"जब जीवन मे अनुकूलता का आभाव हो और यह निश्चित हो की अनिश्चित जीवन गुजारना ही है , समय के निर्देशो तले | तो खुद को खिसका लें आवश्यता से अधिक सोच - विचार के दायरे से | " यह प्रयोग एक औषधि है | रुचि दीक्षित

भर जाये दामन खुशियों से न चुभे कोई काँटा तुझको |
तू जहाँ लगाये मन अपना वो ईश्वर तुझे वहाँ रमे |
देने वाले तो बहुत तुझको उपहार सजाये बैठे है | शायद इन उपहारो मे इन शब्दो का कोई मोल न हो , पूरी है सभी आकांक्षा जो उसमे इसका कोई तौल न हो | फिर भी निकला है हृदय से यह आशीष तुझको भेजती हूँ | यदि बचा हो गम जीवन तेरे हो तो , आँचल मे अपने समेंटती हूँ |
जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ♥️💐🍫

-Ruchi Dixit

Read More

क्या खोया यह पता नही ,
क्या पाना था पता नही |
अन्तर पीड़ा रही जोड़ती ,
नाहक संयम रही तोड़ती |
बदला क्या जब बदा यही हो ,
बदी की चाल में लिपटा मै हो |
रोज नहाकर अश्रु सृजन में ,
खुद को छोड़ा निर्जन वन में |

Read More

"आज मेरा जन्मदिवस (अक्टूबर - 2)" by Ruchi Dixit read free on Matrubharti
https://www.matrubharti.com/book/19936195/today-is-my-birthday-october-2

जो स्वंय से अपरिचित है
उसके विचार , उसके कर्म ,
उसका अनुकरण ,व्यवहार कोई मामने नही रखता |
#स्वंय_के_लिए |

घाव स्वतः ही भर जाते है |
दुःख स्वतः ही कम हो जाता है |
ख्वाहिशे भी निर्मूल हो जाती है |
आखिर कारण क्या है ? यह प्रश्न जहन मे आ जाने पर |
कितना जी लिये
और कितना ही और जियेंगे |
भय नही मृत्यु से, भय है तो जीवित न
होने से | भय नही न पाने से ,
भय है तो खो जाने से | भय नही प्रेम से भय है तो प्रेम मे मिश्रित अहंकार से | भय नही जानने से भय है तो न मानने से | भय है तो अन्तरग्रहण अनभिज्ञता और पोषित न हो पाने से | भय है तो केवल भय से |

Read More

चावल,जौ, गेहूँ ,धन -सम्पदा सब तो इन्ही का है |
फिर भी भोलेनाथ भोले ही ठहरे | लोगो के परपंच , नाटक
से भी प्रसन्न हो जाते है | असल चढ़ावा तो उसी दूरी का है जिसे तय कर हम मन्दिर तक जाते हैं मगर फिर भी कभी मन्दिर हमारे पास नही आता |

Read More

खुद मे खुद ही गढ़ती किस्से ,
एक भरम ही है मेरे हिस्से |

-Ruchi Dixit

बार - बार ले जाती है नजर वहाँ !
उचित - अनुचित की लकीरे लांघकर |
लगता है ! है कोई अपना कहीं ,
बार -बार निराशा में भी , क्यों?
कबतक ? तय नही ! पता नही !!...

Read More

मुझमे मेरा कुछ नही तो ,
सब्र और अधीरता कैसे है |
तुम राहत हो या पीड़ा,
सुख हो या दुःख ,
सामर्थ्य हो असमर्थता भी |
अनुकूल हो या प्रतिकूल बस इतना जानती हूँ ,
कि तुम हो ! बस हो ! ! तुम्हारे होने से मै हूँ |

Read More

कभी तोड़ी न वो लय पहले से जिसे पहचानती रही |
इंसानो सी फितरत थोड़ी है जो ,पल पल बदलती रहे ,
पत्थर तो उनसे नेक ही है | उससे प्रेम न हो तो हो भला किससे ? जो , रूप रंग नश्वरता पर ठहरता नही | नही जानती अन्तर पत्थर और इन्सान में , बस इतना जानती हूँ कि पत्थर भी प्रेम मे साकार हो जाता है | निराकार से आकार हो जाता है | देखे तो कभी कोई करके प्रेम उम्र की लकीरे प्राण अपने बचाकर भागती हैं | मै बूँद भी न पाईं हूँ , न बूँद मे समाई हूँ मगर न जाने कौन जानता है| भीतर प्रेम मानता है | मै भी तो पत्थर ही हूँ जिसमें प्रेम नही , मगर प्रेम मे पत्थर ,पत्थर नही | पत्थर ने पत्थर उपजाये | पत्थर ने मानव है जाये | पत्थर ही भाव को उपजाये | पत्थर हर भाव मे बैठा है , पत्थर अ-भाव मे बैठा है | पत्थर ही निर्माण करे | सब मे ही यह भाव भरें | सब चलते है इस पत्थर से , जो है , अविचल ,अचल विराम धरे | पत्थर सा गुण कोई गढ़े नही , पत्थर को कोई पढ़े नही | पत्थर से प्रगटी पार्वती , पत्थर में मे बैंठे है शिवजी , पत्थर से पवित्र नही कुछ भी पत्थर मे विराजे पत्थर मे विराजे राधा संग प्यारे मोहन ,अनिमिष | पत्थर मे बैठी कल्याणी |
पत्थर ही पत्थर सृष्टि मे | .......

Read More