रणनी रेती ओढी बेठी, जळनुं नकली रूप,
तरस्यूं हरणुं दोडतुं रहेतुं, तडकानो छे धूप।
मृगजळनी ए मरीचिका, कोईने क्यां मारे छे?
ए तो बस आशा आपीने, रणमां रझळावे छे।
हाथथी छूटेला हरणांने, हइये अनेक धारणा,
खोटा भ्रमनी जाळ बनी छे, जीवतरनी वरणा।
धारणाओ ज्यारे तूटे, त्यारे आपत्ति लागे छे,
झांझवाना आ खेलमां, मन क्यां साचुं जागे छे?
नथी एमं कईं झेर, नथी एमं कोई प्यास,
बस, हैयाने भटकवावा, रचे छे मीठो भास।
DHAMAK