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ArUu

ArUu Matrubharti Verified

@aruuprajapat6784
(1.5m)

जो नदी कल-कल करके बहती थी,
वो आज सूखी पड़ी है।

वक्त का स्वभाव ही परिवर्तन है,
यहाँ कुछ भी सदा एक-सा नहीं रहता।
सुख और दुःख भी जीवन की दो ऋतुएँ हैं
एक आती है, तो दूसरी के लिए राह छोड़ जाती है।

इसलिए दुःख से घबराना कैसा,
जो आज है, वह कल नहीं रहेगा।
और यदि आज जीवन सूना-सा लगता है,
तो विश्वास रखो
समय की धारा फिर किसी मोड़ पर
खुशियों को साथ लेकर लौटेगी।
ArUu ✍️

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और जब सफल हो जाऊँगी,
तो सबको बताऊँगी कहानी अपनी
कुछ अच्छी, कुछ कच्ची,
कुछ झूठी, कुछ सच्ची।🫠

कौन साथ रहा,
किसने ताने दिए,
कौन खिलाफ रहा,
किसने सिर्फ
अपने होने के बहाने दिए।😇

कौन बना हमराही,
कौन राहों में काँटे बोता रहा,
कौन मेरे गिरने पर हँसा,
कौन चुपके से हौसला देता रहा।

किस कदर सफ़र कठिन था,
कहाँ किस मोड़ पर दिल ग़मगीन था।
कितनी रातें जागकर काटीं,
कितनी सुबहें ख़ुद से ही लड़ीं।

किसने मेरी ख़ामोशी पढ़ी,
किसने शोर में भी दर्द न जाना,
किसने हाथ पकड़कर चलाया,
किसने बीच सफ़र में साथ छुड़ाया।

और जब सफल हो जाऊँगी,
तो सबको बताऊँगी कहानी अपनी।🙂

बताऊँगी कि मंज़िल यूँ ही नहीं मिली थी,
हर मुस्कान के पीछे एक रात जली थी,
हर जीत के पीछे हारों का सिलसिला था।
मुझे हराने को खड़ा
पूरा काफ़िला था।
ArUu ✍️

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और जब सफल हो जाऊँगी,
तो सबको बताऊँगी कहानी अपनी
कुछ अच्छी, कुछ कच्ची,
कुछ झूठी, कुछ सच्ची।🫠
कौन साथ रहा,
किसने ताने दिए,
कौन खिलाफ रहा,
किसने सिर्फ
अपने होने के बहाने दिए।😇

कौन बना हमराही,
कौन राहों में काँटे बोता रहा,
कौन मेरे गिरने पर हँसा,
कौन चुपके से हौसला देता रहा।

किस कदर सफ़र कठिन था,
कहाँ किस मोड़ पर दिल ग़मगीन था।
कितनी रातें जागकर काटीं,
कितनी सुबहें ख़ुद से ही लड़ीं।

किसने मेरी ख़ामोशी पढ़ी,
किसने शोर में भी दर्द न जाना,
किसने हाथ पकड़कर चलाया,
किसने बीच सफ़र में साथ छुड़ाया।

और जब सफल हो जाऊँगी,
तो सबको बताऊँगी कहानी अपनी।🙂
बताऊँगी कि मंज़िल यूँ ही नहीं मिली थी,
हर मुस्कान के पीछे एक रात जली थी,
हर जीत के पीछे हारों का सिलसिला था।
मुझे हराने को खड़ा
पूरा काफ़िला था।
ArUu ✍️

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इन दिनों गुज़रे हालात ने एक बात समझा दी
इस दुनिया में कुछ भी शाश्वत नहीं है,
सिवाय मृत्यु के।

एक दिन पद, प्रतिष्ठा, सत्ता, अहंकार,
ईर्ष्या और वो काम भी यहीं रह जाएगा
जिसे हम पूरी ज़िंदगी समझ बैठे थे।

अंत में साथ जाएंगे तो सिर्फ़ हमारे कर्म
और लोगों के दिलों में छोड़ी हुई हमारी छाप।

इसलिए जब तक जीवन है,
कुछ ऐसा कर जाएँ
जिसे मृत्यु भी हमसे न छीन सके।

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हाँ अगर मैं नहीं लिखती तो मारी जाती
मारी जाती अपने ही शब्दों के बोझ तले
बह जाते आँखों से अनकहे सिलसिले।

अपेक्षाओं आकांक्षाओं की गहरी खाई में
धँस कर मर जाती किसी की परछाई में
संवेदनाओं के ऊंचे पर्वत से
ढह जाती मैं किसी नाचीज़ की करवट से।

