बनारस की तंग गलियां रात के सन्नाटे में किसी अजगर की तरह फुसफुसा रही थीं। आर्यन की रॉयल एनफील्ड की आवाज़ उन खामोश दीवारों से टकराकर वापस आ रही थी। ठंडी हवा के झोंके उसके चेहरे पर सुइयों की तरह चुभ रहे थे, लेकिन उसके शरीर से पसीना बह रहा था। उसके गले में लटका वह रहस्यमयी लॉकेट अब कोयले की तरह गरम हो रहा था, मानो उसके अंदर कोई ज्वालामुखी फटने को बेताब हो।
अचानक, उसकी बाइक का इंजन एक झटके के साथ बंद हो गया। हेडलाइट की रोशनी धीरे-धीरे मद्धम पड़ी और फिर पूरी तरह अंधेरा छा गया।
"नहीं, अभी नहीं!" आर्यन ने गुस्से में किक मारी, लेकिन बाइक जैसे पत्थर बन चुकी थी।
तभी उसे अहसास हुआ कि चारों ओर सन्नाटा इतना गहरा है कि वह अपनी खुद की धड़कनें सुन सकता था। लेकिन उस धड़कन के साथ एक और आवाज़ थी—छप-छप... छप-छप... जैसे कोई गीले पैरों से उसके पीछे चल रहा हो।
आर्यन ने धीरे से पीछे मुड़कर देखा। गली के मुहाने पर एक साया खड़ा था। वही साया, जिसकी धुंधली तस्वीर उसके फोन पर आई थी। लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था। उसके पीछे तीन और आकृतियां थीं, जिनके हाथों में चमकते हुए पुराने ज़माने के खंजर थे।
प्राचीन हवेली का बुलावा
आर्यन के दिमाग में फिर से वही चीख गूंजी। इस बार वह और साफ थी। “आर्यन... कालभैरव के द्वार पर सत्य की बलि मत चढ़ने देना!”
वह आवाज़ उसकी माँ की थी? या किसी और की? उसे याद नहीं था, क्योंकि 10 साल पहले एक हादसे ने उसकी याददाश्त का एक बड़ा हिस्सा मिटा दिया था।
"कौन हो तुम लोग? क्या चाहिए मुझसे?" आर्यन ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
सामने खड़े साये में से एक आगे बढ़ा। उसकी आवाज़ किसी फटी हुई शहनाई जैसी थी, "हमें वह नहीं चाहिए जो तुम्हारे पास है, आर्यन। हमें वह चाहिए जो तुम 'हो'। तुम उस 'शून्य' की चाबी हो जिसे हमारे स्वामी सदियों से खोज रहे हैं।"
इससे पहले कि आर्यन कुछ समझ पाता, वे साये बिजली की गति से उसकी ओर लपके। आर्यन ने अपनी जैकेट उतारी और उसे ढाल की तरह इस्तेमाल करते हुए पहले हमलावर का वार रोका। उसकी रगों में एक अजीब सी ऊर्जा दौड़ने लगी थी। उसने एक ज़ोरदार पंच मारा, जो सीधे साये के सीने पर लगा। लेकिन वह साया पीछे हटने के बजाय धुएं की तरह बिखर गया और फिर से जुड़ गया।
"इंसान से लड़ सकते हो, रूहों से नहीं!" साया हंसा।
तभी आर्यन के लॉकेट से एक तीखी नीली रोशनी निकली। वह रोशनी इतनी प्रबल थी कि उन सायों की चीखें निकल गईं। वे पीछे हटने लगे। आर्यन को समझ आ गया कि यह लॉकेट ही उसका एकमात्र हथियार है। वह बिना सोचे-समझे पास की एक पुरानी, खंडहर हो चुकी हवेली की तरफ भागा, जिसका दरवाज़ा आधा खुला था।
लहू और मंत्र
हवेली के अंदर कदम रखते ही उसे पुरानी किताबों और जलते हुए मांस की गंध आई। दीवारों पर अजीबोगरीब चित्र बने थे—एक त्रिकोण, जिसके बीच में एक आंख थी। वही त्रिकोण जो अघोरी की लाश के पास खून से बना था।
हवेली के बीचों-बीच एक विशाल कुंड था, जिसमें से काला धुआं निकल रहा था। वहां एक बूढ़ी औरत बैठी थी, जिसके बाल सफेद और जमीन तक लंबे थे। वह किसी प्राचीन भाषा में मंत्र बुदबुदा रही थी।
"आखिरकार... उत्तराधिकारी आ ही गया," औरत ने बिना पीछे मुड़े कहा।
आर्यन थम गया। "उत्तराधिकारी? कैसा उत्तराधिकारी? मेरी माँ कहाँ है? और यह लॉकेट क्या है?"
औरत धीरे से मुड़ी। उसकी आंखों की पुतलियां सफेद थीं। "यह लॉकेट कोई गहना नहीं, 'महाकाल का अंश' है। और तुम्हारे सीने के अंदर जो दिल धड़क रहा है, वह सिर्फ खून पंप नहीं करता, वह उस चाबी की धड़कन है जो पाताल के दरवाज़े खोल सकती है। तुम्हारे पिता ने इसे बचाने के लिए अपनी जान दी थी।"
आर्यन के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसके पिता की मौत एक कार एक्सीडेंट में नहीं हुई थी?
"तुम्हारे पीछे जो शिकारी हैं, वे 'छायापुत्र' हैं। उन्हें सिर्फ तुम्हारा खून चाहिए ताकि वे उस चाबी को सक्रिय कर सकें। अगर आज रात 3 बजे तक तुम सुरक्षित रहे, तो यह शक्ति तुम्हारी होगी। वरना..." बूढ़ी औरत की आवाज़ कांपी।
शिकार और शिकारी
अचानक हवेली की छत से खंजरों की बारिश होने लगी। वे साये अब हवेली के अंदर घुस चुके थे। बूढ़ी औरत ने चिल्लाकर कहा, "भागो आर्यन! मणिकर्णिका के उस गुप्त कक्ष में जाओ जहाँ चिताओं की राख कभी ठंडी नहीं होती। वहीं तुम्हें सत्य मिलेगा!"
आर्यन हवेली के पिछले रास्ते से भागा। पीछे से उसे उस औरत की दर्दनाक चीख सुनाई दी, जो शायद उन सायों का शिकार बन चुकी थी। वह गलियों में दौड़ रहा था, गिर रहा था, संभल रहा था। उसके कान सुन्न पड़ रहे थे।
तभी उसका फोन फिर से वाइब्रेट हुआ। एक नया मैसेज था।
इस बार फोटो नहीं, एक वीडियो था।
वीडियो में आर्यन खुद को देख रहा था... लेकिन वह वीडियो अभी का नहीं था। वह वीडियो 100 साल पुराना लग रहा था, जिसमें आर्यन बिल्कुल वैसा ही दिख रहा था, जैसे आज है। वह एक सिंहासन पर बैठा था और उसके हाथ में वही लॉकेट था।
"यह कैसे संभव है? मैं... मैं 100 साल पहले भी यहाँ था?" आर्यन का सिर घूमने लगा।
श्मशान का रहस्य
दौड़ते-दौड़ते वह फिर से मणिकर्णिका घाट पर पहुँच गया। रात के 2:45 बज रहे थे। चिताएं अब भी जल रही थीं। अघोरी की लाश वहाँ से गायब थी, लेकिन वहाँ एक नई चीज़ थी।
रेत पर एक विशाल 'समय यंत्र' (Sun Dial) जैसा कुछ बना था, जो चांदनी में चमक रहा था।
जैसे ही आर्यन उस यंत्र के पास पहुँचा, हवा रुक गई। लहरें स्थिर हो गईं। सामने से एक आकृति चलकर आई। वह कोई साया नहीं था। वह एक जीता-जागता इंसान था, जिसने बिल्कुल आर्यन जैसे ही कपड़े पहने थे। उसका चेहरा भी बिल्कुल आर्यन जैसा था।
वह 'दूसरा आर्यन' मुस्कुराया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।
"हैरान मत हो। मैं तुम्हारा अतीत हूँ, और तुम मेरा भविष्य। लेकिन इस खेल में केवल एक ही ज़िंदा रह सकता है। तुमने रुद्राक्ष फेंक कर जिसे मारा था, वह सिर्फ एक मोहरा था। असली रक्षक तो मैं था, जिसे तुमने खुद अपने हाथों से कमज़ोर कर दिया।"
आर्यन ने अपने गले के लॉकेट को कसकर पकड़ा। "तुम कौन हो?"
