उसने अपना दायां हाथ धीरे से उस पुराने बरगद के खुरदरे तने पर रखा। जिस जगह उसकी ठंडी उंगलियां पड़ीं, वहाँ की हरी काई पलक झपकते ही किसी जली हुई माचिस की तीली की तरह सूख कर काली पड़ गई। तने के बीचों-बीच एक गहरी दरार खामोशी से चौड़ी हुई, जैसे पेड़ ने खुद अपना सीना चीर दिया हो। वह रहस्यमयी कन्या बिना कोई आहट किए उस अंधेरे में समा गई। दरार वापस जुड़ गई। वहां सिर्फ सूखी पत्तियों की सरसराहट बची थी, मानो पल भर पहले वहां कोई था ही नहीं... बस हवा में चंदन की वह भारी महक उस सच की गवाही दे रही थी।
स्कूटी की काली लेदर की सीट पर विराज इतना पीछे खिसक कर बैठा था कि उसका आधा हिस्सा हवा में था। दोनों के बीच इतनी जगह खाली थी कि एक छोटा बच्चा आराम से बैठ जाए। उसने पीछे लगे लोहे के ग्रिल को इतनी बुरी तरह जकड़ रखा था कि उसकी उंगलियों के पोर खून जमने से बिल्कुल सफ़ेद पड़ गए थे। शहर की उबड़-खाबड़ और धूल भरी सड़कों पर स्कूटी हिचकोले खा रही थी, पर विराज की छाती में साँसें गले तक ही आकर रुक रही थीं। काव्या हमेशा की तरह हवा से बातें करते हुए गाड़ी चला रही थी, लेकिन आज विराज के कानों में ट्रैफिक का शोर या ऑटो वालों की गालियां नहीं पहुँच रही थीं। उसके दिमाग में सिर्फ एक ही दृश्य हथौड़े की तरह बज रहा था—काव्या की वे आँखें। बरगद के पेड़ के नीचे जब काव्या ने उसका हाथ पकड़ा था, तो एक पल के लिए काव्या का चेहरा बदल गया था। वही आँखें, जिन्होंने बीती रात सपने में उसकी गर्दन पर तलवार चलाई थी।
"मरने का इरादा है क्या?" काव्या ने स्कूटी के रियर-व्यू शीशे में देखते हुए तेज़ हवा के बीच चिल्लाकर कहा। "थोड़ा आगे खिसक कर बैठ, किसी गड्ढे में पीछे गिर गया तो तेरी माँ मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेगी!"
विराज के गले में थूक का एक बड़ा सा गोला अटक गया। ऐसा लगा जैसे गले में कोई कांटा फंस गया हो। उसने संकोच के साथ बस एक इंच आगे खिसकने का नाटक किया। "मैं... मैं ठीक हूँ," उसके सूखे होंठों से एक लड़खड़ाती हुई, हकलाती आवाज़ निकली।
काव्या ने स्कूटी की रेस थोड़ी कम की। उसने बिना पीछे मुड़े कहा, "तुम्हें सच में क्या हुआ था वहाँ दीवार के पास? तुम्हारे हाथ ऐसे ठंडे हो गए थे जैसे मैंने किसी मुर्दे की कलाई पकड़ ली हो।"
विराज ने अपनी आँखें ज़ोर से भींच लीं। वह उसे क्या बताता? कि जिस लड़की के पीछे वह दुबक कर बैठा है, उसी की शक्ल वाली किसी औरत ने पिछले जन्म में उसका कत्ल किया था? उसने बस एक गहरी, कांपती हुई सांस छोड़ी और हवा में उड़ते काव्या के बालों से अपना चेहरा बचाते हुए बोला, "कुछ नहीं... बस रात को ठीक से सोया नहीं था। शायद इसलिए दिमाग सुन्न पड़ रहा है।"
काव्या ने हल्के से 'हूँ' की आवाज़ निकाली, पर वह संतुष्ट नहीं थी। उसने स्कूटी की रेस फिर बढ़ा दी।
घर की चौखट और वो अनजानी महक
स्कूटी जैसे ही घर के दरवाज़े पर रुकी, विराज चलती स्कूटी से ही लगभग कूद सा गया। अंदर घुसते ही माहौल बिल्कुल अलग था। बैठक में सोफे खिसका कर एक तरफ कर दिए गए थे। छत के पंखे से रंग-बिरंगे गुब्बारे बांधने का काम चल रहा था। छोटी बहन टीना मुँह में हवा भरकर एक लाल गुब्बारा फुला रही थी। "आ गया हमारा राजकुमार!" टीना ने फूले हुए गुब्बारे को धागे से बांधते हुए चिढ़ाया। "जल्दी जाकर नहा ले भाई, शाम के मेहमानों की लिस्ट बहुत लंबी है।"
