“मेरी परछाई…..”
मेरे साथ चलती है मेरी परछाई,
मुझसे बेहतर मुझे शायद वही जानती है।
जब दुनिया मेरे चेहरे को पढ़ती है,
वह मेरी ख़ामोशियों की भाषा पढ़ लेती है।
मेरे हर निवाले के साथ
उसने भी अपनी भूख टाली है।
मेरे हर सफ़र में
उसने बिना शिकायत धूल ओढ़ी है।
मैं जहाँ-जहाँ ठहरी,
वह वहीं-वहीं ज़मीन पर बिछती रही।
रात जब सारे रिश्ते
अपने-अपने घर लौट जाते हैं,
वह मेरे बिस्तर के पास
चुपचाप लेट जाती है।
हम दोनों रोज़
एक ही अँधेरे की चादर ओढ़ते हैं।
कभी मैंने उससे पूछा नहीं
कि उसे भी डर लगता है क्या।
क्योंकि मैं जानती हूँ,
जो मेरे साथ हर अँधेरे में खड़ी रही,
वह उजालों से शिकायत नहीं करती होगी।
लोग कहते हैं,
इंसान अकेला जन्म लेता है,
अकेला जीता है,
अकेला मर जाता है।
मैं हर बार मुस्कुरा देती हूँ।
उन्हें क्या पता…
मेरे जन्म से नहीं,
लेकिन मेरी समझ से
एक रिश्ता मेरे साथ चल रहा है।
मेरी परछाई…
जो मेरी जीत पर कभी ताली नहीं बजाती,
और मेरी हार पर कभी सवाल नहीं करती।
उसे मेरे चेहरे की सुंदरता से
कोई प्रेम नहीं।
उसे तो बस
मेरे होने से प्रेम है।
कभी-कभी दोपहर की धूप में
वह छोटी हो जाती है।
शाम ढले
मेरे आगे निकल जाती है।
और रात…
रात होते ही
बिना कुछ कहे
मुझमें समा जाती है।
तब समझ आता है…
कुछ रिश्तों को
नाम नहीं दिए जाते।
वे बस जीवन भर
हमारे साथ चलते हैं।
और शायद…
इस पूरी दुनिया में
अगर कोई मुझे बिना बोले,
बिना परखे,
बिना बदले…
आख़िरी साँस तक अपना कह सकता है,
तो वह…
मेरी परछाई है।
प्राची गुर्जर……