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आज़ादी ऐसे ही नहीं जली मशाल ए आज़ादी। कितने ही वीरों के बलिदानों ने इसे हवा दी। तलवारें लड़ी सन् सत्तावन में। राजा रानी बादशाह बेगम सब कूद पड़े रण में। सत्तावन के बाद चाटुकारों को छोड़कर सबने अपने राज्य खोए थे। नील अफीम की खेती से खेत खलिहान रोए थे। फिर आया वो वक्त जब बच्चे - बच्चे में देशप्रेम जाग गया। सोचा अब तो फिरंगी भाग गया। लाल बाल पाल के विचारों से प्रेरित होकर युवाओं में फैली आग। उधर नरम दल ने अलापा अहिंसा का राग। लाला जी ने खाई लाठियां जलियांवाला बाग में निर्मम हत्याएं हुई। फिर भी क्रांतिकारी न हटे पीछे तेज क्रांति की लपटें हुई। अल्फ्रेड पार्क में आज़ाद जी ने स्वयं को गौरवान्वित गोली मारी थी। नेता जी के नारे से गूंजी गलियां सारी थी। भगत सुखदेव राजगुरु २३-२४ की उम्र में फांसी पर झूल गए। सावरकर जी पर अत्याचारों को हम कैसे भूल गए। आज़ादी सिर्फ एक के बल पर आई नहीं। कुछ लोगों को अनावश्यक बड़ा दिखाने की बात ‘शान' को भाई नहीं। लाठियां खाई काला पानी सहा पर डटे वहीं। खून से लिखी इबारत पर मिटे नहीं। आखिरकार १९४७ मे तीन रंग की ध्वजा ‘शान' से लहराई। पर याद रखो ये आज़ादी मुफ्त में ना पाई। सृष्टि तिवाड़ी शान - srishti tiwari
*सच्चाई , अग्नि परीक्षा की * आदर्शों से लिखी थी इक प्रेम कहानी। महलों को त्याग वन में रहने आए एक राजा रानी। पितृ वचन निभाने हेतु चौदह बरस वन में बिताए। ना साथ छोड़ा ना डगमगाए। जब आई इक रोज शूपनखा था जिसे अपने पर अभिमान। राम की सुंदरता देख उनसे किया अपने प्रेम का बखान। राम ने मना किया तो दिया उसने अपनी आसुरी प्रवृत्ति का प्रमाण। सीता को मारने की की कोशिश पर लक्ष्मण ने काटा नाक और कान। राम ने लक्ष्मण को समझाया। एक स्त्री को विक्षिप्त कर उसने स्वयं समस्या को बुलवाया। सीता भयभीत हुई तब राम ने किया अग्नि देव का आह्वान।। सिया को संग में ले गए अग्नि देव इसका लक्ष्मण को भी नहीं था भान। और वहां छोड़ गए सीता की छाया। फिर शूपनखा का बड़ा भाई रावण सीता को चुराने आया। उसने सीता समझ कर किया छाया सीता का हरण । राम गए करने रावण मर्दन। फिर मिले हनुमान संग वानर सेना। जिन्होंने मार गिराई रावण संग पूरी असुर सेना। अब आई फिर से वेला मिलन की। राम ने कही बात अग्नि परिक्षण की। इस बात से सब में हुआ विरोधाभास। परंतु राम को बुलाना था अपनी सीता को पास। फिर राम ने सबको सच्ची बात बताई। और राम की असली सीता उनके संग लौट के अवध आई। ऐसी आदर्श कथा शान आपको बताती है। आपके समक्ष अग्नि परीक्षा की सच्चाई लाती है। *- सृष्टि तिवारी शान*
राधे राधे - srishti tiwari
