Marathi Quote in Poem by Vrishali Gotkhindikar

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मातृदिन 🙏

आई...

आई फक्त तुझ्यासाठी ..

लहानपणा पासून वाढले तुझ्या कौतुकात पण “कडक “शिस्तीत
आवडत नसायचे मला अजिबात जर बोललीस तु कधी “रागात
मनाला खुपत असे कधी एखादी वस्तू न मिळणे
पण मनात मात्र ठसून जायचे
तुझे कायम “शांत ,आणी ..समाधानी ..असणे !
“संस्कार “..म्हणजे काय हे ही कधी नाही उमजले
पण सर्वांशी “आपुलकीने “वागणे हे मात्र तुझ्या कडून च शिकले
मला “घडवण्यासाठी “तुझी खूप धडपड असायची ..
मी मात्र सदा न कदा ..तुझ्या वरच रागवायची ..!!
माझ्या आयुष्यात ही मी तुला कायम “गृहीत ..धरले
तु मात्र प्रत्येक वेळी माझेच “भले ..चिंतिले ..!
शिकवणे तुझे कधी नाही अडकून पडले फक्त “छ्डीत ..
एक “संवेदना क्षम “व्यक्ती बनले मी फक्त तुझ्याच तालमीत ..!
तुझे सरळ साधे रूप माझ्या डोळ्यातली “बाहुली ..असते
वर्षे ..लोटली तु जावून पण मनातली जखम बुजत नसते ..
तुझा नुसता “उल्लेख ..झाला तरी डोळ्यातले पाणी थांबत नाही
तुझी “माया ..तुझे “प्रेम .त्रिखंड शोधले तरी मिळत नाही !
आज मागे वळून पाहते तेव्हा आठवतो आपला सारा “प्रवास ..
आणी पुन्हा पुन्हा डोळे भरतात ..कसा सरला ग आपला सहवास !!!

...............................................................................वृषाली 😪😪

Marathi Poem by Vrishali Gotkhindikar : 112024555
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गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर
गांव की ज़िंदगी – सुकून का असली घर

सुबह की पहली किरण जैसे ही खेतों पर पड़ती, पूरा गांव सुनहरी रोशनी से जगमगा उठता। पक्षियों की मधुर चहचहाहट, मंदिर की घंटियों की आवाज़ और ठंडी हवा मन को एक अलग ही शांति देती थी।

शहर में रहने वाली अनन्या कई साल बाद अपने दादा-दादी के गांव आई थी। शहर की भागदौड़, ट्रैफिक और मोबाइल की दुनिया में वह खुद को थका हुआ महसूस करती थी। गांव पहुंचते ही उसने देखा—हर चेहरे पर मुस्कान थी, हर घर का दरवाज़ा खुला था और हर इंसान एक-दूसरे का हाल पूछ रहा था।

एक सुबह दादाजी उसे खेतों में ले गए। हरी-भरी फसलें हवा के साथ झूम रही थीं। किसान मेहनत कर रहे थे, लेकिन उनके चेहरों पर संतोष साफ दिखाई दे रहा था।

अनन्या ने पूछा, "दादाजी, यहां लोगों के पास शहर जैसी सुविधाएं तो नहीं हैं, फिर भी ये इतने खुश कैसे हैं?"

दादाजी मुस्कुराए और बोले, "बेटी, खुशी बड़ी-बड़ी इमारतों में नहीं, बल्कि संतोष, अपनापन और प्रकृति के साथ जीने में होती है।"

उस दिन अनन्या ने बच्चों के साथ मिट्टी में खेला, पेड़ों की छांव में बैठकर कहानियां सुनीं, तालाब किनारे सूर्यास्त देखा और रात को खुले आसमान में अनगिनत तारों को निहारा।

जब वापस शहर लौटने का समय आया, तो उसके दिल में एक नई सोच जन्म ले चुकी थी। उसने समझ लिया कि जीवन का असली सुख केवल पैसा कमाने में नहीं, बल्कि अपनों के साथ बिताए गए पलों और प्रकृति के करीब रहने में है।

उसने तय किया कि चाहे वह शहर में रहे, लेकिन गांव की सादगी, प्रेम और शांति को हमेशा अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखेगी।

सीख:
"सच्ची खुशी वहीं मिलती है, जहां मन को शांति, रिश्तों में अपनापन और प्रकृति का साथ मिलता है। गांव की सादगी ही जीवन की सबसे बड़ी दौलत है।" 🌿🌾

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