रसोई से देसी घी में सिकती हुई सूजी और इलायची की मीठी, भारी महक पूरे घर में तैर रही थी। माँ पसीने से तर-बतर चेहरे के साथ पूरियाँ बेलने में लगी थीं। यह सब बहुत आम था। बहुत साधारण। बिल्कुल वैसा ही जैसा हर मध्यम वर्गीय घर में किसी त्योहार या जन्मदिन पर होता है। लेकिन विराज को यह सब एक नाटक सा लग रहा था। उसे लग रहा था जैसे वह किसी कांच के मोटे जार के अंदर बंद है... बाहर की दुनिया सिर्फ होंठ हिला रही है, पर आवाज़ उस तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ दे रही है।
"मैं... मैं कपड़े बदल कर आता हूँ," वह बिना किसी से नज़रें मिलाए, अपने भारी हो चुके जूतों को फर्श पर घसीटता हुआ सीढ़ियों की तरफ बढ़ गया।
पीछे से काव्या की आवाज़ आई, "आंटी! मैं भी जा रही हूँ शाम की ड्रेस निकालने। इस कुंभकर्ण को जगा कर रखना, कहीं सो न जाए!"
कमरे का सन्नाटा और वो निशानी
विराज ने अपने कमरे में घुसते ही दरवाज़े की कुंडी एक झटके में लगा दी।
उसने अपना बैग ज़मीन पर फेंका और हांफते हुए बिस्तर पर गिर पड़ा। कमरा बंद था। एसी नहीं चल रहा था, और दोपहर की उमस खिड़कियों के शीशे से अंदर झाँक रही थी और पुरानी ट्यूबलाइट हल्की सी भिनभिना रही थी।
उसने कांपते हाथों से अपनी शर्ट के बटन खोले। उंगलियों में इतनी हड़बड़ाहट थी कि नीचे के दो बटन टूटकर फर्श पर 'टक-टक' करते हुए दूर छिटक गए। उसने आईने के सामने जाकर अपनी छाती को देखा।
वह लाल तिल... अब सिर्फ एक निशान नहीं था। वह खाल के ऊपर हल्का सा उभर आया था, जैसे किसी ने त्वचा के ठीक नीचे खून के रंग का एक छोटा सा कंकड़ सिल दिया हो। और सबसे खौफनाक बात यह थी कि उस निशान के आस-पास की नसें हल्की नीली पड़ने लगी थीं, जैसे कोई ज़हर वहां से पूरे शरीर में फैलने की कोशिश कर रहा हो।
उसने डरते-डरते अपनी उंगली उस उभरे हुए निशान पर रखी।
तड़ाक!
जैसे ही उसकी उंगली ने उस तिल को छुआ, कमरे की ट्यूबलाइट एक झटके में फुस्स हो गई। भिनभिनाहट एकदम से शांत हो गई और कमरे में एक दमघोंटू सन्नाटा पसर गया।
पर इससे भी ज्यादा अजीब बात यह थी कि बंद कमरे में अचानक एक बेहद बर्फीली हवा का झोंका कहीं से आया। इतनी ठंडी हवा कि विराज के शरीर के सारे रोंगटे कांटे की तरह खड़े हो गए।
और फिर... वह महक। चमेली के ताज़े फूलों और घिसे हुए चंदन की एक बहुत तीखी, नशीली सी खुशबू ने पलक झपकते ही कमरे की उमस और पसीने की गंध को निगल लिया। यह महक इतनी हावी थी कि विराज का सिर चकराने लगा।
"कौन है?" विराज के सूखे गले से एक फुसफुसाहट निकली। ऐसा लगा जैसे गले में रेत भर गई हो।
जवाब में कोई आवाज़ नहीं आई। बस उस बर्फीली हवा ने कमरे में रखे उसके स्टडी-टेबल के पन्नों को हवा में उड़ा दिया।
विराज ने अपनी आँखें मलते हुए टेबल की तरफ देखा। वहाँ जो था, उसने विराज के पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
