Row Agent - 1 - 25 in Hindi Detective stories by bhagwat singh naruka books and stories PDF | रॉ एजेंट सीजन 1 - 25

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रॉ एजेंट सीजन 1 - 25

कमरे में हल्की रोशनी थी।
टेबल पर नक्शे फैले हुए थे, कुछ जगहों पर लाल गोले बने हुए… और एक कोने में रखी बोतल आधी खाली हो चुकी थी।

बाहर से आती ठंडी हवा परदे को हिला रही थी…
और अंदर बैठे अजय सिंह की आंखें किसी गहरी सोच में डूबी हुई थीं।

वहीं सामने कुर्सी पर बैठा विजय डोभाल एक और पैग बनाता है… और बिना सोचे समझे एक ही सांस में गटक जाता है।

विजय (हल्की नशे में) 

"हां तो… तू कुछ कह रहा था…"

अजय उसकी तरफ देखता है… फिर धीरे से बोलता है।
अजय सिंह –

"मैंने कहा था ना… नूर जहां के प्लेस में एक बड़ा जलसा होने वाला है।"

विजय सिर हिलाता है।

विजय –
"हां… कहा था…"

वो ग्लास टेबल पर रखते हुए मुस्कुराता है।

"तो… क्या?"

अजय कुर्सी से उठता है…
धीरे-धीरे चलते हुए खिड़की के पास जाता है… और बाहर अंधेरे में झांकता है।
कुछ सेकंड की खामोशी…
फिर उसकी आवाज़ आती है  ठंडी… और सटीक।

अजय सिंह –
"तो ये… हमारा सबसे बड़ा मौका है।"
वो मुड़ता है… उसकी आंखों में एक अलग चमक थी।
"मैंने एक प्लान सोचा है…"

विजय थोड़ा सीधा बैठता है।

विजय –
"कैसा प्लान?"

अजय वापस टेबल के पास आता है…
नक्शे पर उंगली रखते हुए बोलता है।

अजय सिंह –
"कल… अबू कासिम की सगाई का जलसा है।"
वो नक्शे पर एक जगह टैप करता है।
"और वहां… उसके चाचा… यानी नूर जहां के अब्बू भी होंगे।"

विजय ध्यान से सुन रहा था।
अजय थोड़ा झुककर धीमे स्वर में बोलता है।

अजय सिंह –
"क्यों ना… हम उन पर हमला करें…"

विजय का चेहरा अचानक सख्त हो जाता है।

विजय –
"क्या?"

अजय बिना रुके आगे बोलता है।

अजय सिंह –
"…और फिर… हम ही उनकी जान बचाएं।"

कमरे में सन्नाटा छा जाता है।
विजय कुछ सेकंड तक अजय को घूरता रहता है…
फिर अचानक हंस पड़ता है।

विजय –
"तू पागल हो गया है क्या?"
वो उठकर टहलने लगता है।
"पहले हमला करेंगे… फिर बचाएंगे…
ये कोई फिल्म चल रही है क्या?"

अजय मुस्कुराता है… लेकिन उसकी आंखें गंभीर थीं।

अजय सिंह –
"यही फर्क होता है… मिशन और फिल्म में।"

वो टेबल पर हाथ रखते हुए झुकता है।

"अगर ये प्लान सही बैठ गया…
तो हम सीधे उनके दिल में जगह बना लेंगे।"

वो आगे बोलता है

"और सिर्फ एक आदमी नहीं…
हमीद… हादिज… इजाम… और आईएसआई के जितने भी लोग हैं…
उन सबकी नस पकड़ लेंगे हम।"

विजय धीरे-धीरे शांत होता है।
विजय –
"लेकिन… हमला करेगा कौन?"

अजय उसकी आंखों में देखते हुए बोलता है

अजय सिंह –
"हम।"

विजय एकदम रुक जाता है।

विजय –
"हम??"
"तू सच में पागल हो गया है।"

अजय हल्का मुस्कुराता है… और कुर्सी पर बैठ जाता है।

अजय सिंह (शांत लेकिन सख्त आवाज़ में) 

"हम में से एक हमला करेगा…
और दूसरा… हीरो बनेगा।"

विजय समझने लगता है।

अजय सिंह –
"जो उसकी जान बचाएगा…
वो उसका सबसे खास आदमी बन जाएगा।"

कुछ पल की खामोशी…

विजय गहरी सांस लेता है।

विजय –
"मुझे नहीं बनना उसका खास आदमी।"
वो सीधा बोलता है।
"और वैसे भी… उसे संभालना तेरे बस की बात है।
मैं… टारगेट सेट कर सकता हूं।"

अजय हल्का मुस्कुराता है।

अजय सिंह –
"मुझे पता था तू यही बोलेगा।"
वो नक्शे पर एक लाइन खींचता है।
"ये… हमारा एकमात्र मौका है।"
उसकी आवाज़ और भारी हो जाती है—
"जब सारे गीदड़… एक ही झुंड में इकट्ठा होंगे।"

