Mamta - 3 in Hindi Women Focused by kalpita books and stories PDF | ममता ...एक अनुभूति... - 3

The Author
Featured Books
Categories
Share

ममता ...एक अनुभूति... - 3

केशव वैसे ही अपनी परेशानी से जूझ रहा था उस पर यह लड़की उसकी समझ से बाहर थी।
दिल तो भावनात्मक रूप से लड़की और बच्चे के साथ जुड़ रहा था पर दिमाग साथ देने से मना कर रहा था।
दरभंगा स्टेशन आते ही भीड़ अपने अपने गंतव्य की और जाने के लिए ट्रेन से उतरने लगी।
उसने खिड़की की तरफ देखती लड़की पर हल्की नजर डाली पर बच्चे को देखने की हिम्मत नहीं की...
आखिर दिमाग की जीत हुई ...
वो बिना बोले चुपचाप बैग उठा कर स्टेशन से नीचे उतर गया।
आंखों के आगे बच्चा घूम रहा था पर वो कोई मुश्किल में नहीं पड़ना चाहता था।धीरे-धीरे चल रहा था,

केशव का दिल धक से रह गया।
उसे महसूस हो रहा था कि लड़की की परछाई उसके पीछे-पीछे है।

"ये कहाँ तक आएगी?" — केशव ने मन ही मन सोचा।
भीड़भाड़ वाला दरभंगा स्टेशन, लोगों का शोर, कुलियों की आवाज़ें, चाय और समोसे की महक…पर केशव को सिर्फ़ अपने पीछे आती लड़की की आहट सुनाई दे रही थी।

उसने कदम तेज़ कर दिए।
लड़की ने भी।
वो रुका।
लड़की भी रुक गयी।

अब केशव का दिमाग़ सच में सुन्न पड़ गया।
क्या ये संयोग था? या कोई इरादा?

लड़की की गोद में बच्चा धीरे-धीरे रोने लगा। वो उसे थपक कर चुप कराने लगी, और उसी पल उसकी आँखें केशव से मिलीं।

उन आँखों में एक अजीब सी विनती थी — जैसे कहना चाहती हों,
"मुझे अकेला मत छोड़ना…।"

केशव समझ नहीं पा रहा था कि आगे क्या करे —
क्या वो पूछे कि "तुम मेरे पीछे क्यों आ रही हो?"
या फिर चुपचाप अपना रास्ता बदल ले?

केशव के पैरों में जैसे किसी ने बेड़ी डाल दी।
उसने लड़की की आंखों में झाँका— वहाँ डर, बेबसी और कहीं गहरी थकान छिपी हुई थी।

“मुझे कुछ दिन अपने साथ रख लो…वरना वो मेरा बच्चा ले जाएँगे।”
लड़की की आवाज़ इतनी धीमी थी मानो गले में ही अटक गई हो।

केशव का दिल दहल गया।
“कौन ले जाएंगे?” उसने सहमते हुए पूछा।

लड़की ने होंठ भींच लिए। आँखों से आँसू बह निकले।
“पहले कहीं ले चलो…भीड़ में कह नहीं सकती। तुम पर विश्वास करने का मन है।”

केशव ने सिर झुका लिया।
उसका दिमाग़ कह रहा था “मत फँस, यह मुसीबत है…”
लेकिन दिल कह रहा था “यह औरत सचमुच लाचार है, मदद करो।”

वो वैसे ही नौकरी छोड़कर अपने गाँव आया था, खाली हाथ, उलझनों से भरा।
और अब सामने यह अनजान औरत, बच्चा लिए खड़ी थी…

“अच्छा, चलो।”
केशव ने भारी आवाज़ में कहा।

लड़की ने राहत की साँस ली और उसके कदमों से कदम मिलाने लगी।

स्टेशन से बाहर निकलते हुए, केशव ने सोचा —
"अब यह कहानी कहाँ ले जाएगी?"

