हे वीणावादिनी माँ सरस्वती, करुणा बरसाना,
ज्ञान देना ऐसा कि मन में न आए अभिमान।
भक्ति करूँ तो विनय रहे, न रहे मन में घमंड,
तेरे चरणों में झुका रहे मेरा हर एक भाव, हर एक संकल्प।
देना मुझे ऐसी सद्बुद्धि, जो राह दिखाती जाए,
हर्ष में भी संयम रहे, दुख में भी धैर्य समाए।
मन न भटके, बुद्धि न डोले, सत्य से न हो दूर,
तेरी कृपा से हर पल मेरा जीवन हो भरपूर।
गलत रास्तों पर बढ़ते कदम थाम लेना माँ,
अँधियारे में डगमगाऊँ तो बन जाना मेरी लौ माँ।
हाथ पकड़ कर चलाना मुझे धर्म की डगर पर,
रखना सदा अपने आँचल की शीतल छाया भर।
तू ही मेरी वरदानिनी, तू ही मेरी पुकार,
न मुझसे किसी का अहित हो, न मन में आए विकार।
ऐसी कृपा करना माँ, रहे सबका कल्याण,
तेरे नाम में ही बस जाए मेरा तन-मन-प्राण।