कविता:हे रात…
हे रात, तुम क्या जानती हो
तुम्हारी गोद में जागते सब ,
वे नींद में नहीं होते —वे अपने को
दफ़्न कर रहे होते हैं कब।
उनकी सीने में दुख का अथाह सागर,
उनकी धड़कन में जलती तेज लौ का अथाह डागर ,
हर साँस के साथ चलती उतरती
अनकही सी मौत को वो निहारती।
वे आसमान के चमकीले तारे नहीं हैं,
जो खुलकर चमक सकें,
वे बुझती-बुझती लौ हैं
जो काँपते-काँपते थम जाती हैं।
खुशियाँ कब की राख हुईं,
हँसी बस एक दिखावा हुई,
विनाश के उस मोड़ पर
खतम हुआ है उनका उस ठोर पर।
ज़िंदा लोग अँधेरे से डरते हैं,
उन्हें भोर का इंतज़ार रहते है,
पर जिनके भीतर सूरज मरते है,
वे हर पल अँधकार सहते है।
लाशों की कोई सुबह नहीं है,
न कोई नया खिलता सवेरा है,
उनके हिस्से में लिख दी गई
अनंत रात का एक डेरा है।
इसलिए हे रात, समझ लो तुम,
जो तुम्हारा हाथ कसके थामे हैं,
वे इस दुनिया में जीते नहीं हैं,
बस साँसों का बोझ उठाए रखते हैं।
चलते-फिरते साए हैं वे,
जिनमें जीवन की कोई आह नहीं है,
नाम भले ही इंसान का ये—
हक़ीक़त में साँस लेती वह लाश हैं।
पल्लव सान्याल