The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
इतनी बड़ी self obsessed हूँ कि खुद के ही फोटोज़ को देखकर घंटों मुस्कुरा लेती हूँ। खुद को ही निहार लेती हूँ, अपनी तारीफ़ करते थकती नहीं। अपने सिवा कोई बेहतर लगता ही नहीं। गिरती हूँ तो खुद ही संभल जाती हूँ, रोती हूँ तो खुद को ही गले लगा लेती हूँ। दुनिया ताली बजाए या नहीं, मैं अपनी सबसे ज़ोरदार चीयरलीडर हूँ।🫡 अपनी ही नज़र न लगे, इसलिए कभी-कभी माथे पर काला टीका भी लगा लेती हूँ।🫠 मेरी सबसे पसंदीदा कंपनी... मैं खुद हूँ।🫣 आख़िर उम्रभर का साथ सबसे पहले खुद से ही तो निभाना है। मेरे सारे राज़ भी मुझे मालूम हैं, और मेरी सारी खूबियाँ भी। मेरी कमियाँ भी मेरी हैं, मेरी जीत भी मेरी है, मेरी हार भी मेरी है। खुद से रिश्ता इतना गहरा है कि किसी और के स्वीकार की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैं खुद को रोज़ चुनती हूँ, क्योंकि दुनिया बदलती रहती है, पर आईने में दिखने वाला इंसान हर दिन मेरा इंतज़ार करता है। 🤍
अब डर लगता है। डर लगता है मेरा बुरा साया उसकी खुशियाँ ना छीन ले, उसकी खिलखिलाती आँखें नम ना हो जाएँ। डर लगता है कि कहीं मैं ही उसकी दुश्मन ना बन जाऊँ, डर लगता है उसके अंतर्मन की गहराइयों में छुपी कुंठा, उसके जेहन में मेरे लिए दबे तिरस्कार से। डर लगता है कि कहीं मेरे होने का अर्थ ही उसके लिए एक संघर्ष ना बन जाए, मेरा नाम उसकी बेचैनियों का कारण ना बन जाए। डर लगता है , मेरी मौजूदगी उसे उसके हिस्से की खुशियों से दूर ना कर दे, और मुझे चुनने की कीमत उसे हर रोज़ खुद से ही ना चुकानी पड़े। डर लगता है, एक उस ऐसे दिन से जब मेरी आहट पर उसके चेहरे की मुस्कान बुझ जाए, और मेरी ओर बढ़ते उसके कदम अनचाहे ही ठहर जाएँ। डर लगता है कही मैं उसके जिंदगी की सबसे बड़ी भूल न बन जाऊं और अंत में डर लगता है कि वो मुझसे नहीं,मेरे वजूद से नफ़रत करने लगे; मेरी परछाईं भी उसे अपने जीवन पर एक अभिशाप लगे।
कुछ शख्स फ़रिश्ते जैसे होते है वो आपकी जिंदगी में तब आते है जब आप खुद जीने की हिम्मत खो चुके होते हो वो यकीन दिलाते है आपको अपने होने का आपका वजूद इस प्रकृति में कितना महत्वपूर्ण है ये बार बार जताते है। वो उस वक्त आपको सुनते है जब आप अपने भीतर के सन्नाटे से जुझ रहे होते है। बिना सवाल बिना उम्मीद आपके आंसुओं और आपकी हंसी का हिसाब रखते है। जब सारी दुनियां आपको तोड़ने में लगी रहती है तब वो एक शख्स भीतर ही भीतर आपके टूटे हुए टुकड़ों को जोड़ने की जद्दोजहद में लगा रहता है। खुद भले कितनी ही दिमागी कश्मकश में हो पर आपके लिए हमेशा वो सुलझा हुआ रहता है। शायद हजार पाप के बीच किए एक पुण्य का फल है वो❤️
सबने दुनिया नहीं देखी उन लोगों ने भी नहीं जो अपने जीवन के अंतिम चरण में है या शायद मृत्यु शैया पर लेटे हुए है ये लोग अपने समय की बाते बड़े गर्व से कह देते है पर सच तो यही है न कि यही वो लोग थे जो समाज के डर से कभी आवाज उठा ही नहीं पाए और न ही सुन पाए कभी अपने भीतर की आवाज़ ये लोग बड़ी आसानी से कह देते है कि हमने दुनियां देखी है पर अपनी गांव की गलियों को तो दुनियां नहीं कहते न हां ये हो सकता है कि उन्होंने उसी छोटी सी परिधि को अपनी दुनियां मान लिया हो जो उन्हें ताउम्र गर्व करवाती रही हैं।
और अंतिम बार मैंने देखी उसकी आँखें मेरे लिए ज़हर उगलती हुई। जैसे कभी उनमें मेरे नाम की रोशनी ही न थी, जैसे मेरी मौजूदगी उसके भीतर कोई युद्ध छेड़ देती हो। मैं खड़ी रही ख़ामोश, अपनी ही धड़कनों के मलबे पर, और वो आंखे बिना कुछ कहे मुझे मेरी सारी मोहब्बत का शोक सौंपकर चली गई।
