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Jitendra Singh

Jitendra Singh

@jeetthepoetofthepast


बेरहम है दुनिया
और चाहती है शांति
मतलबी इतनी है कि
बेमतलब किसी को न जानती।
जो हो रहा साथ अपने
क्या यह पहले से ही है लिखा
ऐसा ही अगर है
तो उसने सब फ़िज़ूल क्यों लिखा।
सूज गई हैं आँखें
ज़रा देखो तो आईना
सवेरा होकर गुजर गया
पर नींद आई ना।
सूरज निकलते देखा है
देखा है डूबते
जो संग इसी के चल दिए
वो भी क्या खूब थे।

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प्रतिपल मैं यह रखता मंशा,
प्रतिपल मेरे मन में क्रोध।
मैं अनुयायी अपने मन का,
हृदय और मन में है संगत विरोध।
बिन मतलब के चलती जिह्वा,
पश्चाताप में करे अनुरोध।
हृदय कहे सब भूल जाने को,
पर प्रतिपल मांगे मन प्रतिशोध।

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समय सबसे पहले हाथ थामता है,
समय सबसे पहले साथ छोड़ता है।