आज फिर गांव की मिट्टी ने
मेरे कदमों को थाम लिया…
धूप ढलती रही पेड़ों के पीछे,
और हवाओं ने चुपके से
मेरे दिल को छू लिया…
यहाँ शोर नहीं होता,
बस पंछियों की किलकारियों में
एक सुकून छुपा होता है…
चूल्हे की खुशबू,
मिट्टी की महक,
और लोगों की सादगी—
सब कुछ जैसे कहता है,
“यहीं तो असली जिंदगी है…”
शहर की दौड़ में जो खो गया था,
वो हर एहसास यहाँ लौट आया है…
आज की ये शाम
सिर्फ ढलती नहीं,
मेरे अंदर एक नया सवेरा जगा रही है… 🌾✨