स्वयं आप
कमल चोपड़ा
खाकी लोगों की दीवार सामने थी और वे उनके सामने उन्हीं के खिलाफ नारे लगा रहे थे। यह हक उन्हें लोकतन्त्र ने दिया था। चिल्ला-चिल्लाकर उनकी गले की नसें दर्द करने लगी थीं। परसों उन्होंने मुख्यमन्त्री का घेराव करने की कोशिश की थी। कल जन्तर-मन्तर पर धरना देकर बैठे थे और आज इण्डियागेट पर कैंडिल मार्च करना है, उसके बाद ही घर लौटेंगे।
छह महीने बाद ही चुनाव हैं। सरकार की जमकर बदनामी हो रही है। रेप थमने की बजाय उल्टा बढ़ गये थे। या कम-से-कम खबरों से ऐसा ही लगता था। दबी जुबान में नेता रामस्वरूप वर्माजी भी मान रहे थे कि रेप तो होते रहे हैं! हो रहे हैं! होते रहेंगे!
रामस्वरूप वर्माजी के खासमखास थे शुक्लाजी। वर्माजी के कहने पर ही वे धरना-प्रदर्शनों में भाग ले रहे थे। तीन दिन से फैक्ट्री भी नहीं गये थे। उनकी अनुपस्थिति में फैक्ट्री उनके साले साहब का लड़का प्रदीप सम्भाल रहा था। कुछ बात होती तो फोन करके पूछ भी लेता।
नारे लगा-लगाकर शुक्लाजी का गला बैठ गया था। काफी देर हो गयी थी। वे लौटने लगे तो नेताजी ने उन्हें परे ले जाकर कहा, “यहाँ जन्तर-मन्तर पर तो धरना चल रहा है। कल ऐसा करते हैं तुम्हारी कॉलोनी गगन विहार में भी हंगामा करवा देते हैं। तुम ऐसा करना एक बाँस-फूस का पुतला बना लेना। कल तुम्हारे गगन विहार के बड़े पार्क में प्रधानमन्त्री का पुतला फूंक देते हैं। शाम को मैं भी वहाँ आ जाऊँगा। तुम भी कुछ बन्दे इकट्ठे कर लेना। मैं भी पार्टी के बन्दों को फोन कर दूँगा। टी.वी. वालों को भी बुला लेंगे। तुम पुतला तैयार रखना।”
घर पहुँचे तो पता चला फैक्ट्री में उनकी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर उनके साले साहब के साहबजादे प्रदीप ने फैक्ट्री में काम करनेवाली लड़की के साथ रेप कर डाला है।
पुलिस प्रदीप को पकड़कर ले गयी है। उनका दिल धड़ककर रह गया, “साले साहब को पता चलेगा तो क्या कहेंगे? आपके होते लड़का थाने में बन्द हो गया? आपका रसूख? आपका दबदबा कहाँ गया?”
बुरी तरह घबरा रही अपनी बीवी को उन्होंने दिलासा दी, “सब निबट जायेगा। वर्माजी के होते हमें किस बात की चिन्ता? मेरे बचपन के दोस्त हैं। क्लासफेलो रहे हैं। उन्हीं के कहने पर काम-धाम छोड़कर धरना-प्रदर्शन में लगा हुआ हूँ। वर्माजी पहले खुद सरकार में थे। अब फिर जीतकर मुख्यमन्त्री बनने के चांस हैं! निश्चिन्त रहो, मैं अभी जाकर उसे ले आता हूँ। इसमें मेरी भी इज्जत का सवाल है। अरे! अपना लक्की कहाँ है, दिखाई नहीं दे रहा?”
धीरे से कहा पत्नी ने, “शाम से होंडा सिटी लेकर निकला हुआ है। आपने ही सुबह उसे गाड़ी की चाबी दी थी। बिगाड़ रहे हैं आप लड़के को। किसी दिन कोई वारदात कर बैठेगा? देख लेना...? इस तरह की आवारागर्दी ठीक नहीं।”
ठहठहाकर हँस पड़े शुक्लाजी, “यही उम्र है। इस उम्र में मस्ती नहीं करेगा तो कब करेगा? हा हा हा...कर लेने दो मजे। वक्त आने पर अपने-आप अक्ल आ जायेगी। और टीना कहाँ है?”
“कहकर तो गयी है कि मौसाजी के यहाँ जा रही हूँ।”
“जाने ही क्यों दिया? लड़की की जात है, पता है जमाना कितना खराब है? रोज तो ऐसी-ऐसी शर्मनाक वारदातें हो रही हैं।”
एकदम पत्नी को अपनी ओर घूरते हुए पाकर वे हड़बड़ा गये। फुसफुसी आवाज में बोले, “तुम्हें रोकना चाहिए था उसे।”
“रोका था मैंने। बोली, भइया को तो आप लोग रोकते-टोकते नहीं हो तो मुझे कैसे रोक सकते हैं?”