सुनो सुनाती मैं तुमको मैत्री की एक ऐसी कहानी। जो सबने सुनी और पहचानी। जब शिशुपाल वध के समय कान्हा की उंगली से था सुदर्शन चला। तब माधव की उंगली से रक्त था बहा। पर गोविंद अपनी पीड़ा थे छिपाए । ऐसे जैसे कोई वो पीड़ा देख ही ना पाए। एकाएक सखी पांचाली की पड़ी माधव के हाथ पर दृष्टि। उसने फाड़ा अपना आँचल बाँध दिया घाव पर ऐसे जैसे समेट ली स्नेह की सृष्टि। उसने बाँधा वो स्नेह का बंधन उसे क्या भान था माधव ऐसे चुकाएंगे वो कर्ज़। किया जब दुशासन ने चीरहरण ना पति ना ही बढ़े कोई भी ना था संग , तब माधव ने बढ़ाया चीर निभाया मित्रता का फर्ज़। माधव कहे एक सूत के बदले सब दे दूँ मेरी सखी हो तुम । माधव की सखी बनकर भी पाया दुनिया से गम। दुनिया है दुख तो देगी हमें माधव मिले यही है सुकून। माधव हैं मेरे भी सखा मुझे लगी सांवरे की धुन। — _सृष्टि तिवारी शान_ - srishti tiwari
*भोले सा तू, गौरा सी मैं* तेरी साँस से मेरी साँस पूरी होती है दीये बिना लौ अधूरी, नदी बिना धारा अधूरी तेरे नाम के बिना मेरी हर प्रार्थना अधूरी तुम चंदन, मैं बेलपत्र तुम घंटी की आवाज़, मैं मंदिर की देहलीज़ तुम सूरज, मैं उसकी पहली किरण भोले सा तू, गौरा सी मैं अलग अलग रहने से भी... जब तुम साथ हो, तभी मैं पूरी होती हूँ — _सृष्टि तिवारी शान
*"मेरी मिट्टी मेरा धर्म"* मेरी मिट्टी से जो खुशबू आती है, वो भारत माँ के आँचल की खुशबू है। जो उंगली उठाए उस आँचल पर, दिल मेरा पहले ही रो देता है। मेरे मंदिर की घंटी, मेरे मंत्र की गूंज, इनमें साँसें बसी हैं पुरखों की, इनका मज़ाक... ये ज़ख्म बन जाता है। पेपर बिक गए, मेहनत बिक गई, लाखों युवा सड़क पे इंसाफ़ माँग रहे। परंतु दुख होता है जब इस देश का युवा कुसंगति में फंसे जाता है। अच्छे बुरे में अंतर क्यूं न समझ पाता है। हां हुआ है पेपर लीक ये मैं भी मानती हूं , परंतु इस तिलचट्टों की पार्टी की नीयत अच्छे से पहचानती हूं। कुछ लोग मंच से धर्म का मज़ाक बनाते देश के टुकड़े-टुकड़े की बातें बनाते रियल आतंकियों को सलाम हिंदू आतंकवाद का बे-सिर-पैर का जहर फैलाते। अरे इस दहिया का विलाप सिर्फ सनातन के खिलाफ ही क्यों होता है। नास्तिक है तो क्यों तेरे मंच पर एक धार्मिक शब्द का ही हल्ला होता है। पर हम चुप नहीं बैठेंगे, क्योंकि सनातन हमारी साँस है। मैं हर उस सोच के साथ हूँ, जो देश को पहले रखती है, धर्म का सम्मान करती है। मैं अंधी नहीं, मैं आस्था वाली हूँ, और आस्था पे बात आई तो चुप नहीं बैठती। ये तिलक नहीं चमकता ये चूड़ियाँ नहीं खनकतीं, ये कलम मेरी पहचान बोलती हैं। सनातन है तो मैं हूँ, सनातन से ही ये देश है। सृष्टि तिवारी शान
महफ़िल में तेरे सोंग न चलेंगे , ग़म तो यही है , ग़म तो यही है । किस्से अरिजीत के फिल्म इंडस्ट्री में, कम तो नहीं है, कम तो नहीं है । कितनी दफा गानों को तेरे सुनके , दिल ने मेरे आराम किया । चन्ना मेरेया Srishti Tiwari Shaan - srishti tiwari
