कर लो चाहे पूजा एक हज़ार
कहता यही मै बार बार
माँ बाप को जो ठुकराया बुढ़ापे में
चोट खायेगा दिन में
सौ सौ बार
माँ बाप तो गहना है
जिसे बचपन में
तूने पहना है
पत्नी के आते ही
ये गहना तू निकल
पड़ा बेचने थोड़ी दौलत
पाते ही,
क्या करेगा
इस सब का जब
तेरे माँ बाप के आखों
से टपक कर निकली
है बद्दुआ कहीं का नहीं
रहेगा तू कोई नहीं पूछेगा....
जय जिनेन्द्र
आशीष जैन (श्रीचंद)