हर मानव को खुद तपना है.....
हर मानव को खुद तपना है।
सद्कर्मों को करना है।।
पंछी सभी सिखाते हमको।
पर फैला कर उड़ना है।।
साथ निभाती प्रकृति हमेशा ।
फल-फूलों सा खिलना है।।
वृक्ष हमें छाया-फल देते।
पर-उपकारी गहना है।।
सही धर्म सिखलाता हमको।
नहीं किसी से कुढ़ना है।।
ज्ञानीजन से शिक्षा पाकर।
अमृत कलश को चखना है।।
संतों का सानिध्य मिले तो।
बैर-भाव को तजना है।।
भ्रष्टाचार बढ़ा है यारो।
नाग-कालिया नथना है।।
मनोज कुमार शुक्ल मनोज