केशव के मन में डर और उलझन दोनों थीं।
घर ले जाना ठीक नहीं लगा, क्योंकि मां को कुछ समझाने के लिए खुद का समझना जरूरी है इसलिए वह लड़की को अपने दोस्त के लॉज पर ले आया। वहाँ का सन्नाटा और चारदीवारी पाकर लड़की ने पहली बार कुछ राहत की साँस ली।

थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने अपनी कहानी बतानी शुरू की—

“मैं उत्तराखंड की रहने वाली हूँ। घर की हालत कमजोर थी, तो पापा के दोस्त ने कहा कि वो मुझे नौकरी दिला देंगे। इसी बहाने मैं दिल्ली आ गई और वहाँ एक बड़े इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट बिज़नेस करने वाले राज ठाकुर के ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी मिल गई।

शुरुआत में सब कुछ सामान्य था, लेकिन धीरे-धीरे वो मेरे करीब आने लगे। मीठी बातें, देखभाल…फिर शादी का वादा किया। मैंने भरोसा कर लिया और रिश्ते भी बन गए।

लेकिन…एक दिन जब मुझे पता चला कि मैं माँ बनने वाली हूँ, तब सब बदल गया।”

इतना कहते-कहते लड़की की आवाज़ भर्रा गई। उसने अपने बच्चे को सीने से चिपका लिया और रो पड़ी।

लड़की की आँखें भर आईं। उसने कांपती आवाज़ में कहा—

“राज ने मुस्कुराते हुए कहा कि आज से तुम मेरी ज़िंदगी का हिस्सा हो…चलो तुम्हें अपने घर वालों से मिलवाता हूँ। मैं भी खुशी-खुशी उसके साथ चल पड़ी। रास्ते भर मैं सपने बुनती रही—सोचा अब मेरा घर होगा, नाम होगा, इज़्ज़त होगी।”

वो गहरी साँस लेकर थोड़ी देर चुप रही। केशव बेसब्री से पूछ बैठा—
“तो फिर…तुम्हारा स्वागत किसने किया?”

लड़की की आँखों से आँसू टपक पड़े।
“उसके घर पर मेरी आरती उतारने कोई नहीं आया…बल्कि दरवाज़े पर ही मुझे एक औरत मिली।
"कौन ? उनकी मां " केशव ने पूछा 
"नहीं  —उसकी पत्नी।” लड़की ने गहरी सांस ले कर कहा।

केशव का दिल धक से रह गया।
“पत्नी?” उसने अविश्वास से दोहराया
लड़की की आँखें शून्य में टिक गईं, मानो उस पल को फिर जी रही हो।

“मेरे पाँव तले से ज़मीन खिसक गई थी…राज की पत्नी सामने खड़ी थी। ऊँची, लंबी, बेहद ख़ूबसूरत और आत्मविश्वास से भरी हुई। मैं काँप रही थी, पर वो मुस्कुराई…और अचानक मुझे गले से लगा लिया।

उसकी आँखों में न गुस्सा था, न जलन—बल्कि अजीब-सी खुशी।
वो बोली— ‘अच्छा हुआ तुम आईं…मैं कब से चाह रही थी तुमसे मिलने को।’

मैं हैरान रह गई।
उसकी आवाज़ में नफरत की एक बूंद भी नहीं थी।
मैं सोच रही थी— “ये कैसी औरत है? अपनी सौतन को देख कर कैसे खुश हो सकती है?”

मेरा दिमाग सुन्न हो गया। दिल धड़क रहा था कि कहीं वो मुझे अपमानित न कर दे…पर उसके चेहरे पर तो एक रहस्यमयी संतोष झलक रहा था।

केशव हैरानी से सब सुन रहा था। उसने हिचकते हुए पूछा—
“उसने ऐसा क्यों कहा? क्या वजह थी उसकी खुशी की?”

लड़की ने होंठ भींच लिए, आँसू रोकने की कोशिश करते हुए बोली—
“यही तो राज़ है…जिसने मेरी पूरी ज़िंदगी बदल दी।”

...........to be continued