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RUCHI RAPTA

RUCHI RAPTA

@ruchiraptagmail.com106238


जिसका हाल नहीं पूछा, वो सुखी लगता रहा,
पास जाकर पूछा तो हर शख़्स दुखी निकला।

मैंने पूछा,
“तुम्हें कैसे सपने आते हैं?”
तुमने जो बताया,
उसमें कुछ मेरे जैसे थे…
कुछ बिल्कुल अलग।

कुछ ख़्वाब तुम्हारे थे,
जिनसे मैं अनजान थी,
और कुछ ऐसे लगे
जैसे कभी मैंने भी
उन्हें अपनी आँखों में सँजोया था।

अजीब सा रिश्ता है शायद,
सपने भी कहाँ पूरी तरह अपने होते हैं…
कभी दो अजनबी दिल,
एक जैसे ख़्वाब देखते हैं,
और कभी एक ही ख़्वाब में
दो अलग दुनिया बसा लेते हैं।

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सादगी में जो नूर है, वो दिखावे में कहाँ,
जो दिल से खूबसूरत हो, उसे सजने की ज़रूरत कहाँ।..
- RUCHI RAPTA

मौसम आज कुछ यूँ मेहरबान है,
ठंडी हवा में घुली बारिश की मुस्कान है।
बादलों से ढका ये नीला आसमान,
हर तरफ़ बिखरा प्रकृति का निखार है।
चलते-चलते नज़र जब उठती है,
तो हरियाली कुछ और खूबसूरत लगती है।
हवा चेहरे को छूकर जब गुजरती है,
मन की सारी थकान जैसे वहीं ठहरती है।
ऐसे मौसम में बस चलते रहने का मन करता है,
क्योंकि आज हर कदम के साथ सुकून मिलता है।

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