कविता : “स्वार्थ में भी प्रेम हैं ”
मैं मानता हूँ, दुनिया में कुछ भी निःस्वार्थ नहीं,
हर मुस्कान के पीछे भी एक ख्वाहिश कहीं छिपी रही।
तुम्हें चाहना भी शायद मेरी आदत बन गई,
क्योंकि तुम्हारे साथ रहकर ही मेरी दुनिया सज गई।
मैं कहूँ “मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ”,
तो सच ये है — मैं खुद को तुममें खोजता हूँ।
तुम्हारी हँसी से मेरा दिल सुकून पाता है,
तुम्हारे आँचल में ही मैं अपना घर बसाता हूँ।
मैं तुम्हें चाहता हूँ, क्योंकि तुम मुझे अच्छा लगाते हो,
तुम्हारे बिना मेरे दिन अधूरे रह जाते हो।
शायद ये प्यार भी एक मीठा सा स्वार्थ है,
जिसमें मैं खुद को हर रोज़ बचा ले जाता हूँ।
फिर भी, इस स्वार्थ में जो अपनापन है,
वही तो प्यार की सबसे खूबसूरत पहचान है।
अगर तुम्हारे साथ रहकर मैं मुस्कुरा लूँ,
तो यही मेरा सबसे सच्चा इम्तिहान है।
पल्लव सान्याल