वो विजय की तरफ देखता है।

अजय सिंह –
"तुझे बस… टारगेट पर वार करना है।"
"जैसे ही अबू कासिम के अब्बू पर गोली चलेगी…
मैं उसी वक्त मंच पर पहुंच जाऊंगा।"
वो हाथ से पूरा सीन समझाता है—
"गोली… दाईं तरफ… कंधे पर।
ना ज्यादा ऊपर… ना नीचे।"
"ताकि मैं उसे धक्का देकर गिरा सकूं…
और हीरो बन जाऊं।"

विजय ध्यान से सुन रहा था… अब उसका चेहरा पूरी तरह गंभीर था।

अजय सिंह –
"फिर… उसके गुर्गे हमलावर को ढूंढेंगे।"
"तू बाइक लेकर… मियां मस्जिद वाले रास्ते से निकलेगा।"

वो नक्शे पर रास्ता दिखाता है।
"वो तेरा पीछा करेंगे…
और तू उन्हें सीधा ले जाएगा

विजय बीच में बोल पड़ता है

विजय –
"जुमियत-उल वाले ठिकाने पर?"

अजय सिर हिलाता है।

अजय सिंह –
"बिल्कुल।"

विजय की आंखें फैल जाती हैं।

विजय –
"वहां क्यों?"
"वो तो आईएसआई के सरगना मसूद अजहर का खास आदमी है।"
"उसका अड्डा है वो… वहां उसके लोग होंगे।"

अजय हल्का हंसता है।
अजय सिंह –
"यही तो खेल है।"

वो धीरे से बोलता है

"कल जश्न है…
सारे अलकायदा और बाकी गैंग वहीं होंगे।"
"मैंने पूरी जानकारी निकाल ली है…
उस ठिकाने पर कल कोई नहीं होगा।"

विजय अब पूरी तरह ध्यान से सुन रहा था।

अजय सिंह –
"वहां सिर्फ तू होगा…
और हमारे लोग… जो पहले से पोजिशन में होंगे।"
"जैसे ही वो तेरे पीछे वहां पहुंचेंगे…"

उसकी आंखों में खतरनाक चमक आ जाती है

"तुम… उनकी कब्र खोद दोगे।"

कमरे में सन्नाटा…
अजय सिंह (धीरे लेकिन भारी स्वर में) 

"और शक जाएगा… मसूद अजहर और उसके संगठन पर।"

विजय धीरे-धीरे मुस्कुराने लगता है।

विजय –
"मतलब… एक तीर से दो शिकार।"

अजय सिर हिलाता है।

अजय सिंह –
"अगर किस्मत ने साथ दिया…
तो इस लिस्ट में से कोई बड़ा नाम भी फंस सकता है।"

विजय कुर्सी से उठता है…
टेबल के पास आता है… और नक्शे को ध्यान से देखता है।

विजय –
"तो सबसे पहले… हमें उस जगह का मुआयना करना होगा।"
"जहां ये जलसा होगा।"
"और ये देखना होगा…
कि टारगेट सेट करने के लिए सबसे सही पोजिशन कौन सी है।"

अजय हल्का मुस्कुराता है।

अजय सिंह –
"उसकी चिंता मत कर।"
"सब सेट है।"

फिर थोड़ा रुककर कहता है—

"फिर भी अगर तुझे देखना है…
तो आज रात चलकर देख ले।"

उसकी आवाज़ सख्त हो जाती है
"लेकिन याद रखना…
जैसा मैंने कहा है… वैसा ही करना।"
"एक छोटी सी गलती…
पूरे मिशन पर पानी फेर सकती है।"

विजय सीधा खड़ा हो जाता है।
उसकी आंखों में अब नशा नहीं…
सिर्फ जुनून था।
विजय डोभाल 

"आज तक मैंने कोई टारगेट सेट किया है… जो फेल हुआ हो?"

वो हल्का मुस्कुराता है।

"तू भी जानता है…
मेरा निशाना कभी नहीं चूकता।"

वो धीरे-धीरे बोलता है

"और यहां बात मेरे देश के दुश्मनों की है…"
उसकी आवाज़ भारी हो जाती है

"तो यहां गलती की कोई गुंजाइश ही नहीं है।"
वो अपने सीने पर हाथ मारता है।

विजय –
"हर भारतीय की कसम है मुझे…
हिसाब पूरा करूंगा।"

वो अजय की आंखों में देखता है।

विजय (जोश में) –
"और जब दुश्मन के घर में घुस ही आए हैं…"

उसकी मुट्ठी कस जाती है

"तो मार कर ही जाएंगे। 🇮🇳"

अजय सिंह उसे देखता है…
और उसके चेहरे पर हल्की लेकिन संतुष्ट मुस्कान आ जाती है।
बाहर हवा तेज़ हो चुकी थी…
और अंदर…
एक ऐसा प्लान तैयार हो चुका था…
जो या तो इतिहास बना सकता था…
या… सब कुछ खत्म कर सकता था।