रूढ़ियों की खींची सुक्ष्म लकीरों में
बँध जाती मैं अदृश्य जंजीरों में।
अपनी ही खामोशियों के शहर में
खोई मिलती मैं सन्नाटों के कहर में।

सदियों से बंद मन के तहखानों से
डर कर मर जाती मैं रिश्तेदारों के तानो से
रिश्तों और समाज की उलझी गिरह से
टूट कर बिखर जाती मैं उस एक शख्स के विरह से

अंतर्दाह की सिसकती आहो में
हर ख़्वाब को चुपचाप दफ़्नाकर,
भटकती फिरती अजनबी-सी राहों में,
दफ़्न होते कितने ख़्वाब, बंदिशों की पनाहों में।

अपने ही अस्तित्व से बिछड़कर,
बुझते चिराग़-सी अँधेरे में ढलकर,
जिम्मेदारियों के बोझ से लड़कर
कटी पतंग-सी दिशाओं में भटककर,
मारी जाती मैं
मौत से पहले की मौत से डरकर।।
ArUu ✍️

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और बादल मतलब
हमारे सपनों का कैनवास 😍
जहाँ रंग, आकृति और कल्पनाओं की
कोई सीमा नहीं हुआ करती थी।
जहाँ एक सफ़ेद-सा बादल
कभी घोड़ा बन जाता था,
कभी कोई महल,
कभी उड़ता हुआ पंछी,
और कभी हमारी ही कोई अधूरी-सी कहानी।

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और जब नज़र पड़ती है आसमान पर,
तो अनायास ही याद आ जाते हैं बचपन के वो खूबसूरत पल,
जब माँ के बगल में लेटे हुए
बादलों से बनने वाली भिन्न-भिन्न आकृतियों को खोजा करते थे।

जब सहोदरों से इस बात की रेस लगती थी
कि कौन सबसे अच्छी आकृति ढूँढ़ सकता है।
किसी को बादल में हाथी दिखाई देता,
किसी को घोड़ा,
तो कोई उसमें अपना कोई मनपसंद चेहरा खोज लिया करता था।

तब आसमान सिर्फ आसमान नहीं था,
वह हमारी कल्पनाओं की एक खुली किताब था,
जिसके हर पन्ने पर एक नई कहानी होती थी।

न कोई जल्दी थी,
न किसी मंज़िल की चिंता,
बस माँ का साथ था,
भाई-बहनों की हँसी थी
और सिर के ऊपर फैला हुआ
वो अनंत नीला आसमान।

समय बीत गया,
हम बड़े हो गए,
आसमान आज भी वहीं है
बस उसे देखने वाली वो आँखें
और उसके साथ बिताने वाला वो बचपन
कहीं पीछे छूट गया।

शायद इसलिए आज भी
जब कभी बादलों में कोई आकृति नज़र आती है,
तो मन कुछ पल के लिए ठहर जाता है
जैसे उम्र की सारी सीढ़ियाँ उतरकर
फिर उसी बचपन में पहुँच गया हो,
जहाँ छोटी-सी खुशी भी
पूरी दुनिया जितनी बड़ी हुआ करती थी।

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कभी-कभी शांत मस्तिष्क में ऐसे विचार आते हैं,
जैसे ठहरे हुए शांत दरिया में फेंका गया पत्थर।
पर जब चित्त हमेशा ही उथल-पुथल
और अस्थिर रहा हो,
तो अनायास किसी विचार के आने पर
उस पर क्या प्रभाव पड़ता होगा?

शायद कोई लहर नहीं उठती,
बस पानी थोड़ी देर को काँपता है
और फिर अपनी ही गहराई तलाशने लगता है।

गहरे जल में गिरा पत्थर
लहरें पैदा करता है,
किनारों तक पहुँचता है,
दूर तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है।

मगर उथले पानी में
वही पत्थर तल से टकराकर
बस एक क्षण को गाद उछालता है
पानी मटमैला होता है,
पर उसकी गहराई नहीं बढ़ती।

शायद विचार भी ऐसे ही होते हैं।
वे मन को बदलने नहीं आते,
वे तो बस यह दिखाने आते हैं
कि मन के भीतर कितना ठहराव है
और कितनी गहराई।

और जिस चित्त में हर समय हलचल हो,
वहाँ कोई विचार लहर बनने से पहले ही
एक और शोर में बदल जाता है।