“अच्छा, उसे मैं समझाऊँगा! अभी थाने चलता हूँ।”
थाने पहुँचकर वहाँ खाकी वर्दी देखकर उनका दिल धड़कने लगा। गला सूखने लगा।
थोड़ा हिम्मत करके वे थाना-प्रमुख अभयसिंह को मिले। मिनमिनाए, “साहब, नासमझ है गलती कर बैठा है।”
“गलती नहीं। इस लड़के ने क्राइम किया है और देख रहे हैं पुलिस की पहले ही कितनी किरकिरी हो रही है।” अभयसिंह की कड़क आवाज ने उनका रहा-सहा हौसला भी पस्त कर दिया। अटकते-अटकते किसी तरह उन्होंने अपना परिचय दिया कि वे नेता रामस्वरूप वर्माजी के खास आदमी हैं। मेहरबानी करके वे उनके साले साहब के लड़के को छोड़ दें। मामला रफा-दफा कर दें।
“जन्तर-मन्तर और इण्डिया गेट पर क्या हो रहा है? एक तरफ पुलिस की टोपी उछाल रहे हैं दूसरी तरफ पैरों पर गिर रहे हैं? पुलिस कुछ करती नहीं? करती है तो गिड़गिड़ा रहे हैं, कुछ न करो...”
घबरा गये वे, “नहीं नहीं...मैं तो नहीं था...जन्तर-मन्तर, इण्डिया गेट मैं तो गया ही नहीं...!”
घूरकर देखा थाना-प्रमुख अभयसिंह ने। सिटपिटा गये वे। अपने चेहरे पर हाथ फेरने लगे जैसे थाना-प्रमुख को उनकी दाढ़ी में तिनका नजर आ गया हो? जैसे वे अपराध करते हुए रँगे हाथों पकड़े गये हों!
“आपसे मेरा मतलब है, आप जैसे...वो जो धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं कौन हैं वे? कहाँ से आये हैं वे? कहीं से टपके तो हैं नहीं? हम-आपमें से ही तो हैं।”
जान-में-जान आयी शुक्लाजी की। साँस लौट आयी जैसे।
एकाएक उन्होंने थाना-प्रमुख के आगे नोटों की पेशकश कर दी और गिड़गिड़ाए, “सबकुछ आपके हाथ में है साहब! मेहरबानी करें। साले साहब का लड़का है। इज्जत का सवाल है।”
थाना-प्रमुख लालच में नहीं आया। साफ मना करते हुए उन्होंने कहा, “कार्यवाही तो होगी।”
थाना-प्रमुख के कक्ष से बाहर आकर शुक्लाजीने इधर-उधर फोन मिलाने शुरू कर दिये। थोड़ी देर में ऊपर से फोन आने लगे थे। थाना-प्रमुख ने फोन ही अटैंड नहीं किया। अन्य खाकी वर्दी फोन उठाती और कह देती, “साहब मौका-ए-मुआयना के लिए बाहर गये हुए हैं। अपना मोबाइल भी यहीं छोड़ गये हैं।”
कुछ देर बाद खाकी वर्दी ने उन्हें कहा, “अब आप जाओ। सुबह देखेंगे कि कुछ हो सकता है या नहीं। अगर पीड़िता के पक्षवाले न माने या मामला मीडिया में आ गया तो फिर तो कुछ नहीं हो सकता। आखिर मीडिया में बात नहीं गयी तो फिर देखेंगे कि क्या हो सकता है।”
थोड़ी दबी जुबान में वही पुलिसिया बोला, “एक तो हमारे ये प्रमुख साहब इतने कड़क हैं कि क्या करें? दरअसल हर मामले में पीड़िता इन्हें अपनी बहन-बेटी लगती है। कहते हैं जो फर्ज एक भाई का होता है वही पुलिसवाले का फर्ज होना चाहिए।"
मन-ही-मन शुक्लाजी ने कितनी ही गालियाँ दे डालीं—साला ऐसा सनकी मुझे ही टकराना था?
नेताजी के फोन का तो स्विच ही बन्द था। निराश और मायूस होकर उन्हें लौटना पड़ा। पत्नी उनकी प्रतीक्षा में बैठी थी। लक्की लौट आया था। उनके दिमाग में कोई हल्का-सा विस्फोट हुआ—क्या पता—कहीं किसी के साथ कोई रेप-वेप या वारदात करके लौटा हो! ऐसे ही लड़के तो ऐसी हरकतें करते हैं। सोचते हैं, क्या है मामूली बात है...करके निकल लेंगे। ज्यादातर तो वारदातें ढकी-छिपी ही रहती हैं। बाद में पता चलता है कि कितना बड़ा गुनाह कर चुके हैं?