टेबल के ठीक बीचों-बीच, उसकी खुली हुई गणित की किताब के ऊपर... एक बिल्कुल ताज़ा, दूध जैसा सफ़ेद चमेली का फूल रखा था। कमरे की खिड़कियां पिछले तीन दिन से बंद थीं। बाहर दूर-दूर तक कोई चमेली का पौधा नहीं था। फिर यह फूल यहाँ कहाँ से आया? विराज ने झिझकते हुए उस फूल की तरफ हाथ बढ़ाया। फूल की पंखुड़ियों पर ओस की एक बारीक बूंद अभी भी चमक रही थी, जैसे किसी ने उसे कुछ सेकंड पहले ही वहां रखा हो।
तभी, नीचे मुख्य दरवाज़े पर एक दस्तक हुई।
यह बिजली वाली कॉल-बेल की आवाज़ नहीं थी। किसी ने लकड़ी के दरवाज़े पर बहुत भारी और पुराने तरीके से हाथ से 'खट-खट' किया था। विराज का सीना अचानक ज़ोर से धड़कने लगा। वह लाल निशान फिर से गर्म होने लगा था, लेकिन इस बार डर से नहीं... बल्कि एक अजीब से खिंचाव से। जैसे वह फूल, वह महक और बाहर दरवाज़े पर खड़ा अजनबी... तीनों एक ही अदृश्य धागे से बंधे हों।
अचानक उस नशीली महक और डर ने उसके दिमाग की नसें सुन्न कर दीं। माथे पर चिपचिपा पसीना उभर आया। पलकें किसी सीसे की तरह भारी होने लगीं। कमरे की ज़मीन गोल-गोल घूमने लगी और इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, उसके घुटने टिक गए। वह अंधेरे में डूबता चला गया।
जब उसकी आधी खुली आँखों में चेतना वापस लौटी, तो कमरा एक अजीब सी, ठंडी नीली रोशनी से भरा हुआ था। उसके ठीक सामने हवा में एक दिव्य ज्योति धीरे-धीरे आकार ले रही थी।
वही कन्या। बरगद वाली कन्या। लेकिन इस बार उसका रूप ऐसा था कि खुली आँखों से उसे देखना मुश्किल था। उसके चेहरे के चारों ओर एक ऐसा अलौकिक तेज़ था जो किसी इंसान का हो ही नहीं सकता। वह किसी स्त्री या अप्सरा से भी परे थी, जिसे देखकर देवता भी मोहित हो जाएं। उसके लंबे, काले बाल बिना किसी हवा के धीरे-धीरे लहरा रहे थे। उसकी झील जैसी गहरी आँखों में सदियों का ठहराव था और भरे हुए चेरी जैसे होंठों पर एक ऐसी रहस्यमयी मुस्कान थी, जो देखने वाले के सीने में मीठे तीर की तरह चुभ जाए।
उसने ज़मीन पर बेसुध पड़े विराज को देखा। उसकी आवाज़ सीधे विराज के दिमाग में गूंजी, होंठ हिले भी नहीं।
"बहुत लंबा समय बीत गया..." उसकी आवाज़ में एक पुरानी टीस और गहरा सुकून दोनों थे। "इस ग्रह के समय के अनुसार, हमें बिछड़े लाखों वर्ष हो गए। बहुत जल्द तुम्हें पता चलेगा कि तुम्हारी वास्तविकता क्या है।"
उसने धीरे से अपना दायां हाथ आगे बढ़ाया। उसकी तर्जनी उंगली के पोर पर एक हल्की सी सुनहरी ऊर्जा की बूंद चमकने लगी। उसने वो उंगली झुककर विराज की छाती पर ठीक उस लाल तिल वाले निशान पर रख दी।
छूते ही वह ऊर्जा का पुंज पानी की बूंद की तरह उस तिल के अंदर समा गया। विराज को लगा जैसे किसी ने तपते रेगिस्तान में अचानक बर्फ की सिल्ली रख दी हो। वह दर्द, वो नीली नसें, वो उभरा हुआ निशान... सब पलक झपकते ही ऐसे गायब हो गए जैसे वहां कभी कुछ था ही नहीं। त्वचा एकदम सामान्य हो गई।
वह अलौकिक स्त्री हल्के से मुस्कुराई। "कुछ समय के लिए... तुम अब ठीक हो," उसने एक अदृश्य फुसफुसाहट में कहा।
कमरे की रोशनी मद्धम पड़ने लगी। जाने से पहले उसने हल्का सा मुड़कर विराज की आँखों में एक आखिरी बार देखा... और ओस की तरह उसी बंद कमरे की हवा में विलीन हो गई।