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santosh Mishra

santosh Mishra

@santoshmishra


“तेरे होने का एहसास आज भी हर पल होता है,
तेरे चेहरे के दीदार को ये दिल आज भी तरसता है।
तुझे पाने की चाह अब भी दिल में बाकी है—
यूँ ही नहीं, तेरे एक इशारे पर तेरे साथ चल पड़ता हूँ।
उम्मीद के सहारे दिन काट लेता हूँ,
पर रात होते ही तुझे खो देने से डर जाता हूँ।
इसी डर में हर सुबह, हर दिन
किसी नए मंदिर के दर पर जा कर
तुझे माँग लेता हूँ…
बस कुछ ऐसे ही,
मैं आज भी तुझसे प्यार करता हूँ।”

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एक रात ऐसी आएगी,
जब मैं एक-एक बात लिखूँगा—
न जज़्बात की कोई चाशनी होगी,
न झूठ का कोई सहारा लूँगा।
मैं कागज़ पर तेरे गुनाहों को,
पूरे सबूतों के साथ लिखूँगा।
उस रात अदालत मेरी होगी और गवाह मेरी तन्हाई,
हर फ़ैसला... सिर्फ और सिर्फ मेरे हक़ में होगा।
और तब...
बिना किसी नकाब के, बिना किसी पर्दे के,
तुझे, तेरे नाम के साथ...
ज़माने भर के लिए ‘बेवफ़ा’ लिख दूँगा।

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उसके चक्कर में ज़माना भूल गए,
उसके बाद मुस्कुराना भूल गए।
जब सफलता कदमों में थी हमारे,
उसी मोड़ पर वो साथ छोड़ गए।
जब दोनों हाथ फैलाए आसमान था,
तभी वो हमें तन्हा छोड़ गए।
उनके छोड़ने के ग़म में हम
इस आसमान में उड़ना ही भूल गए।
कुछ इस कदर मिला धोखा कि,
ख़ुद ही ख़ुद को अंदर से मारते गए,
और इस सब के बीच,
हम सारा ज़माना भूल गए।”**

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मेरे यार अक्सर पूछते हैं मुझसे—
कि संतोष, तू सब कुछ हासिल कर सकता है,
फिर अपनी उस मोहब्बत को क्यों छोड़ बैठा है?
तो मैं भी बस मुस्कुरा कर कह आया—
कि मेरे छोड़ने के बाद वो किसी और के हुए,
और कमाल देखिए... जिन्हें वो हासिल हुए,
उन्हें भी वो 'पूरे के पूरे' न हुए!क्योंकि छोड़ी हुई मोहब्बत को मैं दोबारा हासिल नहीं करता,
मोहब्बत के खेल में मैं कभी 'व्यापार' नहीं करता।
जो कभी हमारी नज़रों में बहुत 'महंगे' थे, आज कौड़ियों के भाव सस्ते हो गए...
और सच तो ये है दोस्तों...
कि इतनी सस्ती चीज़ों को, मैं अब पलटकर देखना भी पसंद नहीं करता।"

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**ग़मों का तोहफ़ा दे जाऊँगा,
हर दुआ में बद्दुआ का अक्स दे जाऊँगा।
शायद तुम्हें समझ न आए अभी,
पर कुछ ऐसा कर जाऊँगा।
जब खुशियाँ होंगी तुम्हारे क़दमों में,
तब तुम्हारी गुमनामी को खुलकर बताऊँगा।
अभी लफ़्ज़ों में ज़िक्र नहीं तुम्हारा,
पर एक दिन हर शायरी में
तेरा ही नाम लिख जाऊँगा।**

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**ग़मों का तोहफ़ा दे जाऊँगा,
हर दुआ में बद्दुआ का अक्स दे जाऊँगा।
शायद तुम्हें समझ न आए अभी,
पर कुछ ऐसा कर जाऊँगा।
जब खुशियाँ होंगी तुम्हारे क़दमों में,
तब तुम्हारी गुमनामी को खुलकर बताऊँगा।
अभी लफ़्ज़ों में ज़िक्र नहीं तुम्हारा,
पर एक दिन हर शायरी में
तेरा ही नाम लिख जाऊँगा।**

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- santosh Mishra

तेरे पैरों तले ज़मीन खिसकना अभी बाक़ी है,

जो ज़हर मैंने पिया, वो चखना तुझे अभी बाक़ी है।

दुआ है—तेरी पहली औलाद बेटा हो,

और जो मेरे साथ हुआ, वही मंज़र उसे नसीब हो।

मैं तो मर्द था, दर्द छुपा गया,

वो मासूम शायद छुपा न पाएगा।

जब अपनी ही सूरत को तू तड़पता देखेगी,

कसम खुदा की, तू लहू के आँसू रोएगी।"

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तेरे होने से चेहरे पर मुस्कान रहती थी, तेरे न होने से कुछ ज़्यादा बदला नहीं…
जो ख़ामोशी पहले भीतर रहती थी, वो अब हर महफ़िल में साथ चलती है। जिन महफ़िलों में कभी हँसा करते थे, अब वहाँ भी एक उदासी रहती है।"**

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