ऐसा कुछ कर आया होगा तो अभी आती होगी पुलिस। पुलिस भी इतनी सख्त हो गयी है। पुलिस सख्ती करे इसीलिए तो हम लोग धरना-प्रदर्शन में लगे हुए हैं। पत्नी ने बताया, “टीना अभी नहीं लौटी है। उसके मौसाजी का फोन आया था टीना दो दिन उनके घर रहेगी। दो दिन की छुट्टी भी हैं। वे आग्रह करने लगे—दो दिन यहाँ रहेगी तो मन बदल जायेगा।”
एकदम बिगड़ उठे शुक्लाजी, “क्या जरूरत थी। मौसा-फौसा के घर जाने देने की? देख रही हो? जमाना कितना खराब है? कहीं भी तो बच्चियाँ महफूज नहीं हैं? मौसा-फौसा, अंकल-फंकल सब साले तो हैवान हुए पड़े हैं? कुत्ते-बिल्लियों से बदतर हो गया है समाज...।”
“तो सरकार और पुलिस इसमें क्या करे? बच्चियाँ अपने घरों में अपने बापों से सुरक्षित नहीं हैं। अपने अन्दर भी तो झाँकें लोग। अपने-आपको, अपने घर को तो खुद ही सम्भालना पड़ेगा।”
सुबह होते ही वर्माजी का फोन आ गया। उनके कुछ कहने से पहले ही शुक्लाजी ने उन्हें प्रदीपवाले मामले की पूरी बात कह सुनाई। नेताजी थोड़ा खीझे फिर थोड़ा हँसे, “इस लड़के ने भी अभी पंगा करना था? खैर...तुम दस बजे थाने पहुँच जाना मैं थाना-प्रमुख को फोन करता हूँ। जैसे भी होगा, बेफिक्र रहो। काम हो जायेगा। और हाँ, मैंने वो प्रधानमन्त्री का पुतला बनाने के लिए कहा था...याद है न? ठीक है? अरे जैसा भी बन जाये। अड़ा-जुड़ा टेढ़ा-मेढ़ा...बस आदमी के ढाँचे जैसा होना चाहिए। नाम ही तो करना है? प्रतीकात्मक ही...शिल्पकारी थोड़ा दिखानी है?”
“ठीक है, मैं काम-चलाऊँ पुतला बनवा दूँगा।”
“हाँ-हाँ बस...तो ठीक है। शाम को तुम्हारी कॉलोनी गगन विहार के बड़ेवाले पार्क में...।”
फोन पर हुई वर्माजी से पूरी बात उन्होंने पत्नी को बता दी। नाश्ता-वाश्ता करके वो थाने जाने के लिए निकलने लगे तो अपनी पत्नी से बोले, “अरे नेताजी ने पुतला बनाने का काम मेरे जिम्मे लगाया है। तुम ऐसा करना—दो बाँस लेकर उन्हें क्रॉस की तरह सुतली से बाँध लेना। उन पर पुराने-धुराने कपड़े लपेटकर धड़ और टाँग, बाँहें बना लेना।”
“मुझसे तो भई बनेगा नहीं...मैंने तो कभी बनाया नहीं...मैं कैसे?”
“कुछ काम होना भी है तुमसे...।”
उनके घर में साफ-सफाई का काम करनेवाली परबतिया कुछ बोलने लगी। शुक्लाजी ने पूछा, “क्या बात है?”
“मालिक! बचपन में हम तो हर साल रावण का पुतला बनाते थे। पुराने-धुराने कपड़े, फटी-पुरानी बोरियाँ, बाँस और सुतली मिल जाये तो मैं ही बना दूँ।”
“अच्छा फिर तो समस्या हल हो गयी, तुम बना देना।”
पत्नी से उसे सामान वगैरह उपलब्ध कराने के लिए कहकर वे थाने की ओर चल दिये।
उन्होंने फिर से थाना-प्रमुख से मिलने की कोशिश की। थाना-प्रमुख उनसे मिलने को तैयार नहीं हुआ।
काफी देर तक थाने की बेंच पर बैठकर वर्माजी के फोन की प्रतीक्षा करते रहे। फिर खुद ही वर्माजी को फोन करके याद दिलाया। थोड़ी ही देर में वर्माजी का फोन थाना-प्रमुख को आ गया, “अरे! वो अपना ही बच्चा है जाने दो।”
“सर, कैसे जाने दूँ...बच्चा है तो उसने बड़ों जैसा क्राइम कैसे कर लिया है?”
