4: लक्ष्य: कहीं पहुँचना या सब कुछ छोड़ना?
जिसे तुम 'लक्ष्य' कहते हो, वो बस मन का एक नया ठिकाना है,
अधूरेपन से भागने का, एक नया और सुंदर बहाना है।
तुमने सोचा कि मिल गया पद, पैसा और जग में सम्मान,
तो पूरा हो गया जीवन तुम्हारा, और मिल गया तुम्हें निर्वाण?
नहीं! जिसे तुम जीत समझते हो, वो बस अहंकार की एक नई ऊँचाई है,
सत्य की राह पर ये तरक्की नहीं, बल्कि रूह की गहरी खाई है।
पशु भी पेट भरता है, और सुरक्षा में ही सो जाता है,
अगर तुमने भी बस यही किया, तो तेरा जन्म व्यर्थ हो जाता है।
जीवन का लक्ष्य कोई 'चीज़' नहीं, जिसे तुम मुट्ठी में भर लोगे,
वो तो वो आग है, जिसमें तुम खुद को ही भस्म कर दोगे।
वो मंज़िल नहीं जहाँ जाना है, वो तो वो बंधन है जिसे तोड़ना है,
हर उस झूठी पहचान से, अपना नाता पूरी तरह मोड़ना है।
तुम यहाँ इसलिए नहीं हो कि दुनिया को मुट्ठी में कर सको,
तुम यहाँ इसलिए हो कि जीते जी, अपने 'झूठे मैं' को मार सको।
लक्ष्य तो वो है, जो तुम्हें तुम्हारे 'स्व' के करीब खड़ा कर दे,
जो तुम्हें इस संसार की भीड़ में भी, बिल्कुल 'अकेला' कर दे।
सत्य को पाना लक्ष्य नहीं, सत्य में मिट जाना ही उपलब्धि है,
बाकी जो कुछ भी सिखाया गया, वो बस शब्दों की एक रद्दी है।
आराम को लक्ष्य मत बनाओ, वो तो मुर्दों की निशानी है,
तड़प और बोध की अग्नि ही, असली जीवन की कहानी है।
जिस दिन तुम्हें किसी लक्ष्य की, कोई ज़रूरत नहीं बचेगी,
उसी दिन समझना कि तुम्हारी, असली यात्रा शुरू होगी।
न भविष्य का कोई लालच हो, न अतीत का कोई बोझ रहे,
वही जीवन सफल है साहिब, जिसमें हर पल 'सत्य' की खोज रहे।
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5: लिबास या नकाब?
तुमने कपड़ों को अपनी पहचान बना लिया,
रेशम और मलमल में, अपनी रूह को दफना लिया।
महँगे ब्रांड्स पहन कर, तुम खुद को ऊँचा समझते हो,
पर भीतर के खालीपन को, तुम धागों से क्यों ढंकते हो?
कभी कपड़े की लंबाई नापी, कभी रंग का ढोंग रचाया,
पर मन की नग्नता को, तुमने कभी देख न पाया।
तन को तो साफ़ रखा, पर नीयत में धूल जमी है,
वस्त्रों की चमक तो है, पर विवेक की भारी कमी है।
जिसे तुम 'सभ्यता' कहते हो, वो बस एक पर्दा है,
भीतर जो बैठा जानवर है, वो तो अब भी ज़िंदा है।
सफ़ेद चोला पहन कर, तुम संत होने का भ्रम पालते हो,
पर ईर्ष्या और क्रोध की आग, तुम भीतर ही ढालते हो।
एक स्त्री के चरित्र को, तुमने उसके आँचल से तौला,
पर अपनी दूषित दृष्टि पर, कभी एक शब्द न बोला।
कपड़ा शरीर को ढंकता है, पर सच्चाई को नहीं,
जो रूह को न देख सका, उसकी आँखों में दृष्टि ही नहीं।
असली वस्त्र तो 'ज्ञान' है, जो अज्ञान की नग्नता मिटा दे,
जो 'मैं' के इस झूठे श्रृंगार को, मिट्टी में मिला दे।
वो लिबास पहन, जो कभी पुराना न हो पाए,
जो मौत की आंधी में भी, तेरे साथ ही चला जाए।
बाहर का ये दिखावा, बस मिटने वाली कहानी है,
सत्य का नग्न होना ही, असली ज़िन्दगानी है।
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6: असली विकास: विनाश या विस्तार?
जिसे तुम 'विकास' कहते हो, वो विनाश की बस एक चाल है,
बाहर तुमने महल खड़े किए, पर भीतर बुना एक जाल है।
गाड़ियाँ बढ़ीं, रफ़्तार बढ़ी, पर सुकून कहीं खो गया,
इंसान चाँद पर जा पहुँचा, पर ज़मीन पर ही सो गया।
नदियाँ सुखा दीं तुमने, और पहाड़ों को भी चीर दिया,
तरक्की के इस नशे में, तुमने ज़हर हवा में घोल दिया।
अगर शुद्ध हवा और पानी न बचे, तो ये पैसा क्या काम आएगा?
ये लोहे और सीमेंट का जंगल, तुझे ही एक दिन खा जाएगा।
पशु तड़प रहा थाली में, और तुम कहते हो हम 'सभ्य' हुए?
अंधे लालच की भट्टी में, तुम इंसानियत से दूर हुए।
असली विकास वो नहीं, जो बाज़ारों को बढ़ाता है,
असली विकास वो है, जो इंसान को 'इंसान' बनाता है।
क्या तुम्हारी करुणा बढ़ी? क्या तुम्हारा विवेक जागा?
या तुम और भी तेज़ी से, अपने अहंकार के पीछे भागा?
जिस दिन तुम खुद को जान लो, उस दिन असली तरक्की होगी,
वरना ये मशीनी दुनिया, बस बीमारियों की एक बग्गी होगी।
विकास का अर्थ है—सत्य की ओर एक कदम बढ़ाना,
अपनी पशुवत वृत्तियों से, खुद को आज़ाद कर पाना।
मिट्टी, पानी और जीव का, जो सम्मान न कर सके,
वो विकास नहीं वो पतन है, चाहे तुम आसमान को छू सको।
जब तक तुम धागों में उलझे हो, तब तक तुम गुलाम हो,
जिस दिन खुद को जान लिया, उस दिन तुम 'आत्माराम' हो।
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