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Deepak Bundela Arymoulik

Deepak Bundela Arymoulik Matrubharti Verified

@deepakbundela7179
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जूते

साथ सब ने छोड़ दिया,
वक़्त ने भी मुँह मोड़ लिया,
भीड़ में रहकर भी
मैंने खुद को अकेला छोड़ लिया।

जो अपने थे,
ज़रूरत बनते ही पराए हो गए,
कंधे जिन पर भरोसा था,
वो अचानक बोझ से घबरा गए।

लेकिन—
फटे, टूटे जूते आज भी
मेरे साथ हैं,
हर पत्थरीली राह पर
मेरी तक़दीर के गवाह हैं।

जब पाँव छिले,
तो इन्होंने शिकायत नहीं की,
जब लोग हँसे,
तो इन्होंने शर्म महसूस नहीं की।

हर गिरावट में
मुझे उठना सिखाया इन्होंने,
हर मंज़िल से पहले
संघर्ष का मतलब बताया इन्होंने।

लोग साथ छोड़ गए
मेरी हैसियत देखकर,
जूते साथ निभा गए
मेरी हालत देखकर।

शायद इसलिए आज भी
सर उठाकर चलता हूँ मैं,
क्योंकि वफ़ा का मतलब
फटे, टूटे जूतों से सीखा है मैंने।

आर्यमौलिक

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कलम की पुकार

मैं लिखते-लिखते थक चुका हूँ,
उँगलियाँ बोझिल, शब्द भी चुप हैं।
कलम मुस्कुराई, धीरे से बोली—
“रुक क्यों गए? अभी तो सफ़र बाकी है।”

“मैं तो सदियों से लिखती आई हूँ,
हर अँधेरे में दीप जलाती रही।
इस आस में—आज नहीं तो कल,
कोई तो नींद से जागेगा सही।”

मैंने कहा—“रात बहुत हो चुकी है,
थकान ने मेरे हौसले तोड़ दिए।”
वो हँस पड़ी, स्याही चमक उठी—
“अँधेरा ही तो है, लिखने के लिए।”

“चल उठ और लिख उन ख़्वाबों के नाम,
जो दिन में सोए, रात में रोते हैं।
तेरे शब्द ही दस्तक देंगे,
जहाँ ज़मीर अब भी सोते हैं।”

मैंने फिर कलम को थाम लिया,
थकान कहीं पीछे छूट गई।
क्योंकि लिखना सिर्फ़ शब्द नहीं,
जागते रहना भी एक जिम्मेदारी हुई।

आर्यमौलिक

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मेरी मां

जैसे तुम्हारी भाषा तुम्हारी माँ है,
वैसे ही हिंदी भाषा मेरी माँ है।

जिसकी गोद में मैंने पहला शब्द बोला,
जिसके आँचल ने हर भाव को खोला।

उसके अक्षर मेरी साँसों में बसे हैं,
मेरे सपनों, विश्वासों में बसे हैं।

जब मन टूटा, तो उसी ने सहलाया,
जब मैं चुप रहा, उसी ने बुलवाया।

उसकी लोरी में संस्कारों की गंध है,
उसकी वाणी में मिट्टी की सुगंध है।

मेरा गर्व, मेरी पहचान वही है,
मेरी हर मुस्कान की जान वही है।

तुम अपनी भाषा से रखो प्रेम अपार,
मुझे हिंदी से है माँ जैसा ही प्यार।

क्योंकि जैसे माँ से बढ़कर कुछ नहीं,
वैसे हिंदी से बढ़कर मेरी दुनिया नहीं।

आर्यमौलिक

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तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ

तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ,
हर शब्द में छुपा एक एहसास पकड़ता रहूँ।
तुम्हारी कलम जब भी ख़ामोशियाँ तोड़े,
मैं उन ख़ामोशियों की आवाज़ बनता रहूँ।

मैं लिखता रहूँ, तुम पढ़ते रहो,
मेरे जज़्बातों का मतलब समझते रहो।
जो कह न सका मैं आँखों से कभी,
तुम अक्षरों में उसे महसूस करते रहो।

तुम्हारे लिखे हर लफ़्ज़ में मैं मिल जाऊँ,
मेरे लिखे हर सच में तुम झलक जाओ।
ना मिलना हो तो भी क्या ग़म है यहाँ,
हम लिखने-पढ़ने में ही रोज़ मिल जाएँ।

तुम लिखते रहो, मैं पढ़ता रहूँ,
वक़्त की धूप में भी साया करता रहूँ।
मैं लिखता रहूँ, तुम पढ़ते रहो,
यही रिश्ता रहे—कलम और दिल का रहे।

आर्यमौलिक

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वो गलियां अब सुनी हैं
जहां कभी सब चला करते थे,
हंसी की गूंज थी हर मोड़ पर,
आज सन्नाटे वहां पला करते हैं।

दीवारों ने पहचान दी थी हमें,
कदमों की आहट से दरवाज़े खुलते थे,
अब वही दरवाज़े खामोश खड़े,
जैसे सवाल पूछते—तुम लौटोगे कब?