“अरे वो तो है पर...देखो कानून समाज के लिए होता है न कि समाज कानून के लिए? है न? आदमी-आदमी को भी तो देखना पड़ता है। अपने-पराए का फर्क भी तो कुछ होता है?”
“अगर आज मैं इसको छोड़ देता हूँ और कल को आपकी बेटी के साथ कुछ हो जाता है? तब भी आप यही सब कहेंगे?”
वर्माजी के आग लग गयी, “साले सनकी, क्रैक तुझे देख...।”
फोन काट दिया थाना-प्रमुख ने।
दाल गलती न देखकर शुक्लाजी ने सोचा, साले साहब को फोन करके मामले की जानकारी दे देनी चाहिए। अपराध तो प्रदीप ने किया ही है। अब भुगते!
जिसके साथ रेप हुआ अब तक तो शुक्लाजी ने उनके परिजनों से मिलने की जरूरत तक नहीं समझी थी, पर उन्हें लगा कि उनसे मिले बिना वे कुछ नहीं कर सकते। पैसा अपरोच कुछ काम नहीं आ रही। पर उनसे मिलने जाने की उनकी हिम्मत नहीं हो रही थी।
उन्हें अकेला लौटा हुआ देखकर पत्नी का चेहरा भी लटक गया, “नहीं छोड़ा पुलिस ने प्रदीप को? मैंने तो सुबह ही भैया को फोन कर दिया था। कानपुर से यहाँ के लिए चल पड़े हैं। पहुँचनेवाले होंगे।”
शुक्लाजी का चेहरा फटे जूते-सा लटक गया, जैसे जूतों से पिट गये हों! पहले उन्हें अपने-आपको, अपने घर को सम्भालना चाहिए था। बाद में धरना-प्रदर्शन...।
कुछ देर यों ही खड़े सोचते रहे फिर एकाएक पत्नी से पूछा, “अरे हाँ, वो पुतला बना दिया?”
“हाँ, अन्दरवाले कमरे में पड़ा है। आओ दिखाती हूँ।”
पुतले को देखकर काँपकर रह गये शुक्लाजी; उन्हीं की कद-काठी का एक पुतला। दीवार के सहारे खड़ा था। एकदम शुक्लाजी का डुप्लीकेट।
पत्नी उनके चेहरे पर की उड़ती हुई हवाइयों को घूर रही थी। वे अन्दर-ही-अन्दर डरने लगे। कहीं परबतिया ने पत्नी को बता तो नहीं दिया। पत्नी जब मायके गयी हुई थी। उसकी अनुपस्थिति में उन्होंने परबतिया की विवशता का लाभ उठाया था और इससे पहले जो नौकरानी थी, उसका भी...
पत्नी बता रही थी...परबतिया ने बाँसों का ढाँचा बनाकर उस पर फटे-पुराने कपड़े लपेट-लपेटकर पुतले को आदमी जैसा बनाया, फिर शुक्लाजी की पुरानी-धुरानी पैंट-कमीज पहना दी। एक पुरानी फुटबॉल को लेकर सिरवाली जगह पर रखकर उसे धड़ से सी दिया। फिर छोटे-छोटे काले धागे सिर पर बालों की जगह फेवीकोल के साथ चिपका दिये। उन्हीं की तरह का हेयर स्टाइल बना दिया। फिर बच्चों की ड्राइंगवाले ऑयल पेंट लेकर मुँह पर ब्राउन पेंट लगा दिया और आँख-नाक बना दिये और उन्हीं की तरह मूँछें बना दीं। और तो और एक बेकार पड़ा उन्हीं का पुराना चश्मा भी लगा दिया।
पत्नी हँसी, “आपका का ही पुतला लग रहा है। बिलकुल। मैंने परबतिया से कहा भी यह क्या किया, तूने तो हू-ब-हू शुक्लाजी का पुतला बना दिया प्रधानमन्त्री का पुतला बनाना था। वह बोली—क्यों? ये पुलिसवाले या मन्त्री-वन्त्री सब तो समाज में से, हमारे-आपके बीच में से ही तो आते हैं। पहले अपने अन्दर झाँक भी तो लेना चाहिए। दूसरों की ओर कोई एक अँगुली उठाता है तो अपनी चार अँगुलियाँ अपनी ओर ही मुड़ जाती हैं।”
शुक्लाजी को काटो तो खून नहीं। उन्हें लग रहा था दाढ़ी से निकल-निकलकर तिनके उनके गिरेबान में भर गये हैं। बुराई का पुतला तो वे खुद हैं। उन्हें लगा वे आग की लपटों से घिर गये हैं!