कहते हैं कि नर में होता है नारायण , पर उस नर में नारायण को खोजना सिखाया आपने। भटका सा था युवा भारत का, उसे सदमार्ग दिखाया आपने। आध्यात्मिक विचार इज़ सो ओल्ड कहते थे जेन ज़ी , आधुनिकता से आध्यात्मिकता का मेल कराया आपने। जो जा रहे थे नास्तिकता की ओर, उन्हें राधा रानी की महिमा का भान कराया आपने। जब लोग मानने लगे राधा कृष्ण को मनुष्य, तब भगवत शक्ति को खोजना सिखलाया आपने। ईश्वर भक्ति में मिलता है अलग ही आनंद, आप क्या है गुरु प्रेमानंद जी! गुरु, मेंटोर, या इंफ्लूएंसर हमने एक ऑलराउंडर है पाया आपमें। सृष्टि तिवारी ‘शान'
वो जो है मेरी परछाई , उसे भी दिलाना याद कहना ओ भाई। वैसे तो जीत कर ही मैं वापस लौटूंगा, और अगर न आया तो तिरंगे में लेटूंगा। सदा मां बाबा का ख्याल तू रखेगा , पढ़ाई में भी अव्वल सदा यूं आएगा । वो बोले मुझको आप ये न बोलो ना। अकेले छोड़ कर हमको न चले जाना। उसकी बातों ने उसके खतों ने और पूछा है बचपन की यादों ने की घर कब आओगे कि घर कब आओगे। लिखो कब आओगे कि तुम बिन यादें अधूरी अधूरी है। पूछा है बाबा ने कि घर कब आएगा, तेरे आने से आंगन खिल जाएगा। लिखते है बापू बेटे को कौन-सी मिठाई भेजूं मैं? करी है सगाई भाई की फोटो भी भेजी है । अगली बार जब आए तो लंबी छुट्टी पर आना । अब चिट्ठियों में न होगा बतियाना । कांपती अंगुलियों ने, तरसती आंखों ने कड़कती आवाज ने और पूछा है बाबा की लाठी ने। कि घर कब आओगे कि घर कब आओगे। लिखो कब आओगे कि तुम बिन बातें सूनी-सूनी है। सृष्टि तिवाड़ी 'शान‘
बालक बलिदानी इक ओर औरंग का दंभ । ते दुजी ओर औ नन्हे साहबजादा दा गुरुर था । इक ओर गज़वा ए हिन्द का झूठा सपना। ते दुजी ओर अपने देश ते धरम नू बचौण दा सुरूर था। इक ओर औ हिन्दुस्तान दा बादशाह जिस ते ओदी औलाद वी नफरत करदी । ते दुजी ओर जेडै बलिदान नू अज दुनिया ने मनया। इक ओर औ नृशंस हत्यारा जिणे हिंदूआ ते सिक्खां नू चुन चुन कर मारया। ते दुजी ओर औ नन्हे दो बच्चे जिणै ओते वी लोहा मनवाया इक ओर औ बूढ़ा बकरी चोर । ते दुजी ओर औ नन्हे वीर जिणदे दुध दे दांत वी न टुट्या। खड़े इस बार आमने-सामने डाल इक दूजे दी आंखां च आंखां। तद बोले औरंग नू तौड्डे मज़हब नू तू ही राखा । अस्सी ते है गुरु गोविंद सिंह जी दे पुत्तर । जे दे इक इक सिक्ख दे लक्खां ने कुतर। ए सुण औरंग बोला दोनों ने दीवार में दो चुनवा । पर साड्डे शेरां दी हिम्मत नू न पाया ओ झुकवा । शहीद हुए ओ वीर हकीकत में थे बचपन दे हकदार। जी उमर च बच्चे न सीखदे खुद दा करम औ उमर च औ बण गए वतन दे वफादार। सुना दी ए ‘शान' त्वानू शान ते उन दोनों बालकों दी कहानी। जै थे हिंद दे बालक बलिदानी। सृष्टि तिवारी शान
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