The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
जीवनोंपनिषद ✧ भूत, भविष्य और धर्म ✧ ✍🏻 — 🙏🌸 अज्ञात अज्ञानी भूत की ज़रूरत (विस्तार) भूत का महत्व तब है जब हमें किसी समस्या की जड़ खोजना हो। बीमारी की दवा तब ही चुनी जाती है जब डॉक्टर उसके कारण (भूत) को समझे। किसी दुर्घटना का कारण जानने के लिए भी पीछे जाना पड़ता है। समाज में भ्रष्टाचार क्यों है, हिंसा क्यों है, या संस्कृति क्यों बिगड़ी — इन प्रश्नों के उत्तर भूत में ही मिलते हैं। 👉 भूत इसलिए उपयोगी है कि वह कारण बताता है। लेकिन भूत पर अटक जाना, बार-बार वही कहानियाँ दोहराना — यह समाधान नहीं, बल्कि रुकावट है। श्लोक १ भूतं कारणमित्युक्तं, रोगदुःखविनाशनम्। अन्वेष्टव्यं प्रयोजनं, न तु तत्र निवेशनम्।। व्याख्या: भूत कारण को बताता है, दुःख और रोग का निदान वहीं से समझ आता है। पर भूत को केवल खोजो, उसमें बसो मत। भविष्य की ज़रूरत भविष्य दिशा देता है। समाज को सुधारने के लिए कानून चाहिए, शिक्षा चाहिए, योजनाएँ चाहिए। ये सब भविष्य की ओर दृष्टि रखकर ही बनते हैं। किसान भी बोआई करते समय भविष्य की फसल देखता है। माता-पिता बच्चों को पढ़ाते हैं क्योंकि वे उनके भविष्य की कल्पना करते हैं। 👉 भविष्य इसलिए आवश्यक है कि वह दिशा और आशा देता है। लेकिन भविष्य पर ही टिका रहना, अभी को भूल जाना, सिर्फ सपनों में खो जाना — यह भ्रम है। श्लोक २ भविष्यं मार्गदर्श्यर्थं, नियमशिक्षापरायणम्। दृष्टव्यं केवलं तत्र, न तु स्वप्नविलासनम्।। व्याख्या: भविष्य मार्ग दिखाने के लिए है, शिक्षा और व्यवस्था का आधार है। लेकिन भविष्य में खोकर जीना सिर्फ स्वप्न का खेल है। धर्म और आध्यात्म में भूत–भविष्य जब हम धर्म और आध्यात्म की बात करते हैं, तो वहाँ भूत और भविष्य की कोई आवश्यकता नहीं। क्योंकि धर्म सत्य है, और सत्य केवल इस क्षण में उपलब्ध है। 👉 जो गुरु केवल पुरानी कहानियाँ सुनाकर भूत का महिमामंडन करते हैं, या भविष्य के स्वर्ग और मुक्ति के सपने बेचते हैं, वे धर्म नहीं, बल्कि पाखंड करते हैं। श्लोक ३ न भूतं धर्ममार्गे, न चापि स्वप्नभविष्यकम्। वर्तमानं तु धर्मः स्यात्, साक्षात् सत्यं सनातनम्।। व्याख्या: धर्म में न भूत का कोई महत्व है, न भविष्य का कोई स्थान है। धर्म केवल वर्तमान है, यही सनातन सत्य है। अनुभव और भूत हाँ, हमारे अनुभव भूत में दर्ज रहते हैं। हम पीछे देखकर सीख सकते हैं। लेकिन अनुभव को पकड़कर बैठ जाना, या उनका अंध-पूजन करना — यह अज्ञान है। 👉 अनुभव का उपयोग है केवल सीखने के लिए, ना कि पूजा करने के लिए। श्लोक ४ अनुभवो भूतनिष्ठः, शिक्षार्थं परिगृह्यते। पूज्यं न तु संसक्त्यै, ज्ञानं तत्र विवेकतः।। व्याख्या: अनुभव भूत में हैं, पर उनका उपयोग केवल शिक्षा के लिए है। उन्हें पूजना या उनमें उलझना अज्ञान है। पाखंड का खेल आज अधिकांश धर्मगुरु यही करते हैं। वे भूत की कहानियाँ पीटते हैं, महानता का भ्रम रचते हैं, और भविष्य के सपने बेचते हैं। स्वर्ग, मोक्ष, चमत्कार — सब भविष्य की बिक्री है। यही सबसे बड़ा पाखंड है, जो वर्तमान को अपमानित करता है। श्लोक ५ भूतं पीट्य महात्म्यं, भविष्यं स्वप्नविक्रयः। धर्मो नायं पाखण्डः स्यात्, वर्तमानं हि कीर्त्यते।। व्याख्या: भूत को पीटना और भविष्य के स्वप्न बेचना धर्म नहीं। यह पाखंड है। धर्म केवल वर्तमान है। निष्कर्ष भूत और भविष्य संसार के लिए उपयोगी हैं — भूत कारण बताता है, भविष्य दिशा देता है। लेकिन धर्म और आध्यात्म केवल वर्तमान का नाम है। वर्तमान ही ईश्वर है, वर्तमान ही सत्य है। श्लोक ६ भूतं कारणमित्याहुः, भविष्यं च अपेक्षते। वर्तमानं तु धर्मः स्यात्, सत्यं नित्यमिह स्मृतम्।। व्याख्या: भूत कारण के लिए है, भविष्य अपेक्षा के लिए। लेकिन धर्म केवल वर्तमान है, और वही शाश्वत सत्य है। सारांश भूत कारण है। भविष्य दिशा है। पर धर्म केवल वर्तमान है। जो इस क्षण में जीता है, वही धर्म, ईश्वर और सत्य — तीनों को जान लेता है। — 🙏🌸 अज्ञात अज्ञानी #धर्म #आध्यात्मिक Philosophy ( philo- "loving" + sophia "knowledge" ) #vedanta #spiritualit
Copyright © 2025, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser