कोई सुनने वाला तो हों
अब बहुत हो गया…
सब्र जवाब दे रहा है,
अब तो दिल भी बेचैन हो उठा है।
कोशिश हमने बहुत की है,
ख़ामोश रहने की।
एक ही तो दोस्त था,
दिनों से उससे भी बात नहीं की।
अपनों से कोई गिला-शिकवा तो नहीं हमारा,
फिर भी राब्ता नहीं हुआ उनसे,
न कोई याद रही।
जीना चाहता था अपनी ज़िंदगी,
ख़ुद पर काम करते-करते।
रातें भी बस बेबस,
काम करते-करते काटी हैं।
दिन तो शुरू ही काम से होता था।
सोचा था, इस तरह दुनिया से छुपकर,
देखे थे जो सपने अपने लिए,
उन्हें एक बेहतर मुकाम दे सकूंगा।
क्या पता था,
इस तरह बंधन टूट जाएंगे।
इस जुदाई में,
हम कब ग़म से जुदा हुए?
पहले तो अपनों से,
फिर जानने वालों से भी जुदा हुए।
दूरियां यहां ख़त्म नहीं हुईं,
अब तो मुश्किल से
कभी किसी से,
किसी मौज़ू पर
दो बातें ही होती हैं।
वो भी काम और कारण की मर्यादा से बंधी होती हैं।
और वो सोचते हैं,
कि हम मतलबी हो गए?
घर का ज़िम्मा भी तो
कंधों पर लिए हूं,
जो मुझे भीतर से
कठोर और गंभीर बना देता है।
अंदर के बच्चे को,
इंसान बना देता है,
जो दूसरों की तरह जिंदादिल होना चाहता है।
घूमना चाहता है,
कॉलेज में दोस्तों के साथ जाकर पढ़ना चाहता है।
दो बातें दुनिया की करके,
ज़ोर-ज़ोर से हंसना चाहता हूं।
मौजूदा लम्हों की नज़ाकत का
लुत्फ़ उठाना चाहता हूं।
लेकिन ये ज़िंदगी मुख़्तलिफ़ है मेरी…
जो सकड़ी गाड़ी के घोड़े की तरह है,
मिल में काम करने वाले
उस मामूली मज़दूर की तरह है।
ठीक वैसी ही ज़िंदगी मेरी भी है।
दिल तो करता है,
उनसे वो सब साझा करूं,
विस्तार से कहूं…
लेकिन कोई सुनने वाला तो हो,
जो सच में
मेरी बात सुनने की रुचि रखता हो।
उनका सिर हिलाना ही
मेरे लिए काफ़ी है,
लेकिन दिल से।
ख़ुद से ऊब गया हूं बतियाकर,
थक गया हूं
ख़ुद के सवालों का जवाब
ख़ुद ही देकर।
डर है इस बात का,
कहीं बातें करना न भूल जाऊं।
जहां जवाब मेरा नहीं होगा,
तुक का मेल हो या न हो…
क्या मैं यही ज़िंदगी जीना चाहता था?
अगर हां…
तो ये बेचैनी क्यों उठ रही है?
ये आग क्यों
मुझे जला रही है?
बस अब सवाल ही सवाल हैं,
जिनकी सीमा भी
सवालों से घिरी नज़र आ रही है।
जिनका जवाब शायद
मुझे आने वाले सफ़र में मिलेगा,
और शायद नहीं भी…!