कविता: कल का क्या भरोसा
कल का क्या भरोसा है,
किसी की ज़िंदगी छोटी, किसी की लंबी होती है,
मौत कभी किसी के दरवाज़े पर दस्तक देती है,
तो कभी किसी के सिरहाने
खामोशी से खड़ी होती है।
कौन जानता है
किसके हिस्से में
कल का सूरज उगेगा भी
या नहीं उगेगा…
आज तुम मुझसे
मुँह फुलाकर बैठे हो,
पर क्या पता
कल मैं तुम्हारे सामने
खड़ा हो पाऊँगा भी
या नहीं।
दिल से जुड़े रिश्तों को
यूँ ही
ग़लतफ़हमियों के हवाले मत करो,
ये रिश्ते काँच की तरह होते हैं,
एक दरार
पूरी आवाज़ बदल देती है।
मन-मुटाव की इस गाँठ को
इतना कसकर मत बाँधो,
कभी-कभी
ढीली डोर में ही
रिश्ते साँस लेते हैं।
तुमने मुझसे
बात करना छोड़ दिया—
मगर मिला क्या तुम्हें?
वक़्त तो रेत है,
मुट्ठी कसो या खोलो,
फिसल ही जाता है।
आज जो पास है
वो ही कल सबसे दूर होगा,
तुम आवाज़ लगाते रह जाओगे
और हम
यादों की धुंध में
बहुत आगे निकल चुके होंगे।
मैं तुमसे
बहुत दूर जा रहा हूँ…
शायद लौटूँ,
शायद कभी मिल भी जाऊँ,
या शायद
सिर्फ़ एक अधूरी याद बन जाऊँ।
अगर फिर मुलाक़ात न हो सके,
तो बस इतना याद रखना—
मैंने तुम्हें
दिल से चाहा था,
और जाते-जाते
तुम्हारी ख़ुशी की दुआ
साथ ले जा रहा हूँ।
तुम खुश रहना…
यही मेरी आख़िरी
ख़ामोश विनती है।
पल्लव सान्याल