“घर का रास्ता …..”
एक रोज़…
हड़बड़ाहट में एक झोला उठाया था मैंने।
कुछ कपड़े थे,
कुछ अधूरे सपने,
और आँखों में पूरी दुनिया देखने की ज़िद।
उस वक़्त लगा था, घर की चौखट छोटी है… दुनिया बहुत बड़ी होगी।
आज…
दुनिया सचमुच बहुत बड़ी है,
मगर उसमें मेरा घर कहीं नहीं मिलता।
यहाँ शोर बहुत है माँ।
हर सड़क बोलती है, हर बाज़ार चीखता है, हर चेहरा जल्दी में है।
मगर इस पूरे शोर के बीच,
जब रात बहुत थक जाती है,
तब सबसे पहले तेरी धीमी-सी आवाज़ सुनाई देती है।
“खाना खा लिया न?”
बस इतना-सा सवाल…
और मेरी सारी मज़बूती आँखों से बहने लगती है।
पापा…
आपकी बातें कभी नीम की तरह लगती थीं।
हर बात पर रोकना, हर बात पर टोकना,
देर होने पर डाँटना,
बाहर जाते हुए सौ बार पीछे से पुकारना।
मैं झुंझला जाती थी।
सोचती थी… कब बड़ी होऊँगी, कब अपनी मर्ज़ी से जीऊँगी।
आज…
जब कोई नहीं पूछता “कब लौटोगी?”
तब आपकी हर डाँट में चीनी घुली लगती है।
कितनी अजीब बात है…
मिठास को समझने में इतनी कड़वाहट पीनी पड़ी।
बचपन में जिस कमरे से बाहर भागती थी,
आज उसी कमरे की दीवारें मुझे पुकारती हैं।
जिस आँगन से दुनिया छोटी लगती थी,
आज वही आँगन पूरी दुनिया से बड़ा लगता है।
जिस खिड़की पर बैठकर बारिश गिना करती थी,
आज उसी खिड़की की एक झलक को आँखें तरसती हैं।
लोग कहते हैं, घर छोड़ने से इंसान बड़ा हो जाता है।
शायद… सच कहते हैं।
क्योंकि घर छोड़ने के बाद
हँसी पहले जैसी नहीं रहती,
रोना पहले जैसा नहीं रहता,
और… लौटना भी पहले जैसा नहीं रहता।
कई लोग रोटी कमाने निकलते हैं।
सोचते हैं, थोड़ा कमाएँगे, फिर लौट आएँगे।
मगर दुनिया… बहुत चालाक होती है।
वह पहले सपनों का लालच देती है।
फिर ज़िम्मेदारियों की बेड़ियाँ पहनाती है।
और देखते ही देखते, बरसों बीत जाते हैं।
अब घर की याद किसी तूफ़ान की तरह नहीं आती।
वह तो… शाम की धूप बनकर धीरे-धीरे कंधे पर उतरती है।
कभी किसी रसोई की खुशबू में,
कभी किसी बुज़ुर्ग की आवाज़ में,
कभी किसी बच्चे की हँसी में,
और कभी… बिना किसी वजह के।
कई बार मन करता है, सब छोड़ दूँ।
फिर से वही पुरानी गली देखूँ।
माँ के हाथ की गर्म रोटी खाऊँ।
पापा के पास बैठकर बिना किसी बात के सिर्फ़ चाय पी लूँ।
मगर…
अब लौटना इतना आसान कहाँ है।
दुनिया ने मेरे पैरों में फ़र्ज़ की बेड़ियाँ बाँध दी हैं।
और उनकी चाबी… शायद मैं उसी दिन किसी समंदर में फेंक आई थी,
जिस दिन हड़बड़ाहट में वह झोला उठाकर निकली थी।
अब रास्ते याद हैं, पर लौटने का समय नहीं।
घर आज भी वहीं है, मगर मैं वही नहीं रही।
अब… मैं जहाँ रहती हूँ, उसे घर कहना सीख गई हूँ।
और जहाँ मेरा घर है, वहाँ… मेरे लिए एक कमरा आज भी वैसा ही रखा है।
सब कुछ पहले जैसा है।
बस… माँ के बालों में कुछ सफ़ेदी बढ़ गई है।
पापा की चाल थोड़ी धीमी हो गई है।
और मैं… मैं बड़ी हो गई हूँ।
इतनी बड़ी…
कि अब अपने ही घर का दरवाज़ा खटखटाते हुए मेहमान-सी लगती हूँ।
शायद…
घर कभी नहीं बदलता।
बदल जाते हैं उसे छोड़कर जाने वाले लोग।
और यही…
बड़ा होने की सबसे महँगी कीमत है।
प्राची गुर्जर