बीते हुए उम्र में
कविता
तुम सपने बनकर आए इन आंखों में
पर शिकायत है
मुझे तुमसे
क्यों नहीं आए तुम
इन आंखों से बाहर इस दुनिया में
तुम कल्पना हो मेरे भटकते हुए दिमाग की
पर शिकायत है
तुमसे तुम
तुम सच क्यों नहीं हो सकते मेरे आज की
तुम यादें हो भूले हुए दोनों की
पर शिकायत है तुम से
तुम साथ क्यों नहीं हो मेरे इस वक्त में
पर शयद मुझे उस से भी ज्यादा शिकायत खुद से है
तुम्हें याद करना
तुम्हारा कल्पना करना
तुम्हारा सपना देखना
सायद मेरी खराब दिमाग की निशानी है
पर मैं क्या करूं
मैं भूल गई खुद को
हां मुझे तुमसे ज्यादा शिकायत है खुद से
हर रोज जब मैं सुबह उठती हूं
तो आंखें तुम्हारी सपने देखते हैं
और दिमाग महसूस करता है
कास उठने के बाद भी मैं सामने तुम्हें देख पाती
जब भी मैं तुम्हें सोचती हूं
तो मेरी आंखें अपने आप भर आती है
यह सोचते हुए की
काश तुम मेरे सामने बैठते और बातें करते मुस्कुराते
तुम्हारी याद आती है
तो मुझे पछतावा होता है
भूले हुए दोनों मे
मैंने तुम्हें याद क्यों नहीं किया
आखिर पछतावा से भरी जिंदगी मे
मेरे पास तुम्हारी यादें के सिवा कुछ नहीं है
और इस यादों के साथ जो आती है
वह दर्द तरप गम और अकेलापन है
बीत गए दोनों की भरते हुए जख्म
और उस जख्म के साथ गहरी दाग
जो हमेशा मुझे याद दिलाता है
मैंने क्या छोड़ा
और क्या भूल गई
बीती हुई उम्र में अब खुशियां नहीं है
बस है अकेलापन और तन्हाई
और आखिरी सांस तक शायद यही रहे