शामें पहले नाम पुकारती थीं,
चाय की भाप में सपने घुलते थे,
आज धूल में दबी हैं वो शामें,
और सपने किसी और शहर में सुलगते हैं।

वो गलियां अब सुनी हैं,
पर यादें अब भी जागती हैं,
कभी-कभी हवा बतियाती है—
“सब यहीं था, बस वक़्त बदल गया।”

आर्यमौलिक

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बीत रही उम्र… सवाल अभी खड़े हैं

बीत रही उम्र, सवाल अभी खड़े हैं,
वक़्त की दहलीज़ पर कुछ पल जड़े हैं।
जो सोचा था कभी, वो पूरा न हो सका,
उसी अधूरेपन में सपने पड़े हैं।

पुरानी यादों के आँसू अब भी पड़े हैं,
दिल के किसी कोने में चुपचाप अड़े हैं।
हँसी की परतों में छुपा दर्द कहता है,
हम आज भी कल की टीस में गड़े हैं।

जिन राहों पर चलना कभी सीखा था,
आज वही राहें अजनबी लगती हैं।
अपने ही फैसलों की छाया में खड़े,
क्यों ये खामोशियाँ इतनी गहरी लगती हैं?

हर शाम हिसाब माँग लेती है जीवन से,
हर सुबह कोई जवाब अधूरा छोड़ जाती है।
चलती साँसों के बीच थमी हुई सी आत्मा,
बस उम्र बढ़ती है, कहानी नहीं बदल पाती है।

फिर भी उम्मीद की एक नन्ही सी लौ,
इन सवालों के अंधेरे में जलती है।
शायद किसी मोड़ पर मिल जाए सुकून,
इसी भरोसे पर ज़िंदगी आज भी चलती है।

आर्यमौलिक

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जहाँ शब्दों की अहमियत नहीं…

जहाँ शब्दों की अहमियत नहीं,
वहाँ क्या लिखें अपने एहसासों को?
जहाँ ख़ामोशी ही जवाब बन जाए,
वहाँ कौन समझे इन जज़्बातों को?

जब बोलने से अर्थ खो जाए,
और कहने से सच अधूरा लगे,
तब आँखों की नमी ही काफ़ी है,
हर बात लफ़्ज़ों से ज़्यादा लगे।

कुछ रिश्ते शब्द नहीं माँगते,
बस मौजूदगी की धूप चाहिए,
एक चुप सा साथ, एक ठहरा पल,
जहाँ वक़्त को भी साँस चाहिए।

वहाँ एहसास हवा बन जाते हैं,
जो छूकर भी दिखाई नहीं देते,
दिल समझ लेता है दिल की भाषा,
जहाँ होंठ कुछ भी कह नहीं देते।

तो वहाँ लिखना भी क्या लिखना है,
जहाँ महसूस करना ही काफी हो,
जहाँ शब्द हार मान लेते हैं,
और ख़ामोशी ही सबसे बड़ी गवाही हो।

आर्यमौलिक

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बंट गए सब

कभी एक थे, आज बँट गए सब,
हँसी की चौपाल से चुप्पी में सिमट गए सब।
आँगन जहाँ गूँजती थी किलकारियों की धुन,
वहीं खामोशी ओढ़े, अपने ही बन गए सब।

घर की दीवारों पे टँगी यादों की तस्वीरें,
आज धूल पूछती हैं—किधर चले गए सब?
जो साथ बैठ कर बाँटते थे सुख-दुख की रोटियाँ,
वक़्त की आँधी में रिश्तों से कट गए सब।

एक दीया था जो सबके हिस्से उजाला देता,
अब हर कोना अँधेरा, अपने-अपने जल गए सब।
नाम तो वही हैं, खून भी एक ही बहता है,
पर दिलों के पते बदल कर बिछुड़ गए सब।

कभी जो “अपना” कहने में देर न लगती थी,
आज वही शब्द होंठों से उतर गए सब।
बस एक सवाल दीवारों से टकरा कर लौटता है—
हम बदले या हालात, कि यूँ बिखर गए सब…

आर्यमौलिक

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