"मैं वह हूँ जिसे तुमने 100 साल पहले इसी घाट पर ज़िंदा जलाया था ताकि तुम अमर हो सको। लेकिन देखो, कुदरत का इंसाफ... आज फिर वही रात है, वही घाट है, और वही मौत की दस्तक है।"
तभी अचानक आर्यन के फोन पर एक कॉल आई। स्क्रीन पर लिखा था— 'Mom Calling'।
आर्यन ने कांपते हाथों से फोन उठाया। दूसरी तरफ से उसकी माँ की आवाज़ आई, लेकिन वह डरी हुई नहीं थी। वह हंस रही थी।
"आर्यन बेटा... जो तुम्हारे सामने खड़ा है, उस पर यकीन मत करना। और जो तुम्हारे गले में है... उसे कभी खोलना मत। क्योंकि अगर तुमने उसे खोला, तो बनारस की यह रात आखिरी रात होगी।"
तभी वह 'दूसरा आर्यन' गायब हो गया और उसकी जगह एक काला गड्ढा बन गया, जिससे हज़ारों हाथ बाहर निकलने लगे। आर्यन ने अपने लॉकेट की तरफ देखा, जो अब फटने की कगार पर था। उसने गौर से देखा, लॉकेट के पीछे एक छोटा सा स्विच था।
क्या वह अपनी माँ की बात माने? या उस लॉकेट के रहस्य को खोल दे?
उसने अपनी आँखें बंद कीं और जैसे ही लॉकेट को खोलने के लिए हाथ बढ़ाया, उसे महसूस हुआ कि उसके पीछे कोई खड़ा है। उसने पीछे मुड़कर देखा तो उसकी रूह फना हो गई।
वहाँ उसकी माँ खड़ी थी, लेकिन उसके हाथ में वही खंजर था जो अघोरी की पीठ में घोंपा गया था।
"माँ... आप?" आर्यन के गले से आवाज़ नहीं निकली।
उसकी माँ ने एक ठंडी मुस्कान दी और कहा, "मैंने कहा था न... रक्षक ही भक्षक बनेगा। चाबी दे दो, आर्यन।"
अंत या शुरुआत?
आर्यन ने लॉकेट को खींचकर तोड़ दिया। एक ज़ोरदार धमाका हुआ। पूरी गंगा का पानी आसमान की तरफ उछला। जब धुआं छंटा, तो घाट खाली था। न वहाँ आर्यन था, न उसकी माँ, न ही वे साये।
सिर्फ एक चीज़ बची थी—आर्यन का मोबाइल फोन, जो रेत पर पड़ा था।
उसकी स्क्रीन पर एक नया मैसेज फ्लैश हो रहा था:
"गेम ओवर नहीं हुआ है। तुम अभी भी उसी 100 साल पुरानी हवेली के अंदर सो रहे हो। यह सब एक सपना था... या शायद हकीकत? उठो आर्यन, कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है।"
बनारस के एक कमरे में, आर्यन की आँखें अचानक खुलीं। वह पसीने से नहाया हुआ था। उसे लगा कि सब सपना था। उसने राहत की सांस ली।
तभी... उसके कमरे के दरवाज़े पर ज़ोरदार दस्तक हुई।
टप... टप... टप...
उसने नीचे देखा। फर्श पर गीले पैरों के निशान थे जो सीधे उसके बिस्तर तक आ रहे थे। और उसके गले में... वह लॉकेट अभी भी नीली रोशनी दे रहा था।
क्या आप जानना चाहते हैं कि उस दरवाज़े के पीछे कौन है? और आर्यन की माँ का असली चेहरा क्या है? अगले भाग के लिए बने रहें!