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मैं हमेशा देर कर देती हूं लोगों को पढ़ने इरादे समझने झूठ की परतें हटाने और सच को जगह दिलाने में छल करते ज़हर घोलते कपट दिखाते सच छुपाते चेहरों को पहचानने में मैं हमेशा देर कर देती हूं खुद को रिझाने दिल को समझाने खामोशी ओढ़ने आँसुओं को रोकने टूट कर संभलने खोखली यादें मिटाने और खुद से नज़रें मिलाने में
एक अंधेरे कमरे में खड़ी थी। बहुत अंधेरा...इतना कि रोशनी की कोई गुंजाइश नहीं थी। मैं थी और मेरी एक उम्मीद थी। मैं उस उम्मीद के साथ उस अंधेरे कमरे में सांस ले पा रही थी। कभी कभी किसी खिड़की से कोई रोशनी आती तो मैं मजबूती से उस खिड़की को बंद कर देती। संभवतः अब मुझे अंधेरा पसंद आने लगा था सब कुछ ठीक था। फिर एक दिन कुछ हुआ बाहर शायद तूफान था या अतिवृष्टि मेरी उम्मीद को अपने साथ बहा ले गया। अब मुझे वहां घुटन हो रही थी। बहुत घुटन... मैं खड़ी ये सोच रही थी कि इस सब का जिम्मेदार कौन था? वो लोग जिन्होंने मुझे उस अंधेरे कमरे में धकेला या फिर वो मैं खुद जो सब कुछ जानते हुए खुद के साथ छल करती रही। पर जो भी हो सबसे ज्यादा आहत और छली तो बस मैं ही गई थी
Dear girls, जब तुम माँ बन जाओ, तो अपने बेटों को सिखाना औरत का सम्मान कैसे किया जाता है। सिखाना— कैसे उसके नियमित कामों की कद्र की जाए, कैसे “ये तो उसका काम है” जैसी सोच को खत्म किया जाए। उन्हें ये भी सिखाना कि औरत महज़ एक वस्तु नहीं होती, वो भी उतनी ही इंसान है जितना वो खुद हैं। सिखाना— औरतों के काम में हाथ बँटाना, और उससे भी ज़्यादा उसके काम को समझना। सिखाना— ना का मतलब ना होता है, और खामोशी हमेशा हाँ नहीं होती। सिखाना— आवाज़ ऊँची करने से कोई बड़ा नहीं हो जाता, और सम्मान माँगना नहीं, देना सीखा जाता है। क्योंकि कल वही बेटे किसी की दुनिया होंगे… और ये तुम पर है कि वो दुनिया बनें— या किसी की दुनिया उजाड़ दें।
हत्या करना तो पाप है न चाहे वो किसी की भावनाओं की हो या फिर संवेदनाओं की किसी के भरोसे की हो, उसके यकीन की किसी के सपनों की हो, उसके अपनेपन की किसी के सुकून की हो, उसकी मुस्कान की किसी की नींदों की हो, उसके ख्वाबों की किसी की रूह की हो, उसके अहसासों की किसी के कल की हो, उसके हर आज की किसी के हौसले की हो, उसके इरादों की किसी की पहचान की हो, उसके वजूद की किसी के प्रेम की हो, या उसकी आजीवन प्रतीक्षा की
कभी मात्र एक व्यक्ति के चले जाने से ही कुछ लोग उन्मत्त हो उठते हैं, और उन्हीं सरफिरे उन्मादों को दुनिया कवि, शायर और काव्य-प्रणेता कहती है। कभी कोई विरह शब्दों में आकार ले लेता है, कभी कोई निःशब्दता ग़ज़ल बनकर बह उठती है। जो अश्रु बहा नहीं पाते, वे अक्षरों में ढलने लगते हैं, और जो अक्षरों में ढलते हैं वो कालातीत हो जाते हैं। हर वेदना की कोख से एक कविता जन्म लेती है, हर विखंडन में कोई रचना सुसज्जित हो उठती है। वो जो किसी हृदय का बिखराव था, वही सृजन का प्रथम स्पंदन बन जाता है। — ArUu ✍️
