इक बूंद ज़हर कोई आज मिला दे, इश्क़ को आसान पीना होगा। मारो खंजर रूह में सीधा, हिज्र फ़िराक़ न जीना होगा।
क़ैद मुझे कर दे कोई, मैं गैर के साथ न उसको देखूँ, जहाँ छुआ हो उसने तुझको, बदन पे मेरे सीना होगा।
तू जा, खुश रह उसकी बाँहों में, मैं तन्हाई ब्याह कर लेंगे, रक़्स-ए-मस्ती आलम तेरा, मुझको ग़म में जीना होगा।
इक बूंद ज़हर कोई आज मिला दे, इश्क़ को आसान पीना होगा।