आज तुम बहुत याद आ रही हो। हां, रोज़ याद आती हो, पर आज कुछ ज़्यादा आ रही हो। मैंने हर उस शख़्स को बदलते देखा है जिसके ना बदल जाने का गुमान था मुझे। पर ऐसे वक़्त में तुम्हारा असीमित प्रेम बहुत याद आता है। कुछ लोग कहते हैं “उदास होती हो तो इतना क्यों याद करती हो उन्हें?” अब कैसे बताऊँ कि एक तुम ही तो थी मेरे पास जो मुझमें लाख बुराइयाँ होने के बावजूद मुझसे अनंत प्रेम करती रही। हर किसी को नापसंद रहने वाली लड़की से तुम ही तो मुस्कुराकर बात किया करती थी। तुम ही तो थी जो मेरे गुस्से के पीछे छुपी फ़िक्र पढ़ लेती थी। जब पूरी दुनिया मुझे गलत समझ लेती थी, तब भी तुम मेरे हिस्से की सफ़ाई अपने दिल में बचाकर रखती थी। एक तुम ही तो थी जिसको फिक्र थी मेरी देर रात लगने वाली भूख की। एक तुम ही तो थी जो कहती थी कि अब सो जा बहुत थक गई है। तुम ही तो थी जो मेरे चिड़चिड़े मिजाज को झेल लेती थी इतनी सहजता से। एक तुम ही तो थी जिसके सामने मुझे अच्छा बनने का अभिनय नहीं करना पड़ता था , मैं जैसी थी,तुमने वैसे ही अपना लिया था मुझे। तुम ही तो समझती थी कि तुम्हारे जाने के बाद मैं कितनी टूट जाऊँगी। अगर ये सच नहीं है,केवल मेरा भ्रम है, तो मैं डरती हूं… इस भ्रम के टूट जाने से भी।
कई बार इंसान जैसा दिखता है उससे कई ज्यादा बुरे समय से लड़ रहा होता है आप अगर उसका साथ नहीं दे सकते उसे समझ नहीं सकते तो कम से कम उसकी जिंदगी में दखल ना दे। आपकी हंसती खेलती जिंदगी में वो शख्स जहर नहीं घोल रहा तो उसकी उदास जिंदगी से आप दूर रहे। हो सकता है वो कोशिश कर रहा हो हर दिन जीने की सिर्फ़ एक वजह ढूंढने की। आप उसे फिर से मरने की एक वजह ना दे।
मैं बहुत मजबूत हूं बहुत ज्यादा इतनी की मुझे भीड़ भी नहीं तोड़ सकती। मैं कभी किसी के सामने खुद को कमजोर नहीं होने देती। हां मेरे लिए अकेले में खुद के सवालों और अपने ही विचारों से लड़ना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। कई बार मेरे अपने विचार मुझे पराजित करने की क्षमता रखते है, बस मेरे अपने किसी और के विचार मुझे खास प्रभावित नहीं कर पाते। अब जब मैं जिंदगी के ऐसे मोड पर खड़ी हूं जहां मुझे न कुछ खोने का डर है और न कुछ पाने की खुशी तो मैं बस भयभीत हूं खुद के खो जाने से❤️🩹
अच्छा आज कल एक ट्रेंड बड़ा कॉमन चल रहा शायद आज कल नहीं बहुत पुराने टाइम से चला आ रहा है जिसके बारे में बात करना थोड़ा असहज हो सकता है पर जरूरी है। मेरी समझ में कई लोगों के extra merital affairs चल रहे हैं। इनसे अपनी एक शादी सम्भल नहीं रही और मुंह पर एक ही सवाल रहता है किसी अविवाहित को देख कर आप शादी कब कर रहे? देखो पहली बात अपना ध्यान रखो और अपने लाइफ पार्टनर का भी। शादी कर के तुम लोगों ने कुछ उखाड़ नहीं लिया । एक पार्टनर की जिम्मेदारी तुमसे सम्भल नहीं रही और किसी अविवाहित को देख कर तुम्हारे दिमाग की नस खींच जाती है। इन घटनाओं से इतना खौफ बैठ गया है दिमाग में कि शादी से डर ही लगने लगा है और फिर लोग बिना एक मिनट सोचे कह देते है शादी कब कर रहे हो? पुरुष या महिलाओं की बात नहीं है । इस क्षेत्र में वर्तमान में दोनों ही अग्रणी है। और यहां बात कामकाजी या गृहस्थ लोगों की भी नहीं है। ज्ञान सब दे जाते है बस अपने गिरेबान में झांक कर कोई नहीं देखता । कभी पूछो अपने आप से की आप अपने पार्टनर के लिए कितने ईमानदार है? और क्या वाकई आज के वक्त में शादी करना एक अच्छा निर्णय है अपनी मानसिक शांति के लिए?
मुझे सुधा बहुत पसंद है सिर्फ धर्मवीर भारती के *गुनाहों के देवता* के चन्दर वाली सुधा नहीं। वो तो देवी है अपने भीतर अथाह प्रेम और समर्पण वाली देवी...प्रेम त्याग कर अमर बन गई पर मुझे मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास *निर्मला* कि सुधा उससे भी ज्यादा पसंद है। वो एक ऐसी स्त्री है जिसने दूसरी स्त्री को समझा उसका साथ दिया। निर्मला का मंगेतर जो कि बाद में सुधा का पति बना उसने निर्मला से सिर्फ दहेज के लिए शादी से इनकार कर दिया। ये जानने के बाद भी उसने निर्मला से अपनी मित्रता खत्म नहीं की और ना ही कभी उसे हीन नजरों से देखा। उसके लिए निर्मला सदैव एक पूजनीय छवि रही। अपने पति का पक्ष न लेकर उसने निर्मला के साथ हुए अन्याय के खिलाफ बात कही और भी सुधा के चरित्र में बहुत खूबियां रही। उसने मित्रता में सब न्योछावर किया। सच में सुधा बहुत पसंद है मुझे। दोनों ही उपन्यास में सुधा औरत की अपनी परिभाषा को चरित्रार्थ करती नजर आती है।
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved | Powered by Nichetech.
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser