रुद्र के घुटने टिक गए। उसके हाथ की लकड़ी की तलवार अब जलकर राख होने लगी थी। सामने 'अग्नि-पथ' का अंत अभी कोसों दूर था और पीछे लौटने का रास्ता बंद हो चुका था। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और लपटें उसके शरीर को छूने लगीं।
क्या रुद्र अपनी इस भावुकता और शारीरिक पीड़ा को पार कर उस ओर निकल पाएगा? या विशाल गुरुकुल का यह सबसे 'तेजस्वी' सितारा आज इसी अग्नि-पथ की राख में हमेशा के लिए दफन हो जाएगा?
समय बीतने के साथ, वह नन्हा बालक रुद्र अब एक तेजस्वी किशोर में बदल चुका था। 'विशाल गुरुकुल' के इतिहास में आज तक ऐसा कोई छात्र नहीं हुआ था जिसने इतनी कम आयु में शास्त्रों के गूढ़ अर्थ और शस्त्रों की जटिल कलाओं को आत्मसात कर लिया हो।
प्रतिभा की पराकाष्ठा
अभ्यास के मैदान में जब रुद्र उतरता, तो अन्य छात्रों की सांसें थम जाती थीं। उसकी तलवार की गति हवा को चीरने वाली किसी बिजली जैसी थी। जहाँ अन्य छात्रों को 'अंग-संचालन' सीखने में वर्षों लगते, रुद्र उसे कुछ ही सप्ताह में सिद्ध कर लेता था। आचार्य विक्रम अक्सर उसे अचंभित होकर देखते थे—उन्हें समझ नहीं आता था कि रुद्र के भीतर यह शक्ति उसकी मेहनत से आ रही है या उसके उस अज्ञात रक्त से, जिसका रहस्य केवल महागुरु जानते थे।
केवल युद्ध ही नहीं, रुद्र की बुद्धि भी उतनी ही प्रखर थी। आधी रात को जब पूरा गुरुकुल सोता था, रुद्र मशाल की मंद रोशनी में प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ता पाया जाता। वह सवाल करता था—ऐसे सवाल जिनका उत्तर देने में कभी-कभी वरिष्ठ आचार्य भी कतराते थे।
महागुरु का विशेष आदेश
एक सुबह, महागुरु ने आचार्यों की एक गुप्त सभा बुलाई। उनके सामने कुछ प्राचीन नक्शे और एक काला पत्थर रखा था, जिस पर विचित्र भाषा में कुछ अंकित था।
"समय निकट आ रहा है," महागुरु ने गंभीर स्वर में कहा। "आगामी 'शिखर-मुकाबला' केवल एक प्रतियोगिता नहीं होगी। यह एक चयन होगा—उस योद्धा का, जो उस द्वार को पार कर सके जिसे सदियों से किसी ने नहीं छुआ। रुद्र को तैयार करो। अब उसकी ट्रेनिंग साधारण छात्रों के साथ नहीं होगी। उसे 'अंधकार-कक्ष' और 'अग्नि-पथ' से गुजरना होगा।"
ट्रेनिंग का चरम और भावुकता का बांध
अगले कुछ महीनों में रुद्र का जीवन नरक जैसा हो गया। उसे ऐसी कठिन परिस्थितियों में अभ्यास कराया गया जहाँ साधारण मनुष्य का मनोबल टूट जाए। आँखों पर पट्टी बांधकर तीरों को रोकना, ठंडे बर्फीले पानी में रात भर खड़े रहकर ध्यान लगाना और बिना अन्न-जल के दुर्गम पहाड़ियों पर चढ़ना।
एक शाम, जब सूरज पहाड़ियों के पीछे डूब रहा था, रुद्र अभ्यास के मैदान में अकेला बैठा था। उसके हाथ छिल चुके थे और शरीर पर अनगिनत खरोंचें थीं। अचानक, वह कठोर योद्धा, जो पूरी दुनिया के लिए अपराजेय दिखता था, टूट गया।
उसकी आँखों से आंसू बहने लगे। उसने अपनी वह लकड़ी की तलवार दूर फेंक दी। सिसकियों के बीच उसके मुँह से केवल एक ही शब्द निकला— "माँ।"
उसने कभी अपनी माँ को नहीं देखा था, न ही उसे पता था कि उसका घर कहाँ है। लेकिन आज, इस असहनीय थकान और अकेलेपन ने उसे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह यह सब क्यों कर रहा है? उसे कोई महान योद्धा नहीं बनना था, उसे बस एक साधारण बालक की तरह किसी की ममता भरी गोद में सिर रखकर सोना था।
चलिए, कहानी को और अधिक गहराई देते हुए अध्याय 8 की ओर बढ़ते हैं। यहाँ रुद्र की आंतरिक पीड़ा और महागुरु के मार्गदर्शन के बीच का एक बहुत ही भावुक और महत्वपूर्ण संवाद सामने आएगा।