मैं लिखती हूँ— लिखती हूँ क्योंकि कुछ लफ़्ज़ मुझे बहुत पसंद हैं, और कुछ लफ़्ज़ों को मैं बहुत पसंद हूँ। खामोशी में वो मेरे हमदर्द बन जाते हैं, उदास हूँ तो मेरी आँखों से बह जाते हैं। उमंग में मेरी हँसी से लिपट जाते हैं, कोई याद आए तो कोरी आँखों में सिमट जाते हैं। कभी तन्हाई घिर आए तो चुपचाप मेरे पास बैठ जाते हैं, जहाँ मैं खुद से हार जाऊँ वहीं मुझे थाम जाते हैं। और सच कहूँ, मैं लिखती नहीं हमेशा, कभी-कभी ये लफ़्ज़ ही मुझे लिख जाते हैं।
मेरे हाथ में एक कटोरा था... चांदी का सोने का या लोहे का नहीं याद पर था। कुछ ख्वाब थे जिन्हें उसमें डाल रखा था मैंने। हवा तेज होती तो वो ख्वाब उड़ने लगते, कभी एक गया दूसरा गया , जाता रहा मैं बस उन ख्वाबों को जाते हुए निहारती रही। कभी झुक के उस कटोरे की तरफ नहीं देखा। अंत में जब देखा तो वो खाली था। कटोरा सोने का था। पर मेरे बेशकीमती ख्वाब वो संभाल नहीं पाया❤️
मेरे अंतर्मन की गहराइयों से मैं ये प्रार्थना करती हूं की मुझे नुकसान पहुंचाने वाले हृदयों की आत्मा की अंतिम आह भी बस मेरे हृदय से क्षमा मांगे
कुछ अर्ज़ है किताबी, कुछ फ़र्ज़ है ज़िंदगी, चेहरा बदलती रहती है, पर मर्ज़ है ये ज़िंदगी।। कभी हँसी के पीछे सिसकती, कभी खामोशी में चीखती है, भीड़ में भी तन्हा कर दे, अजीब-सी साज़िश है ये ज़िंदगी।। ना मुकम्मल कोई दास्तां, ना पूरा कोई सफ़र मिला, हर रिश्ते के टूटने का, बस एक इकरार है ज़िंदगी।। नींदों से भी रिश्ता टूटा, ख़्वाबों ने भी साथ छोड़ा, आँखों के हर सूखे कोने में, जमा एक दरिया है ज़िंदगी।। कभी आईनों में खुद को ढूँढती, कभी अपनी ही नज़रों से गिरती, हर रोज़ नया चेहरा ओढ़े, एक बेवफ़ा किरदार है ज़िंदगी।। कभी वक़्त के हाथों बिकती, कभी किस्मत से हारती हुई, हर साँस पे बोझ रखे, एक ख़ामोश उधार है ज़िंदगी।। ArUu ✍️ कभी अपने ही ज़ख्म कुरेदे, खुद पे ही वार है ये ज़िंदगी।।
Dear parents, आपके अपने कर्म ही आपकी वास्तविक पहचान और सम्मान तय करते हैं। इसे अपनी संतान के व्यवहार पर निर्भर मत कीजिए। हर बार बच्चों की गलतियों को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ देना ना उनके लिए उचित है, ना आपके लिए। संतान आपकी हो सकती है, पर उसके विचार, उसके निर्णय और उसके कर्म उसके अपने होते हैं। उन्हें अपनी छवि का विस्तार बनाकर आप उनके अस्तित्व को सीमित कर देते हैं। संस्कार देना आपका दायित्व है, पर हर परिणाम को अपने नाम से जोड़ लेना एक अनावश्यक आग्रह है। सम्मान विरासत में नहीं चलता, वह प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण से अर्जित करता है। इसलिए बेहतर यही है कि आप अपने कर्मों पर ध्यान दें, और उन्हें उनके हिस्से का जीवन सम्मान के साथ जीने दें।
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