"आख़िरी आहट"
तेरे जाने से मेरी दुनिया उजड़ी नहीं,
बस अब किसी दस्तक पर ये दरवाज़ा खुलता नहीं।
साँसें चलती हैं, रस्में निभती हैं,
मगर दिल ने किसी मौसम से दोबारा दोस्ती नहीं की।
तेरे बाद हर चेहरे को देखा, परखा,
शिकवा किसी से नहीं रहा…
और भरोसा भी अब किसी पर ठहरता नहीं।
तू गया और दर्द ने चुपके से मेरे सीने में बसेरा कर लिया।
अब ख़ुशी आती भी है तो दरवाज़े पर ही लौट जाती है।
कहती है, "यहाँ जगह नहीं है।"
लोग कहते हैं भूल जाओ।
मैं हँस देती हूँ।
कुछ रिश्ते दफ़्न होते हैं, साहब…
वो लाशें नहीं होतीं जो मिट्टी के साथ गल जाएँ।
अब कोई कहे "उम्र भर साथ निभाऊँगा"
तो लब पर हँसी आ जाती है।
क्योंकि मैंने एक बार उम्र भर का वादा
आँखों के सामने टूटते देखा है।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तेरे जाने की नहीं थी,
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उस "वहम" की थी
जो हर आहट में तुझे लौटता हुआ सुनता रहा।
तू गया तो मैं कुछ रोज़ रोई…
और मेरा यक़ीन बरसों तक भीगता रहा।
शायद तुझे नया आसमान मिल गया होगा,
नए लोग, नई बातें।
और मेरे हिस्से…
तेरी वो आख़िरी आहट रह गई,
जो आज भी मेरे कमरे में गूंजती है।
तू छोड़कर गया तो रास्ते वही रहे,
शहर वही रहा, लोग वही रहे।
बस मेरी रूह ने
किसी का इंतज़ार करना छोड़ दिया।
प्राची गुर्जर …..