मैंने पूछा,
“तुम्हें कैसे सपने आते हैं?”
तुमने जो बताया,
उसमें कुछ मेरे जैसे थे…
कुछ बिल्कुल अलग।
कुछ ख़्वाब तुम्हारे थे,
जिनसे मैं अनजान थी,
और कुछ ऐसे लगे
जैसे कभी मैंने भी
उन्हें अपनी आँखों में सँजोया था।
अजीब सा रिश्ता है शायद,
सपने भी कहाँ पूरी तरह अपने होते हैं…
कभी दो अजनबी दिल,
एक जैसे ख़्वाब देखते हैं,
और कभी एक ही ख़्वाब में
दो अलग दुनिया बसा लेते हैं।