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मैं लिखूँगी,
लिखती रहूँगी मैं,
अनंतकाल तक
जब तक धरती पर प्राण है
तब तक लिखती रहूंगी मैं

लिखूँगी पंछियों के कलरव,
भोर की पहली किरण,
चाँद की अद्भुत चमक,
हवाओं की मीठी महक,
प्रेम के निश्छल सौंदर्य के बारे में।

लिखूँगी नदियों के बहने,
फूलों के खिलने,
प्रकृति के अनुपम वैभव
और उसके निर्मल हृदय के बारे में।

लिखूँगी उस ख़ामोशी के बारे में
जो पहाड़ों के सीने में पलती है,
उस रोशनी के बारे में
जो अँधेरों के बाद निकलती है।
लिखूँगी उस धरती के बारे में
जो बिना कुछ माँगे देती रही

पर जब कभी प्रकृति कुपित होगी,
जब हरियाली की जगह
मनुष्य के कर्मों का दोष होगा
जब नदियाँ अपना रास्ता भूलेंगी,
जब जंगलों की साँसें थमने लगेंगी,
जब पंछियों के गीतों की जगह
मशीनों का शोर होगा
तब लिखूंगी मैं
लिखूँगी मनुष्य के स्वार्थ,
उसके पाखण्ड, आडंबर,
छल-कपट और अहंकार के बारे में;
उस संसार के बारे में
जिसे उसने अपने ही हाथों उजाड़ दिया।

जिसने मुट्ठी भर मिट्टी को
अपनी जागीर समझ लिया,
और भूल गया
जिस धरती पर वह अधिकार जताता है,
एक दिन उसी में
उसे विलीन हो जाना है।

यदि मनुष्य अपनी ही बनाई
इस दुनिया में स्वयं को खोता रहा
तो आखिर में लिखूँगी मैं।
मनुष्य के अंत के बारे में
ArUu ✍️

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Thank you so much
उन हर परिस्थितियों के लिए
जिसमें मेरा साथ देने की बजाय तुमने साथ छोड़ना ज्यादा जरूरी समझा।
जब में एक छोर से धागे सुलझा रही होती तुम हमेशा दूसरा छोर उलझा रहे होते।
Thank u so much
उन काल्पनिक परिस्थितियों को पैदा करने के लिए जो अस्तित्व में ही नहीं थी।
और उन सभी प्रयत्नों के लिए भी जो तुमने मुझसे दूर जाने के लिए किए।❤️‍🩹
Thank you so much
उन खामोशियों के लिए,
जिनमें मेरे सवाल हमेशा अकेले रह गए
और तुम्हारे जवाब कभी आए ही नहीं।
Thank you so much
उन अधूरे वादों के लिए,
जिन्होंने मुझे सिखाया
कि उम्मीदें भी कभी-कभी बोझ बन जाती हैं।
जब मैं हर बार टूटकर भी
रिश्ते को जोड़ने की कोशिश कर रही थी,
तुमने हर बार
उसे और बिखरने का एक नया कारण ढूंढ लिया।
Thank you so much
मुझे ये एहसास दिलाने के लिए
कि खुद को खोकर
किसी को पाना,
असल में खुद से दूर जाना होता है।
Thank you so much
उन रातों के लिए,
जिनमें मैं रोती रही…
और तुम बेखबर सोते रहे।
Thank you so much
उन लम्हों के लिए,
जिनमें मैंने तुम्हें चुना
और तुमने हर बार मुझे छोड़ना।
जब मुझे सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए था,
तुमने मुझे अकेले रहने की आदत सिखा दी…
शायद यही तुम्हारा सबसे सच्चा सबक था।
Thank you so much
मुझे कमजोर समझने के लिए,
क्योंकि आज जो मैं खड़ी हूँ—
वो तुम्हारी वजह से नहीं,
तुम्हारे बावजूद हूँ।
अब फर्क नहीं पड़ता
तुम क्यों गए, कैसे गए…
क्योंकि जो चला जाता है,
वो कभी अपना था ही नहीं।
और हाँ—
Thank you…
मुझे ये सिखाने के लिए
कि किसी और की मोहब्बत से ज्यादा जरूरी
खुद की इज़्ज़त होती है।
अब मैं ठीक हूँ…
तुम्हारे बिना नहीं,
तुमसे दूर होकर। ❤️‍🩹
और आखिर में—
Thank you…
मुझे मेरी ही कीमत समझाने के लिए,
क्योंकि अगर तुम साथ रहते,
तो शायद मैं खुद को कभी ढूंढ ही नहीं पाती। ❤️‍🩹

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