होठों से हँसी, दिल से हर एक टीस गई जबसे
अकेले में ख़ुद से मिलने से बचता फिरता हूँ
अंदर बस शोरगुल है, रहा बाक़ी नहीं कुछ भी
गूँजते ख़ालीपन से अब ज़रा घबराया करता हूँ
मुखौटे हैं, दिखावट है, छलावे की ये दुनिया है
भीड़ और जगमगाहट में कहीं खो जाया करता हूँ
उमंगें और चाहतें अब उड़ाने भर नहीं पाती
मशीनों के जैसे ही मैं भी बस चलता रहता हूँ।
- Shilpy Aggarwal