विराज मल्होत्रा के चले जाने के बाद भी काव्या वहीं हॉल में खामोश खड़ी रही। उसके दिल की धड़कनें अब भी सामान्य नहीं हुई थीं। वह पुराना दरवाज़ा और उस पर लटका भारी पीतल का ताला—जैसे कोई चीख-चीखकर कह रहा हो कि यहाँ कुछ ऐसा दफन है जिसे बाहर आने की इजाजत नहीं है। विराज की वे आँखें, जिनमें नफरत के पीछे छिपी बेबसी की झलक उसने देखी थी, काव्या के जेहन से हट नहीं रही थीं।
अगली सुबह सूरज की रोशनी जब आलीशान बंगले की खिड़कियों से छनकर अंदर आई, तो माहौल रात के मुकाबले काफी शांत था। काव्या नाश्ते की मेज पर बैठी थी, पर उसका ध्यान अपनी फाइल और पेन पर नहीं, बल्कि सीढ़ियों पर था। तभी विराज नीचे आया। उसने काले रंग का सूट पहना था, चेहरे पर वही सख्त भाव और आंखों में अनुशासन।
"गुड मॉर्निंग सर," काव्या ने धीमी आवाज़ में कहा।
विराज ने उसे देखा तक नहीं। वह सीधे कॉफी मेकर की ओर बढ़ा और अपनी ब्लैक कॉफी बनाई। "कल रात जो हुआ, उसे भूल जाना ही तुम्हारे लिए बेहतर होगा, काव्या। मैं नहीं चाहता कि मेरे घर का कोई भी हिस्सा तुम्हारी कल्पना का शिकार बने," उसने ठंडे लहजे में कहा।
काव्या ने अपनी डायरी बंद की और सीधे विराज की आँखों में देखते हुए बोली, "लेखक कल्पना नहीं करता सर, वह सिर्फ सच को महसूस करता है। आपने मुझे अपनी बायोग्राफी लिखने के लिए यहाँ बुलाया है,
लेकिन अगर मैं आपके डर और उस बंद कमरे के पीछे के सच को नहीं जानूँगी, तो यह कहानी अधूरी रहेगी।"
विराज का हाथ कॉफी के कप पर ठिठक गया। उसने गर्दन घुमाकर काव्या को गौर से देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद गुस्सा, या शायद यह हैरानी कि कोई उसे इतनी हिम्मत से चुनौती दे रहा है।
"सच कभी-कभी बहुत कड़वा होता है। उसे सहने की ताकत हर किसी में नहीं होती," विराज ने कदम आगे बढ़ाते हुए कहा। वह काव्या के इतने करीब आ गया कि उसे उसकी परफ्यूम की तेज खुशबू महसूस होने लगी। "तुम यहाँ काम करने आई हो, मेरी रूह के घाव कुरेदने नहीं।"
विराज ऑफिस के लिए निकल गया, लेकिन काव्या का दिमाग अब उस बंद कमरे की चाबी खोजने में लग गया था। उसे लगा कि विराज की इस रुखी शख्सियत के पीछे कोई गहरी चोट छिपी है। उसने पूरे घर का जायजा लेना शुरू किया। वह जानती थी कि विराज जैसे व्यवस्थित इंसान की हर चीज का एक ठिकाना होता है।
दोपहर में, जब घर के नौकर अपने कामों में व्यस्त थे, काव्या चुपके से विराज के स्टडी रूम में दाखिल हुई। वहाँ चारों ओर किताबों और फाइलों का अंबार था। मेज के एक कोने में एक छोटी सी दराज थी, जो अक्सर बंद रहती थी। काव्या ने उसे खोलने की कोशिश की, पर वह लॉक थी।
अचानक, उसकी नजर मेज पर पड़ी एक पुरानी फोटो फ्रेम पर गई, जो उल्टी रखी हुई थी। जैसे ही उसने उसे सीधा किया, उसके हाथ कांपने लगे। उस तस्वीर में विराज एक छोटी बच्ची और एक महिला के साथ खड़ा था—उसके चेहरे पर वह मुस्कुराहट थी जो काव्या ने पहले कभी नहीं देखी थी।
तभी बाहर से किसी के आने की आहट हुई। काव्या ने जल्दी से तस्वीर वापस रखी और बाहर निकल आई। उसके मन में अब सवाल और गहरे हो गए थे।
क्या उस बंद कमरे का ताल्लुक इस तस्वीर से है? क्या वही वह सच है जिसे विराज धूल में छिपाना चाहता है?
रात हुई, और घर में फिर से वही सन्नाटा पसर गया। काव्या अपनी खिड़की से उस पुराने गलियारे को देख रही थी। उसे यकीन था कि अगर वह उस कमरे के अंदर पहुँच गई, तो 'इश्क और इस्तीफा' सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि विराज मल्होत्रा के जीवन का सबसे बड़ा खुलासा बन जाएगी।
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Author = Deepti Gurjar