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Shilpy Aggarwal

Shilpy Aggarwal

@shilpy
(144)

ज़िंदगी कुछ इस तरह
बिखरी सी रहती है,
ख़ुद के लिए ही कम
पड़ जाया करते हैं।
फिर भी न जाने कैसे
हर कोई ही यहाँ,
दूसरों का सहारा
बनता-सा चलता है।




- Shilpy Aggarwal

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“If you resist being manipulated,
be ready
to be hated…”
- Shilpy Aggarwal

दिल चाहता तो प्यार और हमदर्दी ही था
तूने रंजिशें परोसीं तो रंजिशें ही सही
मैंने ख़ुद में उतारी तेरी हर एक नैमत
तेरा आईना हूँ मैं, अब परहेज़ कैसा?
- Shilpy Aggarwal

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यह कविता उन लोगों को समर्पित है जिन्हें अक्सर “लोनर” या अंतर्मुखी कहा जाता है।

वे लोग जो बहुत कुछ महसूस करते हैं, पर अपनी भावनाओं को सहजता से शब्द नहीं दे पाते। जिनके भीतर विचारों, स्मृतियों और जज़्बातों का एक गहरा संसार होता है, जो अक्सर उनके अपने हृदय तक ही सीमित रह जाता है।

मेरे जज़्बात

मेरे जज़्बात भारी हैं
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ ।
सफ़र हो दिल से दिल तक का
वो एक आवाज़ कैसे दूँ ।
घोंसला छोड़ जाने का
हौंसला ले भी आयें तो
बिखर कर टूट जाने को
मैं झूठी आस कैसे दूँ।
बोझ इनका उठा लें जो
सही अल्फ़ाज़ कैसे दूँ।
मेरे जज़्बात भारी हैं
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ ।

सियाह हैं, कुछ ये मैले से,
सुरख, उजले, सुनहरे से।
सभी रंगों में गहराकर,
वक्त की मार खा-खा कर,
मन ने कोख में अपनी
कई तूफ़ान पाले हैं,
कई मोती संभाले हैं।
गुज़रता वक्त जाता है
ये चुप सागर में ठहरे हैं।
हदों को तोड़ जाने को,
बहाकर सब ले जाने को,
बवंडर आज कैसे दूँ।
मेरे जज़्बात भारी हैं ,
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ ।


तराने बन के होठों पर,
ये मुस्कानें बिछाते हैं।
कभी नैनों से झर-झर कर,
तपिश दिल की मिटाते हैं।
महफिलों में, वीरानों में
यही तो साँसें थामे हैं।
इन्हें खुद से जुदा करके
तेरी सोहबत में लाने की
मेरे दिल के शहज़ादों को
तेरे दिल में इतराने की
जगह एक खास कैसे दूँ ।
मेरे जज़्बात भारी हैं
इन्हें परवाज़ कैसे दूँ !

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