती।
कुछ बनने को नहीं कहती।
न मोक्ष पाने को,
न संसार सुधारने को,
न ईश्वर बनने को।
केवल जीने को।
और जो है उसे समझने को।
क़ुरआन भी यही कहती है।
क़ुरआन भी नहीं चाहती कि मानव ईश्वर बने।
क़ुरआन भी नहीं कहती कि कोई मानव “करने वाला” बने।
क़ुरआन का कथन भी यही है—
ईश्वर करता है।
मानव नहीं।
गीता कहती है—
सब मेरे अधीन है।
क़ुरआन कहती है—
कोई मानव ईश्वर नहीं।
दोनों एक ही बिंदु पर खड़ी हैं।
दोनों का साझा सत्य
मानव सत्य नहीं बन सकता
मानव करता नहीं बन सकता
मानव ईश्वर नहीं बन सकता
इसलिए—
दोनों ग्रंथ
ईश्वर को निराकार रखते हैं।
मानव को मुक्त रखते हैं।
न गुरु ईश्वर है,
न कोई मालिक,
न कोई मध्यस्थ।
गुरु का एकमात्र काम
सच्चा गुरु
अपने को बड़ा नहीं करता।
अपने को छोटा करता है।
वह कहता है—
मैं सबसे छोटा हूँ।
मैं सबसे गरीब हूँ।
मैं सबसे अज्ञानी हूँ।
यही उसकी प्रामाणिकता है।
यही प्रमाण है कि
ईश्वर सत्य है।
गुरु का काम—
डर हटाना।
भय हटाना।
निर्भरता तोड़ना।
बस।
व्याख्या का अपराध
मेरी समझ—मेरी है।
तुम्हारी समझ—तुम्हारी।
मेरी गीता की समझ
तुम्हारे लिए ज़हर हो सकती है।
मेरी क़ुरआन की समझ
तुम्हारे जीवन के लिए कैंसर बन सकती है।
क्योंकि
ज़रूरतें अलग हैं।
स्थितियाँ अलग हैं।
भीतरी भूख अलग है।
इसलिए—
मैं सार दे सकता हूँ।
मैं सार की दिशा दिखा सकता हूँ।
लेकिन
व्याख्या देना अपराध है।
सबसे बड़ा पाप
किसी को कहना—
गीता यह कहती है।
क़ुरआन यह कहती है।
इसलिए तुम ऐसा करो।
यह ज्ञान नहीं।
यह मानसिक बलात्कार है।
क्योंकि
समझने वाला और समझ
दोनों विपरीत हैं।
जो स्वयं समझ ले—
वही ज्ञान है।
जो समझाया जा रहा है—
वह गुलामी है।
भाषा बदल सकती है, समझ नहीं दी जा सकती
संस्कृत, उर्दू, अरबी—
इनका रूपांतरण जायज़ है।
लेकिन
समझ का स्थानांतरण असंभव है।
गीता समझाई नहीं जा सकती।
क़ुरआन समझाई नहीं जा सकती।
जो समझता है—
वह अकेला समझता है।
नियम बनाम सार
नियम से
संस्था बनती है।
धर्म बनता है।
राजनीति बनती है।
लेकिन
सार से कुछ नहीं बनता।
सार से
केवल जिया जाता है।
अंतिम वाक्य (इस अध्याय का केंद्र)
नियम से समाज बन सकता है,
लेकिन
सत्य से कोई निर्माण नहीं होता—
सत्य केवल
जिया जाता है।
AGYAT AGYANI VEDANT 2.0 LIFE